लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

पिछले दिनों राहुल गांधी कोलकाता आए और उनका युवा कांग्रेस के लोगों ने जमकर स्वागत किया। वे इसके लायक भी हैं। राहुल गांधी की राजनीतिक शैली मजेदार है। वे जब भी बोलते हैं तो मासूमों की तरह बोलते हैं। राजनेता जब मासूमशैली में बोलता है तो बेहद खतरनाक होता है। राजनेता तो राजनेता होता है वह मासूम नहीं होता।

राहुल गांधी में राजनेता के सभी गुण-अवगुण हैं। लेकिन इनमें से वे इन दिनों किसी का भी प्रदर्शन नहीं करते और सिर्फ एक ही गुण का बार-बार प्रदर्शन करते हैं मासूमियत का। मासूम जब बोलता है,औचकभाव से बोलता है।

उनकी स्टीरियोटाईप कांवेंट के बच्चे की भाषण शैली में हम सभी मजा लेते हैं इसमें उनका बचपना झलकता है। युवा में बचपना गंभीरता को नष्ट करता है। पता नहीं किस बेबकूफ को राहुल गांधी की भाषण-कला की शिक्षा का जिम्मा दिया गया है जो उन्हें मासूमियत की कांवेंट शैली में बोलने के लिए कहता है। यह कांग्रेस की नई अधिनायकवादी भाषणशैली है ।

राहुल गांधी बच्चों की ही तरह कम बोलते हैं,कोलकाता में भी 9-10 मिनट बोले। जाहिर है कम बोलने के फायदे और नुकसान दोनों हैं। उनके भाषण में आपात्काल की कांग्रेस के उनके चाचा संजय गांधी की ध्वनियां सुनाई दे रही हैं। जाने-अनजाने वे संजय गांधी के रास्ते पर चल पड़े हैं ,संजय गांधी का नारा था ‘बातें कम और काम ज्यादा।’ राहुल गांधी भी बातें कम करते हैं,छोटा भाषण देते हैं। अपनी बात कम करते हैं विपक्ष पर हमले ज्यादा करते हैं। ‘छोटा भाषण और विपक्ष पर हमला’ यह संजय गांधी की शैली थी। यह कांग्रेस की अधिनायकवादी भाषणकला है।

राहुल गांधी अभी बिहार में गए वहां पर उन्होंने नीतीश कुमार पर हमला किया, उसके पहले वे उत्तरप्रदेश के किसानों के आंदोलन के संदर्भ में मायावती पर हमले कर चुके हैं। राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश दौरे की अखबारी कतरनें पढ़ जाइए आपको हमेशा एक ही चीज हाथ लगेगी विपक्ष पर हमला। सवाल उठता है राहुल गांधी कभी सकारात्मक और बिना हमलावर हुए भाषण क्यों नहीं देते ? वे अपनी मासूमियत के बहाने क्या कहना चाहते हैं ? वे बार-बार विपक्ष पर हमला करके क्या सिद्ध करना चाहते हैं ?

राहुल गांधी के भाषणों में बार-बार पुनरावृत्ति हो रही है। वे एक ही बात को महीनों से दोहरा रहे हैं। उनके यू.पी,बिहार, पश्चिम बंगाल आदि में विगत 6-7 महीनों में जितने भी भाषण हुए हैं उनमें एक ही बात कह रहे हैं कि केन्द्र के द्वारा राज्यों को विकास के लिए जो पैसा दिया जा रहा है उसका राज्य सरकारें इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। अथवा पैसा खा जाती हैं। ग्रामीण विकास रोजगार योजना के संदर्भ में राहुल गांधी बार-बार शिकायतें कर रहे हैं कि अतिगरीबों तक ये योजना अभी तक नहीं पहुँच पायी हैं।

ठीक इसी तरह की बातें उन्होंने कल कोलकाता में कही है और बोला कि ग्रामीण विकास रोजगार योजना का पैसा केन्द्र से कोलकाता आया किंतु उसे बीपीएल कार्डधारकों तक माकपा ने नहीं पहुँचाया और सारा पैसा पार्टी सदस्यों में ही बांट दिया गया। इसमें तथ्य क्या है यह राहुल गांधी नहीं जानते। पहली बात यह कि ग्रामीण विकास रोजगार योजना के तहत 100 दिन काम देने वाली स्कीम इस राज्य में लागू ही नहीं हो पायी है। अधिकतर जिलों में यह स्कीम फाइलों में बंद पड़ी है। अधिकांश जिलों में जब स्कीम लागू ही नहीं हो पायी तो माकपा के लोग पैसा कैसे खा सकते हैं ।

