लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-खुर्शीद आलम-

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जयपुर में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के 24वें अधिवेशन के दूसरे दिन जफर सरेशवाला को लेकर जो कुछ हुआ वह कई लिहाज़ से चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां यह सवाल मीडिया में हो रहा है कि यदि पर्सनल ला का मतलब मुसलमानों के पारिवारिक कानून से है तो फिर बोर्ड के प्लेटफार्म से राजनीति क्यों की जा रही है? क्या बोर्ड कुछ सियासी लोगों के हाथों में कैद है और वह उसको अपनी मर्ज़ी से चला रहे हैं? बोर्ड इन सभी आरोपों का खंडन करता है लेकिन जयपुर में जो कुछ हुआ वह उसकी कथनी और करनी को दर्शाता है जिसकी वजह से बोर्ड सवालों के घेरे में है। सवाल यह भी है कि क्या बोर्ड में ऐसा पहली बार हुआ है या फिर इस तरह की घटना पहले भी हुई है। जानकार मानते हैं कि बोर्ड सदस्यों में एक समूह ऐसा है जिसका पूरा झुकाव कांग्रेस की तरफ है जबकि दूसरा समूह समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है। यह सही है कि कांग्रेस और समाजवादी से जुड़े सदस्य सीधे तौर पर ऐसी बात नहीं करते हैं जिससे उन पर किसी तरह का आरोप लगे लेकिन उनकी गतिविधि का सारा केन्द्र पार्टी हित के इर्द गिर्द ही रहता है। यही वजह है कि समय-समय पर बोर्ड के सियासी इस्तेमाल की कोशिशें भी की जाती रहीं है। वह कितनी कामयाब हुई या नाकाम की बहस से हट कर जयपुर के बोर्ड अधिवेशन में जो कुछ हुआ वह बोर्ड के इतिहास में पहली बार हुआ जब कार्यक्रम की कार्यवाही 15 मिनट के लिए रोकी गई। ऐसा इसलिए हुआ कि मोदी के करीबी समझे जाने वाले ज़फर सरेशवाला वहां मौजूद थे।

सवाल यह है कि जफर सरेशवाला क्या बिना बुलाए आए थे जिसकी वजह से कार्यवाही रोकने के साथ आयोजकों को यह घोषणा करना पड़ी कि जो लोग आमंत्रित नहीं हैं वह यहां से चले जाऐं। जफर सरेशवाला कहते हैं कि उन्हें बोर्ड के ज़िम्मेदारों ने बुलाया था जिसमें वह नदवातुल उलेमा लखनऊ के शिक्षक एवं बोर्ड सदस्य मौलाना सैयद सलमान हसनी नदवी का नाम लेते हैं। इसके बावजूद उनके आगमन पर मुस्लिम मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन सांसद असद उददीन उवैसी ने जिस तरह हंगामा किया और उन्हें बाहर करने की गुहार लगाई और इसे अपने सम्मान से जोड़ दिया। उसके चलते पूरा कार्यक्रम अफरा तफरी का शिकार हो गया और देखते देखते हाल में चीख पुकार शुरू हो गई जिसके बाद आयोजकों के लिए स्थित को सामान्य बनाने के लिए मंच से यह घोषणा करना पड़ी कि जो लोग बोर्ड सदस्य के अतिरिक्त बुलाए गए हैं वह यहां से बाहर चले जाए ताकि कार्यवाही शुरू की जा सके। बोर्ड पदाधिकारी सरेशवाला के बुलाने पर मौन हैं इससे उनकी बात को बल मिलता है कि उन्हें बुलाया गया था और वह बिना बुलाए नहीं आए हैं। जो खबरें बाद में आयी हैं उसके मुताबिक जफर सरेशवाला होटल से कार्यक्रम स्थल तक बोर्ड अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी के साथ कार में आए थे और मौलाना सलमान नदवी ने उन्हें फ़ोन कर मंच के पास बुलाया था जबकि उन्हें एयरपोर्ट तक छोड़ने जाने की भी सूचना है।

