लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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-प्रवीण गुगगानी- modiji

वर्तमान में चल रहे लोकसभा चुनाव पिछले सभी आम चुनावों से कई दृष्टियों से भिन्न भी हैं और अनोखे भी. किसी एक व्यक्ति की इतनी आलोचना और किसी एक व्यक्ति विशेष भर की प्रशंसा से आकंठ डूबे इन आम चुनावों को नरेन्द्र मोदी केन्द्रित चुनाव नहीं बल्कि नमो मय चुनाव कहना ही अधिक उपयुक्त होगा. पक्ष हो या विपक्ष सभी ओर से केवल मोदी मय चर्चा, मोदी मय रैली, मोदी मय आलोचना, मोदी मय नारें, मोदी मय लेखन और मोदी मय समाचार पत्र-पत्रिका और मोदी मय टीवी दिखलाई पड़ रहा है.

मोदी को लेकर जितनें प्रतीक, उदाहरण, बिम्ब और विशेषण उपयोग किये जा रहे हैं, वे शब्द किसी एक व्यक्ति को ही लेकर इसके पूर्व कम ही उपयोग किये गए थे. बहुतेरे कुशल राजनीतिज्ञों ने नमो को लेकर बड़े ही संतुलित और बुद्धिमत्ता पूर्ण आचरण और शब्दों का प्रयोग किया है तो बहुतेरे ऐसे भी रहे जिन्होंने अति उत्साह में, स्वामी भक्ति में या नमो का नाम लेकर चर्चित भर हो जानें की आशा में नमो के लिए हलके और असंसदीय शब्दों का भी प्रयोग किया है. इस चुनाव का यह सार्वभौमिक सत्य है कि नमो का नाम या उल्लेख जिस राजनीतिज्ञ ने जिस भावना और जिस आशा से किया उसे उस अनुरूप सफलता भी मिली. अर्थ यह कि इस चुनाव में चाहे भाजपाई हो या समूचे अन्य राजनैतिक दलों के समूह से कोई बड़ा या छुटभैया नेता हो सभी ने नमो नाम के सहारे अपनी चुनावी वैतरणी पार की.

चुनावों के दौरान भाषायी स्तर का जिस प्रकार ह्रास हुआ वह निराशाजनक तो है किन्तु नेताओं की भाषा के इस सन्दर्भ में दीर्घकालीन सोच की भी आवश्यकता है. बहुत अच्छी भाषा में लोकतान्त्रिक सरोकारों और राष्ट्रवादी भाव को चोटिल करनें वाली शब्दावली उतनी ही घातक है, जितनी कि हल्की और अमर्यादित भाषा. इस प्रसंग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है कि छदम धर्म निरपेक्षता वादियों को आदर,सम्मान के विशेषण मिलने लगें और अपने धर्म, आस्थाओं, आग्रहों, प्रतीकों को मात्र सम्मान से देखने की परम्परा के वाहक देशवासियों को साम्प्रदायिक कहा जानें लगा. अब इस कड़ी में जो एक नयी बात जुड़ रही वह यह कि देश में राष्ट्रवाद, देश भक्ति, मिट्टी से जुड़ाव को हिटलर वाद या तानाशाही कहा जाने लगा है. राष्ट्रवादी व्यक्तियों, सोच या संस्थाओं को इस प्रकार तानाशाह शब्द से पुकारा जाना, इस देश में राष्ट्रवाद के भाव को दीर्घकालीन हानि पहुंचा कर सदमे, संत्रास और गहरे अवसाद की दशा में ला खड़ा कर सकता है.

नमो के लिए जो विशेषण उपयोग किये गए उसमें सर्वाधिक उपयोग किया जानें वाला एक शब्द हिटलर या तानाशाह है. प्रश्न यह है की यह हिटलर या तानाशाह शब्द किस प्रकार नमो पर सटीक बैठते हैं? अब हिटलर या तानाशाह शब्द कम से कम भारत में तो असंसदीय शब्द नहीं है और न ही सार्वजनिक रूप से इन शब्दों के बोलने सुनने में कोई मर्यादा का उल्लंघन होता है; किन्तु जिस व्यक्ति के विषय में यह शब्द कहा जाता है उसकी एक कठोर और पाषाण ह्रदय वाली छवि अवश्य सुनने और बोलनें वाले के मन-मानस में अंकित हो जाती है. हिटलर की छवि को तो अनेक मायनों में सकारात्मक रूप में भी देखा जा सकता है, किन्तु भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में हिटलरशाही के सकारात्मक गुण भी अस्वीकार्य और हेय दृष्टि से देखने का सामान्य प्रचलन है.

