लेखक परिचय

सूर्यकांत बाली

सूर्यकांत बाली

जाने माने स्‍तंभकार सूर्यकांत जी 'नवभारत टाइम्‍स' और 'राज सरोकार' पत्रिका के संपादक रह चुके हैं।

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सूर्यकांत बाली 

downloadइलाहाबाद के महाकुंभ में इकट्ठा हुए संत एक बड़ी बैठक कर देश की राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप करने की इस रूप में सोच रहे हैं.

क्योंकि वे देश को बताना चाहते हैं कि उनकी राय में देश का प्रधानमंत्री कैसा हो. हो सकता है वे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में कोई प्रस्ताव पारित कर दें. इस खबर से देश का अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी, अंग्रेजीदां सिविल सोसाइटी और अंग्रेजीदां मीडिया वाले परेशान हैं. उन्हें लगता है कि राजनीति पर सोचने और बोलने का हक सिर्फ उन्हीं को है और उनका तर्क है कि संतों का ऐसा हस्तक्षेप देश की धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार होगा.

उनके तर्क पश्चिमपरस्त सोच के कितना गुलाम हैं और इसलिए कितने कमजोर हैं, इस पर फिर कभी पर आज हम उन्हें, पूरे देश को और खासकर संत-समाज को महाभारत के करीब 1500 साल बाद, यानी आज से करीब 3500 साल पहले मुनिवर शौनक की अगुवाई में नैमिषारण्य के उनके आश्रम में हुई उस संत-सभा का परिचय करवाना चाहते हैं, जिसके बारे में हम अपनी पुस्तक भारत गाथा में विस्तार से पहले ही लिख चुके हैं.

जिस महासंगोष्ठी में देश के ज्ञात इतिहास, प्रागैतिहासिक काल, काल विभाजन, देश की तत्कालीन सामाजिक-वैचारिक स्थिति आदि पर अति गंभीर विचार-विमर्श हुआ, वह नैमिषारण्य में कुलपति शौनक के आश्रम में हुई थी. नैमिषारण्य संभवत: इस तरह की संगोष्ठियों के लिए विख्यात था. जब भी किसी शौनक को वहां संगोष्ठी करने का विचार आता होगा, वे वहां ऋषि-मुनियों को निमन्त्रित कर लिया करते होंगे. ऐसी एक बड़ी संगोष्ठी इन्हीं शौनकों के आश्रम में महाभारत युद्ध के आसपास हुई थी. नैमिषारण्य के आश्रम में ही क्यों, उन दिनों देश के आश्रमों में इस तरह की संगोष्ठियां, कभी छोटे तो कभी बड़े स्तर पर होती ही रहा करती थीं. पिप्पलाद के आश्रम में छह ऋषि साल भर नियम-संयम से रहे थे.

फिर उनमें आपस में विशिष्ट संवाद और प्रश्नोपनिषद् का जन्म हुआ. श्वेतार ऋषि के आश्रम में कई विचारधाराओं के प्रतिनिधि ऋषि एकत्र हुए और उस बहस में श्वेतातरोपनिषद का जन्म हुआ. पर ये संगोष्ठियां उस तरह हमारी स्मृतियों का सहज हिस्सा नहीं बन पाईं जिस तरह नैमिषारण्य की वह संगोष्ठी या कहें, महासंगोष्ठी बन गई जो दृषद्वती नदी के किनारे कुलपति शौनक के आश्रम में हुई थी. इस महासंगोष्ठी को हमारी स्मृतियों का हिस्सा बनाने में अठारह पुराणों का भारी योगदान रहा है, क्योंकि उनमें स्थान-स्थान पर इस बात का जिक्र है.

3500 वर्ष पूर्व हुई नैमिषारण्य की इस संगोष्ठी में कितने ऋषि-मुनि इकट्ठा हुए, कितने साल तक वे आश्रम में रहे, उन्होंने क्या विचार-विमर्श किया और उसका क्या परिणाम निकला, ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि उन्हीं के उत्तरों से उस संगोष्ठी का वास्तविक महत्व सामने आ सकता है. कहा जाता है कि अठासी हजार ऋषि-मुनि वहां इकट्ठा हुए. संख्या इतनी बड़ी है कि इस पर सहसा विश्वास नहीं होता. कितने साल वे इकट्ठा रहे? यानी कितने वर्ष तक यह महासंगोष्ठी चली?

इस सवाल के जवाब में हमें नैमिषारण्य में हुई कुछ बड़ी संगोष्ठियों के बारे में जानकारियां जुटानी जरूरी हैं. कह सकते हैं, शौनकों का नैमिषारण्य स्थित आश्रम इस तरह की संगोष्ठियों के आयोजन का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया था. संगोष्ठियों के लिए मशहूर हो जाने के कारण लोगों के बीच यह आश्रम एक पवित्र स्थान और लगभग तीर्थ जैसा माना जाने लगा. इसकी धर्मिक-आध्यात्मिक पवित्रता को लेकर कई तरह की कहानियां भी चल पड़ीं.