ज्ञात रहे गत दिनों जफर सरेशवाला ने बोर्ड अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी से लखनऊ स्थित नदवातुल उलेमा जाकर मुलाकात की थी और उन्हें प्रधानमंत्री का वह पत्र दिया था जो उन्होंने उनकी की किताब पढ़कर उन्हें लिखा था। इस मुलाकात के बाद सुरेशवाला ने मीडिया से बात करते हुए मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारियों पर निशाना साधा था। इससे मुस्लिम नेतृत्व जो पहले ही उनके खिलाफ था, लामबंद हो गया। जयपुर में जो कुछ हुआ वह आश्चर्यजनक नहीं था लेकिन क्या बोर्ड सदस्यों द्वारा यह हंगामा इस्लामी शिक्षा को दर्शाता है? क्या किसी के खुद से आने पर इस तरह का व्यवहार सभ्य समाज को शोभा देता है, वह भी एक ऐसे कार्यक्रम में जहां देश भर के उलेमा जमा हैं और जो रात दिन इस्लामी शिक्षा के अनुसार अपने आचरण को सुधारने की नसीहत करते हैं। क्या उन पर यह नसीहत लागू नहीं होती, क्या वह इससे ऊपर हैं कि जो चाहे करें, वह स्वतंत्र हैं और उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं। निश्चय ही बोर्ड सदस्यों के इस आचरण का समर्थन नहीं किया जा सकता, वह निंदा का पात्र है इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है। किसी अनचाहे व्यक्ति के आ जाने पर उसका सबसे अच्छा तरीका यह था कि बोर्ड का कोई पदाधिकारी उनके पास जाकर कान में धीरे से कहता कि यह कार्यक्रम सिर्फ सदस्यों के लिए है निःसंदेह वह व्यक्ति वहां से चला जाता लेकिन मंच से उनको जाने के लिए कहना बोर्ड सदस्यों जिनमें बहुसंख्या उलेमा की है, इस्लामी शिष्टाचार के खिलाफ है।

यह बात भी कम अहम नहीं है कि एक तरफ तो सरेशवाला के आगमन पर नाराजगी जताई जा रही है लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि हाल में 800 कुर्सियां क्यों लगाई गईं, वह भी जब बोर्ड सदस्यों की संख्या 251 है जिसमें से 155 सदस्य उपस्थित हुए और 300 लोगों को विशेष आमंत्रण के तौर पर बुलाया गया था। उस पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। लेकिन जिस तरह सरेशवाला के आगमन पर हंगामा हुआ उससे इस बात का संकेत मिलता है कि बोर्ड में दो ग्रुप हैं जो अपने वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं लेकिन इस घटना के संदर्भ में जो ग्रुप उभरकर सामने आया है वह सियासी ग्रुप है अर्थात यह वह सदस्य हैं जो कांग्रेस और समाजवादी से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। बोर्ड पर कांग्रेस लाबी का वर्चस्व रहा है, से उसके समर्थक भी इंकार नहीं करते हैं। मुस्लिम पसर्नल ला बोर्ड का सियासी झुकाव उस समय से ज़्यादा हो गया है जब से बोर्ड में कांग्रेस पार्टी से जुड़े मुस्लिम नेताओं को बोर्ड का सदस्य बनाया गया। कोलकाता में बोर्ड अधिवेशन में तत्कालीन सांसद मोहम्मद अदीब जो कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे को बोर्ड का सदस्य बनाया गया। भोजन के लिए होटल जाते समय इस स्तंभकार ने उन्हें मुबारकबाद देते हुए सुझाव दिया कि बोर्ड में सभी सियासी पार्टियों सहित भाजपा के मुस्लिम नुमाइंदों को सदस्यता दी जानी चाहिए इस पर वह काफी नाराज़ हो गए और रास्ते भर इसका इज़कार करते रहे। लेकिन यह सवाल आज भी उतना ही प्रसांगिक है।

