लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-सुरेश हिन्दुस्थानी-
kishan ganga

देवतुल्य भारत माता के आंगन में प्रवाहित होने वाली पतित पावनी माँ गंगा की अनुपम और शुद्ध सात्विक धारा का लाभ हम सभी के जीवन में विद्यमान रहता है। हमारे पूर्वजों की अनेक धरोहरें आज भी हमारे संस्कारों में परिलक्षित होती हैं। मां गंगा की पवित्रता पर किसी भी भारतवासी को हमेशा ही गौरव का भान हुआ है। वर्तमान में भी मां गंगा भारत की सांस्कृतिक गाथा को कल कल प्रवाह के साथ निनादित करती हुई हम सबके जीवन को प्रसन्नता से आच्छादित कर रही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और अटक से लेकर कटक तक समान रूप से मानवीय मनों में एक ही संस्कार उत्पन्न करने वाली माँ गंगा पूरे देश के लिए प्रात: स्मरणीय है।

विश्व के अनेक देश आज इस बात को लेकर चकित हैं कि भारत देश में प्रवाहमान माँ गंगा के पवित्र जल में ऐसी क्या खासियत है कि उसका जल वर्षों तक रखा रहने के बाद भी खराब नहीं होता। इस पर अनेक वैज्ञानिक शोधों ने हालांकि इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि इसके जल में मसूरी अपनति संरचना इसके जल को हमेशा शुद्ध बनाए रखता है। इसके बाद इसके जल में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो व्यक्ति को सात्विक जीवन की प्रेरणा प्रदान करते हैं, इतना ही नहीं इसके जल में स्नान करने से पापी व्यक्ति भी अपना भावी जीवन पूर्ण सात्विकता के साथ जीने की कल्पना कर सकता है, कहते हैं कि गंगा में स्नान करने मात्र से ही व्यक्ति के पाप धूल जाते हैं। इसको कई लोग कल्पना कहते होंगे लेकिन यह एक आधारभूत सत्य है। हर वर्ष करोड़ों लोग गंगा के जल में आस्था और श्रद्धा के साथ स्नान करते हैं।

भारत की नई सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जन आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी कार्यप्रणाली को तैयार किया है। नमामि गंगे योजना के तहत मोदी ने जिस संकल्प को अभिव्यक्त किया है, वैसा ही संकल्प आज देशवासियों को भी करने की आवश्यकता है। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि किसी महान कार्य को करने के सामूहिक संकल्प की आवश्यकता होती है, हम सभी भारत के नागरिकों को इस महान कार्य में अपना योगदान देने के लिए अग्रेषित की भूमिका में आना होगा। जिस प्रकार भगीरथ के त्याग तपों से गंगा मैया ने भूतल का अवगाहन किया, उसी प्रकार के त्याग और संकल्पों के हम सभी को करने की जरूरत है। हालांकि आज गंगा के भूतल पर लाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन राजा भगीरथ के कठोर प्रयासों के कारण जमीन पर आई गंगा को संरक्षित करने का पूरा जिम्मा हमारा ही तो है। जब हम गंगा को माँ कहते हैं तब हमारी भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। माँ की सेवा करना हर व्यक्ति का सौभाग्य होता है, सेवा करने का प्रतिफल उसे जीवन भर मिलता है।

वाराणसी की धरती पर उतरते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले शब्द यही थे ‘मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है’। अब मोदी सरकार पतित पावन गंगा को स्वच्छ और निर्मल करने का अपना वादा भी निभाने जा रही है। मोदी सरकार का पहला बजट सही मायनों में पूरे देश में हर हर गंगे का नारा गुंजायमान कर रहा है। मोदी ने चुनावों से पहले जो सपना देखा था, अब उसके पूरा होने की आहट सुनाई देने लगी है। नमामि गंगे नाम की गंगा संरक्षण की योजना के लिए सरकार ने पहली बार में ही 2037 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान किया है। केंद्र की मोदी सरकार ने निर्मल गंगा और अविरल गंगा की पहल करते हुए गंगा के घाटों के चौड़ीकरण और सुंदर बनाने की भी बात कही है।