वाममोर्चा सरकार का इस प्रसंग में निकम्मापन रहा है लेकिन इसे भ्रष्टाचार नहीं कह सकते। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बीपीएल कार्डधारकों के कार्ड बनाने के मामले मे अनेक गंभीर अनियमिताएं पायी गयी थीं जिसके कारण यह योजना लागू नहीं की गई।

राहुल गांधी इतने भोले हैं कि उन्हें अब कोलकाता शहर सुंदर लगने लगा है और उनके पिता को यह ‘मृत शहर’ लगा था। राहुल गांधी की अज्ञानता का आलम यह है कि उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में 45 प्रतिशत लोगों के पास राशनकार्ड नहीं है। जनाब जानते ही नहीं है कि वास्तविकता क्या है ?

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि केन्द्र ने किसानों का कर्जा माफ कर दिया था लेकिन राज्य में सारा पैसा सीपीएम के लोग खा गए। अब इस बेबकूफी का क्या जबाब हो सकता है कि किसानों की कर्जमाफी का पैसा सीपीएम कैसे खा सकती है ? यह बैंक और कर्जगीर किसान के बीच का मामला है,सीपीएम और बैंक के बीच का मामला नहीं है।

राहुल गांधी के भाषणों में एक और गंभीर समस्या है वह है तथ्यों के मेनीपुलेशन की। वे तथ्यों को लेकर सही भाषा का प्रयोग करना नहीं जानते अथवा जानबूझकर तथ्यों का दुरूपयोग करते हैं। ग्रामीण विकास रोजगार योजना को लेकर राज्य सीपीएम के ऊपर पैसा खाने का आरोप लगाकर उन्होंने सफेद झूठ बोला है। सच है कि राज्य में यह योजना लागू ही नहीं हो पायी है। जब योजना लागू ही नहीं हुई तो कोई पैसे खाएगा कैसे ?

राहुल गांधी के भाषणों से एक आभास यह भी मिलता है वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कमर कसकर मैदान में आ चुके हैं। उनके भाषणों में भ्रष्टाचार एक प्रमुख विषय रहता है। सुनने में अछ्छा लगता है कि राहुल गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं। लेकिन वास्तविकता क्या है ? राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार के सवाल पर अपनी पार्टी के अंदरूनी मंचों पर,कमेटियों और सरकार के स्तर पर कभी कोई शिकायत तक नहीं की।

गोया कांग्रेस पार्टी दूध की धुली है और भ्रष्टाचार की समस्या तो सिर्फ विपक्षी दलों की समस्या है यही वजह है कि वे भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष पर आए दिन हमले करते रहते हैं ।

राहुल गांधी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि स्पेक्ट्रम घोटाले में संचारमंत्री शामिल है या नहीं ? विपक्ष ने तथ्य दिए हैं। उनका प्रामाणिक खंडन अभी तक नहीं आया है। विपक्ष जांच चाहता है कांग्रेस जांच नहीं चाहती। दूसरा सवाल यह है कि स्पेक्ट्रम घोटाले में क्या सिर्फ संचारमंत्री शामिल हैं ? क्या प्रधानमंत्री कार्यालय या कांग्रेस का इससे कोई लेना-देना नहीं है ? जी नहीं, नई कार्यशैली के तहत नीतिगत मसलों पर प्रधानमंत्री कार्यालय और मंत्रीमंडलीय समिति का फैसला अंतिम होता है और स्पेक्ट्रम के मामले में भी यही हुआ है।

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपत्ति हैं। यूपीए सरकार उन्हें कारपोरेट घरानों को किस मुँह से बेच रही है। रेडियो तरंगें कैसे आवंटित होती हैं और कौन आवंटित करता है और किनके लिए आवंटित की जाती हैं,ये सारी बातें कांग्रेस के नेता अच्छी तरह जानते हैं वे रेडियो तरंगे बेच-बेचकर संचार जगत में बड़े-बड़े कारपोरेट घराने तैयार कर रहे हैं और बदले में इन घरानों से पूरा राजनीतिक खर्चा वसूल रहे हैं। आज संचार की कंपनियां और हथियार बनाने वाली कंपनियों के मौटे चंदे से कांग्रेस पार्टी चल रही है। ऐसे में राहुल गांधी का भ्रष्टाचार के खिलाफ बयानबाजी देना बचकानी हरकत लगता है और वे मासूम नजर आते हैं।