कहा तो यह भी जा रहा है कि समाजवादी पार्टी से जुड़े लोग भी सरेशवाला का बैठक में विरोध करते लेकिन मुलायम सिंह के घर शादी में जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उपस्थित हुए उसने इस समीकरण को बदल दिया जिसका बोर्ड सदस्य एवं उत्तर प्रदेश के एडवोकेट जनरल ज़फरयाब जीलानी के इस ब्यान से आभास होता है जिसमें उन्होंने बोर्ड पदाधिकारियों की प्रधानमंत्री से मुलाकात की संभावना व्यक्त करते हुए कहा कि बोर्ड के सामने जिस तरह के मुददे विचाराधीन हैं उसमें उनसे मुलाक़ात हो सकती हे जिसका फैसला बोर्ड की बैठक में लिया जा सकता है। उनके इस स्वर के बाद असल मामला कांग्रेस से जुड़े बोर्ड सदस्यों का था जो किसी भी स्तर पर इस तरह के प्रयास का विरोध कर रहे थे। सरेशवाला के अनुसार वह लोग ऐसा इसलिए कर रहे थे कि उनकी सियासी दुकान बंद हो रही थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि बोर्ड की कार्यकारिणी जो सर्वेच्च बॉडी है के सदस्यों की संख्या 51 है। इस अधिवेशन में एक बैठक कार्यकारिणी सदस्यों की भी हुई जिसमें 33 सदस्य शरीक हुए और 2 लोग जो बोर्ड की कार्यकारिणी के सदस्य नहीं हैं, जबरदस्ती इस बैठक में शरीक हो गए। इनमें एक नाम लंदन में रहने वाले गुजराती ईसा मंसूरी का है।

अहम सवाल यह है कि क्या वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुस्लिम नेतृत्व से मिलने के लिए इतने बेचैन हैं, जिसका इज़हार क्या जा रहा है। यह जानने के बावजूद कि वर्तमान मुस्लिम नेतृत्व का कांग्रेस-प्रेम किसी से छुपा नहीं है, या फिर मुस्लिम नेतृत्व द्वारा अपनी हैसियत को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है ताकि उस पर यह आरोप न लगसके कि वह सत्त्ता से करीब रहे बिना नहीं रह सकता। मुस्लिम नेतृत्व द्वारा बार बार प्रधानमंत्री का नाम लेकर मुलाक़ात न करने की बात कांग्रेस पर दबाव बनाए रखने के तौर पर भी देखी जा रही है। लोकसभा चुनाव के समय जिस तरह मुस्लिम संगठनों की अपीलें धराशाई हो गईं और उत्तरप्रदेष में मुसलमान सियासी तौर पर हाशिए पर चले गए। दिल्ली विधान सभा चुनाव में मुस्लिम संगठनों की अपील के विपरीत मुसलमानों ने जो फैसला किया उससे उनका सियासी प्रतिनिधित्व विधानसभा में न केवल सामने आया बल्कि पुराने सियासी मुस्लिम नेतृत्व को भी उखाड़ फेंका। क्या इसके बाद भी मुस्लिम संगठन यह समझती हैं कि वह सियासत में आज भी महत्व रखती हैं, किसी भ्रम से कम नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया है उस परिपेक्ष में अगली कड़ी मुस्लिम संगठनों की है जो कांग्रेस समर्थक हैं। यह बात जितनी अच्छी तरह यह संगठन जानते हैं उससे कहीं ज़्यादा मोदी सरकार जानती है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने हित के चलते कल तक कांग्रेस के प्लेटफॉर्म से उसका गुणगान कर रहे थे और आज मोदी से मिलने की वकालत कर सरकार के समीप अपना कद ऊंचा करना चाहते हैं। क्या यह समझा जाए कि घर वापसी और धर्मांतरण जैसे मुददों को लेकर यदि बोर्ड प्रधानमंत्री से मिलता है तो वह इस इंतज़ार में है कि बोर्ड उनसे मिले और भय के इस वातारण को ख़त्म करने का आदेष दें या फिर इसके पीछे सरकार की सोच है कि जब सभी वर्ग, धर्म के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री से मिल रहे हैं मुसलमानों के किसी प्रतिनिधि मण्डल के मुलाक़ात न करने का अच्छा पैग़ाम नहीं जा रहा है। इसलिए ज़फर सरेशवाला और उनसे सम्पर्क रखने वाले बोर्ड सदस्य मुफ्ती एज़ाज़ अरशद क़ासमी द्वारा यह कोशिश हो रही है ताकि इसे संभव बनाया जा सके।