मोदी सरकार ने जो ‘नमामि गंगेÓ मिशन की पूर्ति का संकल्प अपने सामने रखा है, उस पर देशवासियों का विश्वास है। हम सभी की आस्था और विश्वास मोदी सरकार के मिशन ‘नमामि गंगेÓ से जुड़ी है। इसका मुख्य कारण यह भी है कि यूपीए सरकार ने 1985 से 2007 तक जितनी राशि (2000 करोड़) गंगा की सफाई के लिए आबंटित की थी, जबकि मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में ही उससे अधिक राशि इस कार्य के लिए प्रदान किया है। मोदी सरकार के इस निर्णय की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। अब प्रतीक्षा है उस दिन की, जब हम गंगा मैया के वास्तविक निर्मल जलधारा के दर्शन कर सकेंगे।

भारत को गौरव प्रदान करने वाली नमामि गंगे योजना उस भारतीय समाज की आकांक्षाओं का हिस्सा है, जो लंबे समय से गंगा के उद्धार के लिए आवाज उठाता रहा है। माँ गंगा की शुद्धिकरण के लिए पूर्व की सरकारों ने भी प्रयास किए, लेकिन अधूरे मन से किए गए प्रयास कभी सफल परिणाम दे सकते। गंगा की दुर्दशा के लिए गंगा को प्रदूषित करने वाले जितने जिम्मेदार हैं, उससे कहीं ज्यादा वे लोग भी जिम्मेदार हैं जिन पर गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का दायित्व दिया गया था। बहुत सारे आन्दोलन हो गए, भाषण हो गए, अब इसे मिशन के रूप में गंगा पुत्र होने के नाते सरकार, समाज और देशवासियों को अंगीकृत करना होगा। यदि अधिकारी, मंत्री और कर्मचारी सही तरीके से ईमानदारी से अपना दायित्व पूर्ण करते, तो आज गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाया जा सकता था। आज आवश्यकता है कि गंगा की निर्मलता के लिए चलाए जाने वाले अभियानों को केवल चर्चा और विवाद का मुद्दा न बनाया जाए, वरन इस मिशन को गंगा पुत्र होने के नाते सरकार, समाज और देशवासियों को अंगीकृत करना होगा। ‘गंगा’ भारत की पहचान है। संसार के करोड़ों लोग गंगा के दर्शन के लिए भारत आते हैं। प्रत्येक भारतवासी के मन में गंगा के प्रति अदभुत आस्था है, इसकी अनुभूति आप किसी भी भारतीय से सहजता से प्राप्त कर सकेंगे। गंगा को ‘मैयाÓ कहकर उसे मोक्षदायिनी के रूप में प्रतिदिन स्मरण करने वाला हमारा समाज जीवन में कम से कम एक बार गंगा के तट पर जाकर उसके दर्शन की अभिलाषा लिए जीता है। इतना ही नहीं तो मृत्यु पूर्व गंगा जल का पान करने की कामना प्रत्येक के मन में होती है। आखिर कौन-सी शक्ति है गंगा में, जिसने अनंत काल से सबके हृदय को आस्था और विश्वास से ओतप्रोत कर रखा है?

क्यों हुई गंगा मैली

राष्ट्रीय नदी गंगा के उदगम स्थल से लेकर कदम-कदम पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश बिहार और बंगाल के कल-कारखानों का कचरा, गंदा पानी तथा अनुपचारित अपशिष्ट नदी में बेशर्मी एवं देश के कानूनों को ठेंगा दिखाते हुए चौबीसों घंटे उड़ेला जाता है। इस कारण गंगा और उसकी सहायक नदियां तेजी से गंदे नाले में तब्दील होती जा रही हैं। गंगा को प्रदूषित करनेवाले औद्योगिक इकाइयों में सबसे ज्यादा संख्या चमड़ा प्रसंस्करण कारखानों और बूचडख़ानों की है। गंगा के किनारे 444 चमड़ा कारखानें हैं, जिनमें 442 अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें ज्यादातर कानपुर में संचालित हैं। कानपुर में ही गंगा किनारे आधे दर्जन से अधिक बूचडख़ाने भी हैं जिनकी गंदगी सीधे गंगा में जाती है। कानपुर की टेनरियों से 22.1 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) खतरनाक कचरा और गंदा पानी निकलता है। ऐसे अनेक कारखानों और उद्योगों के रासायनिक अवशेष गंगा के प्रदूषण के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। चमड़ा साफ करनेवाले, लुगदी, कागज उद्योग, पेट्रोकेमिकल, रासायनिक खाद, रबड़ और ऐसे कई कारखानों की गंदगी गंगा में बहाए जाने के कारण औद्योगिक कचरा तेजी से बढ़ रहा है और उसका जहर नदी के बहुत से भाग में मछलियों को खत्म कर रहा है। गंगा किनारे सैंकड़ों शहर हैं, इन शहरों से प्रतिदिन लाखों टन मल और गंदगी गंगा में बहाया जा रहा है।