हिटलर पिछली शताब्दी के मध्य में दुनिया छोड़ चुका वह तानाशाह जर्मन शासक था जिसनें अपनी साधारण और शाकाहारी जीवन शैली, शुचिता पूर्ण शासन शैली के साथ किन्तु अतीव निर्ममता से राज करते हुए जर्मनी को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया और जर्मनियों के राष्ट्र गौरव को शिखर पर स्थापित कर दिया था. समूचे विश्व से लोहा लेने वाले इस योद्धा ने अपनी स्वयं की आर्य जाति को सर्वाधिक शुद्ध नस्ल और श्रेष्ठ जाति का खिताब देते हुए अपनी आत्मकथा मीन कांफ में स्वयं जर्मनी का भाग्य विधाता बताया था, और निस्संदेह वह था भी.

वर्तमान सन्दर्भों में हम हिटलर को और अधिक स्मरण न करते हुए मात्र इतना विचार करें कि नमो को किन गुणों, आदतों या विचारों के लिए हिटलर कहा जा रहा है? यह भी देखना होगा कि नमो को हिटलर या तानाशाह कौन और किस राजनैतिक दल से सम्बंधित लोग कह रहे हैं? यह देखना अतीव आवश्यक है कि नमो को तानाशाह कहने वाले राजनैतिक कार्यकर्ता अपने स्वयं के दल का और स्वयं के नेताओं का अतीत जानते हैं या नहीं? आज भाजपा में नमो की स्थिति को व्यक्तिवाद का उदाहरण बताने वाली कांग्रेस जार अपने “इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया” के बेहयाई भरे नारे का भी स्मरण करे तो उसे लगेगा कि व्यक्ति पूजा की हदों को वह दशकों पहले ध्वस्त कर चुकी है. इस सन्दर्भ में यह बात अब सटीक है कि या तो नौ सौ चूहे खाने वाली बिल्ली को हज करने की अनुमति देकर इस खूंखार बिल्ली को धार्मिक मान लिया जाए, या फिर इस खूंखार और भक्षी बिल्ली के चूहे खाने की आदतों, इतिहास और खतरनाक वर्तमान की समीक्षा कर ली जाए! हाल ही में जब सुशील शिंदे सहित कांग्रेस के लगभग सम्पूर्ण आला नेतृत्व ने नमो को हिटलर या तानाशाह की शब्दावली से नवाजा तो लगा कि इतिहास को खंगाल लेनें का समय आ गया है. इंदिरा गांधी जैसी नेता की पार्टी जिसने विश्व के सबसे पुराने और सबसे विशाल लोकतंत्र पर आपातकाल का गहरा काला धब्बा लगाया, वह यदि किसी अन्य नेता को हिटलर कहे तो नौ सौ चूहों वाली कहावत किसे याद न आयेगी भला! नमो को हिटलर कहने वाले कांग्रेसी क्या भूल गए हैं कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व इन आपातकाल की वाहक इंदिरा जी का वंश ही तो है! देश को इमरजेंसी के अविस्मर्णीय यातना युग में धकेलने वाले कांग्रेस पंथी नेता किस मूंह से हिटलर या तानाशाह शब्द का प्रयोग किसी अन्य राजनेता या विशेषतः नमो के लिए कर सकते हैं? यह समझ से परे है! कांग्रेस को हिटलर शब्द का प्रयोग करते समय यह स्मरण रखना पड़ेगा कि देश में हिटलर चरित्र के व्यक्तियों की सूची भारत में कांग्रेस के नेताओं से ही प्रारम्भ और कांग्रेस के नेताओं पर ही ख़त्म होती है.

इससे भी बढ़कर यदि हम किसी राष्ट्रवादी और राष्ट्रभक्त व्यक्ति चाहे वह किसी भी दल का हो; को यदि हिटलर या तानाशाह की उपमा या विशेषण देने का नैतिक और राजनैतिक अपराध करनें लगें तो इससे देश का राजनैतिक वातावरण और भावी राष्ट्रवादी नागरिकों के निर्माण का वातावरण दूषित ही होगा. कांग्रेस और उसके नेताओं को देश में आपातकाल लगानें के अपनें निर्णय पर विचार करके और क्षमा मांग कर ही किसी अन्य को तानाशाह कहनें का अवसर मिल सकता है; किसी भी अन्य परिस्थिति में नहीं.

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