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musखुरशीद आलम

जयपुर में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के २४वें अधिवेशन के दूसरे दिन जफर सुरेशवाला को लेकर जो कुछ हुआ वह कई लिहाज़ से चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां यह सवाल मीडिया में हो रहा है कि यदि पर्सनल ला का मतलब मुसलमानों के पारिवारिक कानून से है तो फिर बोर्ड के प्लेटफार्म से राजनीति क्यों की जा रही है? क्या बोर्ड कुछ सियासी लोगों के हाथों में कैद है और वह उसको अपनी मर्जी से चला रहे हैं? बोर्ड इन सभी आरोपों का खंडन करता है लेकिन जयपुर में जो कुछ हुआ वह उसकी कथनी और करनी को दर्शाता है जिसकी वजह से बोर्ड सवालों के घेरे में है। सवाल यह भी है कि क्या बोर्ड में ऐसा पहली बार हुआ है या फिर इस तरह की घटना पहले भी हुई है। जानकार मानते हैं कि बोर्ड सदस्यों में एक समूह ऐसा है जिसका पूरा झुकाव कांग्रेस की तरफ है जबकि दूसरा समूह समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है। यह सही है कि कांग्रेस और समाजवादी से जुड़े सदस्य सीधे तौर पर ऐसी बात नहीं करते हैं जिससे उन पर किसी तरह का आरोप लगे लेकिन उनकी गतिविधि का सारा केन्द्र पार्टी हित के इर्द गिर्द ही रहता है। यही वजह है कि समय-समय पर बोर्ड के सियासी इस्तेमाल की कोशिशें भी की जाती रहीं है। वह कितनी कामयाब हुई या नाकाम की बहस से हट कर जयपुर के बोर्ड अधिवेशन में जो कुछ हुआ वह बोर्ड के इतिहास में पहली बार हुआ जब कार्यक्रम की कार्यवाही १५ मिनट के लिए रोकी गई। ऐसा इसलिए हुआ कि मोदी के करीबी समझे जाने वाले ज़फर सुरेशवाला वहां मौजूद थे।

सवाल यह है कि जफर सुरेशवाला क्या बिना बुलाए आए थे जिसकी वजह से कार्यवाही रोकने के साथ आयोजकों को यह घोषणा करना पड़ी कि जो लोग आमंत्रित नहीं हैं वह यहां से चले जाऐं। जफर सुरेशवाला कहते हैं कि उन्हें बोर्ड के जि़म्मेदारों ने बुलाया था जिसमें वह नदवातुल उलेमा लखनऊ के शिक्षक एवं बोर्ड सदस्य मौलाना सैयद सलमान हसनी नदवी का नाम लेते हैं। इसके बावजूद उनके आगमन पर मुस्लिम मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन सांसद असद उददीन उवैसी ने जिस तरह हंगामा किया और उन्हें बाहर करने की गुहार लगाई और इसे अपने सम्मान से जोड़ दिया। उसके चलते पूरा कार्यक्रम अफरा तफरी का शिकार हो गया और देखते देखते हाल में चीख पुकार शुरू हो गई जिसके बाद आयोजकों के लिए स्थित को सामान्य बनाने के लिए मंच से यह घोषणा करना पड़ी कि जो लोग बोर्ड सदस्य के अतिरिक्त बुलाए गए हैं वह यहां से बाहर चले जाए ताकि कार्यवाही शुरू की जा सके। बोर्ड पदाधिकारी सुरेशवाला के बुलाने पर मौन हैं इससे उनकी बात को बल मिलता है कि उन्हें बुलाया गया था और वह बिना बुलाए नहीं आए हैं। जो खबरें बाद में आयी हैं उसके मुताबिक जफर सुरेशवाला होटल से कार्यक्रम स्थल तक बोर्ड अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी के साथ कार में आए थे और मौलाना सलमान नदवी ने उन्हें फ़ोन कर मंच के पास बुलाया था जबकि उन्हें एयरपोर्ट तक छोड़ने जाने की भी सूचना है।