गंगा का उदगम

गंगा का सदियों पुराना धार्मिक पहलू है जो करोड़ों भारतीयों की आस्था के मूल में विद्यमान है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, यह पवित्र नदी भगवान शंकर की जटाओं से निकली है और इसे स्वर्ग से धरती पर लाने के लिए राजा भागीरथ ने कठोर तप किया था। इसमें स्नान करने से जीवन पवित्र होता है तथा अस्थियां विसर्जित करने से मोक्ष मिलता है। पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसी नदी होगी जिसके सन्दर्भ में जनमानस तथा धर्मग्रंथों में इस प्रकार की मान्यताएं तथा विश्वास निहित हों। गंगा स्नान के लिए विशेष तिथियां तथा कुम्भ मेला जैसे महान पर्व के साथ ही स्थान तथा शुभ मुहर्त भी निर्धारित हैं। इसी आस्था के कारण आज भी लाखों तीर्थ यात्री और विदेशी नागरिक इस पवित्र नदी पर स्नान करने के लिए, बिन बुलाए आते हैं और सारे प्रदूषण के बावजूद स्नान करते हैं। तांबा, पीतल के पात्र में पवित्र जल, अपने-अपने घर ले जाते हैं और पूजा-पाठ में उसका उपयोग करते हैं। यह आस्था, गंगा में लाखों लोगों के स्नान तथा अस्थियों के विसर्जन के बाद भी कम नहीं होती।

आज भी करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास है कि गंगाजल में कीटाणु नहीं पनपते और वह सालों साल खराब नहीं होता, और यह सत्य भी है। इसी क्रम में भूवैज्ञानिकों की मान्यता है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होने की विलक्षण क्षमता के पीछे उसके गंगोत्री के निकट मिलने वाली मसूरी अपनति संरचना (मसौरी सिंक्लिनल स्ट्रक्चर) है, जिसमें रेडियो एक्टिव खनिज मिलता है। गंगाजल में यह रेडियो एक्टिव पदार्थ अल्प मात्रा में होने के कारण, वह मनुष्यों के लिए नुकसानदेह नहीं है। प्रकृति नियंत्रित तथा उदगम स्थल पर उपलब्ध ऐसी विलक्षण विशेषता संसार की किसी अन्य नदी को प्राप्त नहीं है। यह विलक्षणता गंगा के महत्व को और भी बढ़ा देता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालने और गंगा पर शुरू किये गये कामों से लोगों में आशा जगी है। सभी आशान्वित हैं कि गंगा की स्वच्छता और निर्मलता पर जो काम तीन दशक में नहीं हुए वे पांच साल में ही परवान चढ़ जाएंगे। संभावनाओं के बीच गंगा को लेकर की गयी योजनाओं को साकार होते देख रही हैं। प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार से पहली बार गंगा पुनर्जीवन विभाग का गठन किया है वह निश्चित रूप से संकेत है कि इस बार गंगा पर होने वाला काम सफल होगा। वह भी गंगा पर काम कर चुकी साध्वी उमा भारती को गंगा पुनर्जीवन मंत्री का प्रभार देकर काम को अंजाम तक पहुंचाने की एक कड़ी लगती है। अब जरूरत है कि जो भी काम हो वह ईमानदारी से हो तो निश्चित रूप से गंगा की दुर्दशा के साथ उसकी निर्मलता को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

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