देश की जनता को यह सवाल पूछने का हक है कि हथियारों की खरीद में कितना कमीशन दलाल को मिलता है ? 90हजार करोड़ के हथियार खरीदे जाने हैं और यह सिलसिला चल रहा है। नियम के अनुसार 3 प्रतिशत कमीशन दलाल का होता है,सवाल यह है कि कांग्रेस को इस प्रक्रिया में कितना पैसा मिलता है ? स्व.प्रधानमंत्री राजीव गांधी का संसद में बयान था कि हथियारों की बिक्री के मामले में हम दलाली खत्म कर देंगे। इस बयान के आधार पर ही विपक्ष ने बोफोर्स में दलाली दिए जाने का आरोप लगाया था बोफोर्स कंपनी ने दलाली दी थी यह तय हो चुका है। विवाद इस पर है कि किसे मिली ?

सवाल यह है कि राहुल गांधी ,उनकी माँ सोनिया गांधी और उनके चहेते मनमोहन सिंह क्या राजीव गांधी के संसद में हथियारों की दलाली के संदर्भ में दिए बयान पर क्या आज भी कायम हैं ? राहुल गांधी की भ्रष्टाचार के विरोध में की गई सारी बातें सही मान ली जाएं यदि वे असम के उस युवा नेता को युवा कांग्रेस से बर्खास्त कर दें और पुलिस के हवाले करें जिसने असम में 11सौ करोड़ रूपये का विकास के मद में आवंटित फंड आतंकी संगठन उल्फा को दे दिया है और इस पाप में असम सरकार भी शामिल है क्या मुख्यमंत्री के हटाने की मुहिम राहुल गांधी चलाएंगे ? यदि वे इसके प्रमाण जानना चाहते हैं तो सीएनएन-आईबीएन के समाचार संपादक को घर बुलाकर जान सकते हैं अन्यथा सीएजी की रिपोर्ट मंगाकर देख सकते हैं।

हमें मालूम है राहुल गांधी का भ्रष्टाचार विरोध एक ढ़ोंगी का विरोध है। एक ऐसे नेता का विरोध है जिसकी पार्टी भ्रष्ट नेताओं,ठेकेदारों और दलालों से भरी हुई है। हम बहुत खुश होंगे यदि कांग्रेस से भ्रष्टनेता,ठेकेदार और दलाल निकाल दिए जाएं। समस्या यह है कि उसके बाद कांग्रेस में बचेगा क्या ?

(चित्र परिचय:कोलकाता में युवा कांग्रेस की रैली में भाषण देते राहुल गांधी)

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3 Comments on "‘भोले’ राहुल गांधी की मीठी-मीठी बातें"

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Himwant
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अमेरीकी लोक तंत्र का आधार मिडीया है। जिसने अच्छा मिडीया मेनेजमेंट किया वह जीत गया। जिसके मिडीया कंसल्टेंट और ईभेंट मैनेजर ने उत्कृष्ट काम किया उसे चुनती है अमेरिकी जनता अपने राष्ट्रपति के रुप में।

हमारे देश मे मुश्किल से 15 प्रतिशत जनता टीभी, अखबार, एफ.एम या इंटर्नेट के जरिए अपना विचार निर्माण करती है। इसलिए इस दृष्टी से हमारे यहा एक मजबुत लोकतंत्र है। लेकिन विदेशी शक्ति सम्पन्न राष्ट्र अब हमारे यहां भी मिडीया मे छदम निवेश बढा रहे है। लेकिन अभी दिल्ली दुर है।

Pandit Sachin
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bahot badhiya

श्रीराम तिवारी
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सरजी आपका बहुत बहुत शुक्रिया .आपने वाकई बहुत सशक्त सप्रमानिक आलेख पोस्ट किया है .व्यक्तिगत तौर पर इन तमाम पूंजीवादी -साम्प्रदायिक पार्टियों में एक राहुल गाँधी ही ऐसा चेहरा उभरा था जो की विश्वशनीय सा लगता था किन्तु विगत दिनों उन्होंने एक घिसा पिटा जुमला -की हम केंद्र से khoob dhan bhej rahe hain किन्तु vipaksh की rajy sarkaren कोई काम नहीं करती सब पैसा खा जाती हैं .आपने to उनकी इस नासमझी को रेखांकित कर मेरा दिल तोड़ दिया ;क्योंकि मेरे जेहन में एक खुश फहमी थी की चलो सर्वहारा क्रांती के तो अते-पते नहीं किन्तु बुर्जुआ पूंजीवादी स्वच्छ… Read more »
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