ज्ञात रहे गत दिनों जफर सुरेशवाला ने बोर्ड अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी से लखनऊ स्थित नदवातुल उलेमा जाकर मुलाकात की थी और उन्हें प्रधानमंत्री का वह पत्र दिया था जो उन्होंने उनकी की किताब पढ़ कर उन्हें लिखा था। इस मुलाकात के बाद सुरेशवाला ने मीडिया से बात करते हुए मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारियों पर निशाना साधा था। इससे मुस्लिम नेतृत्व जो पहले ही उनके खिलाफ था, लामबंद हो गया। जयपुर में जो कुछ हुआ वह आश्चर्यजनक नहीं था लेकिन क्या बोर्ड सदस्यों द्वारा यह हंगामा इस्लामी शिक्षा को दर्शाता है? क्या किसी के खुद से आने पर इस तरह का व्यवहार सभ्य समाज को शोभा देता है, वह भी एक ऐसे कार्यक्रम में जहां देश भर के उलेमा जमा हैं और जो रात दिन इस्लामी शिक्षा के अनुसार अपने आचरण को सुधारने की नसीहत करते हैं। क्या उन पर यह नसीहत लागू नहीं होती, क्या वह इससे ऊपर हैं कि जो चाहे करें, वह स्वतंत्र हैं और उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं। निश्चय ही बोर्ड सदस्यों के इस आचरण का समर्थन नहीं किया जा सकता, वह निंदा का पात्र है इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है। किसी अनचाहे व्यक्ति के आ जाने पर उसका सबसे अच्छा तरीका यह था कि बोर्ड का कोई पदाधिकारी उनके पास जाकर कान में धीरे से कहता कि यह कार्यक्रम सिर्फ सदस्यों के लिए है निःसंदेह वह व्यक्ति वहां से चला जाता लेकिन मंच से उनको जाने के लिए कहना बोर्ड सदस्यों जिनमें बहुसंख्या उलेमा की है, इस्लामी शिष्टाचार के खिलाफ है।

यह बात भी कम अहम नहीं है कि एक तरफ तो सुरेशवाला के आगमन पर नाराजगी जताई जा रही है लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि हाल में ८०० कुर्सियां क्यों लगाई गईं, वह भी जब बोर्ड सदस्यों की संख्या २५१ है जिसमें से १५५ सदस्य उपस्थित हुए और ३०० लोगों को विशेष आमंतरण के तौर पर बुलाया गया था। उस पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। लेकिन जिस तरह सुरेशवाला के आगमन पर हंगामा हुआ उससे इस बात का संकेत मिलता है कि बोर्ड में दो ग्रुप हैं जो अपने वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं लेकिन इस घटना के संदर्भ में जो ग्रुप उभरकर सामने आया है वह सियासी ग्रुप है अर्थात यह वह सदस्य हैं जो कांग्रेस और समाजवादी से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। बोर्ड पर कांग्रेस लाबी का वर्चस्व रहा है, से उसके समर्थक भी इंकार नहीं करते हैं। मुस्लिम पसर्नल ला बोर्ड का सियासी झुकाव उस समय से ज़्यादा हो गया है जब से बोर्ड में कांग्रेस पार्टी से जुड़े मुस्लिम नेताओं को बोर्ड का सदस्य बनाया गया। कोलकाता में बोर्ड अधिवेशन में तत्कालीन सांसद मोहम्मद अदीब जो कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे को बोर्ड का सदस्य बनाया गया। भोजन के लिए होटल जाते समय इस स्तंभकार ने उन्हें मुबारकबाद देते हुए सुझाव दिया कि बोर्ड में सभी सियासी पार्टियों सहित भाजपा के मुस्लिम नुमाइंदों को सदस्यता दी जानी चाहिए इस पर वह काफी नाराज़ हो गए और रास्ते भर इसका इज़कार करते रहे। लेकिन यह सवाल आज भी उतना ही प्रसांगिक है।