जाहिर है, देश की हालत चिंताजनक रही होगी, राजनीतिक भी, सामाजिक भी और वैचारिक भी, जिसकी वजह से सारे देश के ऋषि-मुनियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर लम्बे और गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत उस समय के कुलपति शौनक को महसूस हुई होगी. लगता है शौनक अति संवेदनशील व्यक्ति थे. इनके सौभाग्य से इनके समकालीन कोई सूत भी उतने ही संवेदनशील थे. देश-दशा पर विचार कर उसे एक नई रचनात्मक दिशा देने का विचार इन दोनों ने मिलकर किया होगा, जिसका परिणाम इस संगोष्ठी के रूप में सामने आया.

महाभारत परवर्ती इतिहास के बारे में हमें वैसी ठोस सिलसिलेवार जानकारियां नहीं मिलतीं जैसी महाभारत से पहले के और इस महासंगोष्ठी के बाद के इतिहास की मिल जाती हैं. लगता है कोई बहुत शानदार समय यह हमारे देश के राजनीतिक इतिहास का नहीं रहा होगा. इस युग को कलियुग कहने की प्रेरणा संगोष्ठी से उभरी. कलि का नकारात्मक अथरें में प्रयोग भी इसी आधार पर हुआ होगा.

हो सकता है, सारा देश क्रमश: राजनीतिक विखंडन का शिकार हो रहा हो. वैचारिक आधार पर ब्राrाण-ग्रंथों और उपनिषदों की रचना इसी कालखंड में हुई जिन्होंने भारत को शानदार और अद्भुत विरासत दी. पर इनको पढ़ने से एक बात साफ समझ में आती है कि समाज में वैचारिक अनेकता अक्सर वैचारिक विभ्रम ही नहीं, वैचारिक असंयम तक भी पहुंच जाती होगी. जैसा आज है. ऐसे में समाज की कुल स्थिति और सोच क्या रही होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है.

नैमिषारण्य की महासंगोष्ठी के बीज इन्हीं स्थितियों में से तलाशे जा सकते हैं. जाहिर है, इस महासंगोष्ठी में जो भी विचार-विमर्श हुआ, जो भी परिणाम सामने आया, जो भी निष्कर्ष निकाले गए, उन्हें सारे देश की जनता के बीच पहुंचाने-फैलाने के लिए नैमिषारण्य के वे हजारों ऋषि-मुनि संगोष्ठी की समाप्ति के बाद पूरे देश की यात्रा पर निकल पड़े, अकेले-अकेले भी और छोटे-छोटे समूहों में थी. जो विचार-विमर्श उन्होंने शौनक की अगुवाई और सूत के मार्गदर्शन में किया, उसे अपने देश की हजारों साल पुरानी वाचिक परम्परा के माध्यम से उन्होंने लोगों के बीच कहना शुरू किया.

सूतजी बोले, हे ऋषियो इस तरह उद्धृत कर उन्होंने अपनी भाषा और शैली में वह सब सारे देश को बांटा जो वे वहां सुन-कह कर आए थे. और यह सब कहा गया कथाओं के माध्यम से, देश के मनु-पूर्ववर्ती और मनु-परवर्ती ज्ञात इतिहास की बड़ी-बड़ी घटनाओं का सहारा लेकर. इन्हीं में से कुछ व्यक्तियों या समूहों ने मिलकर वेदव्यास की पुराण संहिता का विस्तार कर उसे अठारह महापुराणों और अठारह उपपुराणों की संख्या तक पहुंचा दिया, जो महासंगोष्ठी के बाद सदियों तक लिखे जाते रहे, बढ़ाए जाते रहे.

देश में ईश्वर के अवतार और उनकी पूजा की परंपरा इसी दौर में सम्पूर्ण रूप में विकसित हुई. देवपूजा, जप, तीर्थाटन, व्रत-उपवास आदि नियम इसी दौर में मजबूत हुए. मंदिरों का निर्माण इसी युग की देन है. हमारे दिलो-दिमाग में आज स्वाभाविक जगह बना कर बैठी हुई स्वर्ग-नरक की अवधारणा का जन्म भी इसी युग में हुआ. वर्णव्यवस्था का जातिप्रथा में रूपांतर इसी दौर में होना शुरू हुआ.

देश के महान विचारकों के गहनतम दार्शनिक सिद्धांतों को गांव-गांव तक पहुंचाने का मिशन भी इसी दौर में हाथ में लिया गया. यानी देश के जिस रूप से हमारा परिचय हमें पिछली सदियों से है, उसकी रूप-रचना महासंगोष्ठी के बाद के इसी लम्बे दौर में हुई जिसकी अद्भुत परिणति हमारे देश के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी के जिनत्व की प्राप्ति के रूप में और महात्मा बुद्ध के धम्मचक्कप्पवत्तन (धर्मचक्रप्रवर्तन) के रूप में हुई.

इसकी नींव पर फिर वह भारत बना जिसने बुद्ध व शंकराचार्य के बीच का स्वर्णकाल देखा. मौजूदा पुनर्निर्माण काल को यदि स्वर्णकाल में बदलना है, जो संभव है, तो हो सकता है, देश के किसी शौनक को किसी सूत को, राष्ट्र-दशा पर गंभीर विचार और संवाद के लिए फिर से कोई ऐसी महासंगोष्ठी बुलानी पड़े. क्या वर्तमान संत-सभा में से ऐसी किसी महासंगोष्ठी का जन्म होगा? कृतज्ञ देश सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है.(राष्‍ट्रीय सहारा से साभार)

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