कहा तो यह भी जा रहा है कि समाजवादी पार्टी से जुड़े लोग भी सुरेशवाला का बैठक में विरोध करते लेकिन मुलायम सिंह के घर शादी में जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उपस्थित हुए उसने इस समीकरण को बदल दिया जिसका बोर्ड सदस्य एवं उत्तरप्रदेश के एडवोकेट जनरल ज़फरयाब जीलानी के इस ब्यान से आभास होता है जिसमें उन्होंने बोर्ड पदाधिकारियों की प्रधानमंत्री से मुलाकात की संभावना व्यक्त करते हुए कहा कि बोर्ड के सामने जिस तरह के मुददे विचाराधीन हैं उसमें उनसे मुलाक़ात हो सकती हे जिसका फैसला बोर्ड की बैठक में लिया जा सकता है। उनके इस स्वर के बाद असल मामला कांग्रेस से जुड़े बोर्ड सदस्यों का था जो किसी भी स्तर पर इस तरह के प्रयास का विरोध कर रहे थे। सुरेशवाला के अनुसार वह लोग ऐसा इसलिए कर रहे थे कि उनकी सियासी दुकान बंद हो रही थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि बोर्ड की कार्यकारिणी जो सर्वेच्च बाडी है के सदस्यों की संख्या ५१ है। इस अधिवेशन में एक बैठक कार्यकारिणी सदस्यों की भी हुई जिसमें ३३ सदस्य शरीक हुए और २ लोग जो बोर्ड की कार्यकरिणी के सदस्य नहीं हैं, जबरदस्ती इस बैठक में शरीक हो गए। इनमें एक नाम लंदन में रहने वाले गुजराती ईसा मंसूरी का है।

अहम सवाल यह है कि क्या वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुस्लिम नेतृत्व से मिलने के लिए इतने बेचैन हैं, जिसका इज़हार क्या जा रहा है। यह जानने के बावजूद कि वर्तमान मुस्लिम नेतृत्व का कांग्रेस प्रेम किसी से छुपा नहीं है, या फिर मुस्लिम नेतृत्व द्वारा अपनी हैसियत को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है ताकि उस पर यह आरोप न लग सके कि वह सत्त्ता से करीब रहे बिना नहीं रह सकता। मुस्लिम नेतृत्व द्वारा बार बार प्रधान मंत्री का नाम लेकर मुलाक़ात न करने की बात कांग्रेस पर दबाव बनाए रखने के तौर पर भी देखी जा रही है। लोकसभा चुनाव के समय जिस तरह मुस्लिम संगठनों की अपीलें धराशाही हो गईं और उत्तरप्रदेश में मुसलमान सियासी तौर पर हाषिए पर चले गए। दिल्ली विधान सभा चुनाव में मुस्लिम संगठनों की अपील के विपरीत मुसलमानों ने जो फैसला किया उससे उनका सियासी प्रतिनिधित्व विधानसभा में न केवल सामने आया बल्कि पुराने सियासी मुस्लिम नेतृत्व को भी उखाड़ फेंका। क्या इसके बाद भी मुस्लिम संगठन यह समझती हैं कि वह सियासत में आज भी महत्व रखती हैं, किसी भ्रम से कम नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया है उस परिपेक्ष में अगली कड़ी मुस्लिम संगठनों की है जो कांग्रेस समर्थक हैं। यह बात जितनी अच्छी तरह यह संगठन जानते हैं उससे कहीं ज़्यादा मोदी सरकार जानती है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने हित के चलते कल तक कांग्रेस के प्लेटफार्म से उसका गुणगान कर रहे थे और आज मोदी से मिलने की वकालत कर सरकार के समीप अपना कद उचाँ करना चाहते हैं। क्या यह समझा जाए कि घर वापसी और र्धमातरण जैसे मुददों को लेकर यदि बोर्ड प्रधानमंत्री से मिलता है तो वह इस इंतिज़ार में है कि बोर्ड उनसे मिले और भय के इस वातारण को ख़्ात्म करने का आदेश दें या फिर इसके पीछे सरकार की सोच है कि जब सभी वर्ग, धर्म के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री से मिल रहे हैं मुसलमानों के किसी प्रतिनिधि मण्डल के मुलाक़ात न करने का अच्छा पैग़ाम नहीं जा रहा है। इसलिए ज़फर सुरेशवाला और उनसे सम्पर्क रखने वाले बोर्ड सदस्य मुफ्ती एज़ाज़ अरशद क़ासमी द्वारा यह कोशिश हो रही है ताकि इसे संभव बनाया जा सके।

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