लेखक परिचय

एल. आर गान्धी

एल. आर गान्धी

अर्से से पत्रकारिता से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में जुड़ा रहा हूँ … हिंदी व् पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है । सरकारी सेवा से अवकाश के बाद अनेक वेबसाईट्स के लिए विभिन्न विषयों पर ब्लॉग लेखन … मुख्यत व्यंग ,राजनीतिक ,समाजिक , धार्मिक व् पौराणिक . बेबाक ! … जो है सो है … सत्य -तथ्य से इतर कुछ भी नहीं .... अंतर्मन की आवाज़ को निर्भीक अभिव्यक्ति सत्य पर निजी विचारों और पारम्परिक सामाजिक कुंठाओं के लिए कोई स्थान नहीं .... उस सुदूर आकाश में उड़ रहे … बाज़ … की मानिंद जो एक निश्चित ऊंचाई पर बिना पंख हिलाए … उस बुलंदी पर है …स्थितप्रज्ञ … उतिष्ठकौन्तेय

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एल.आर.गाँधी

पांचवी कक्षा की ऐश्वर्या पराशर के एक दक्ष प्रशन ने समूची सरकार को असमंजस में डाल दिया ! गाँधी जी को राष्ट्रपिता बता कर उनके नाम पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकने वाले सफेदपोश काले अंग्रेज़ और खुद को बापू के वारिस बता कर छह दशकों से भारत पर राज करने वाले ‘नकली गाँधी’ भी निरुतर रह गए.

ऐश्वर्या का प्रश्न था कि ‘महात्मा गाँधी को क्या कभी आधिकारिक तौर पर ‘राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई थी …. लखनऊ आर.टी आई दफ्तर से प्रधानमंत्री आफिस तक किसी के पास उत्तर नहीं था…कुछ लोगों का मानना है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी ने एक बार रंगून रेडियो से लोगों को संबोधित करते हुए महात्मा गाँधी को यह उपाधि प्रदान की. इतिहास में जाएं तो गाँधी जी ने सुभाष को त्रिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर भी ..इसे अपनी हार बताया क्यों कि वे पट्टाभि सीतारमय्या को अध्यक्ष बनाना चाहते थे …सुभाष जी को आखिर त्याग पत्र दे कर अलग होना पड़ा. . नेहरु-गाँधी राज -भक्त इतिहास लेखकों का तो यह पक्का विश्वास है कि पंडित नेहरु ने सबसे पहले ‘बापू’ को ‘राष्ट्रपिता’ कह कर संबोधित किया . बात कुछ जंचती भी है , क्योंकि यह बापू ही थे जिन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल को पंद्रह में से तेरह राज्यों के समर्थन के बावजूद , नेहरु को देश का प्रधान मंत्री बनवाया! अपने बापू या राष्ट्र के पिता के बारे में नेहरु जी के निजी विचार क्या थे ? गौर फरमाइए ! १९५५ में कनाडियन प्रधानमंत्री लेस्टर पियर्सन भारत भ्रमण पर आए ….उन्होंने नेहरु जी से जब ‘राष्ट्रपिता ‘ उर्फ़ मोहनदास कर्म चंद गाँधी जी के बारे में एक प्रशन किया तो नेहरु जी के दिल की बात अकस्मात उनके मुंह पर आ गई…. ‘ओह ! वह भयंकर ढोंगी बूढा ?

पिछले पैंसठ बरस से देश के बच्चों को पढाया जा रहा था कि गाँधी जी ‘राष्ट्रपिता’ हैं…. मगर आज ‘पांचवी कक्षा ‘ की छात्र ऐश्वर्या के दक्ष प्रशन … राष्ट्रपिता क्यों और कैसे ! पर गांधीजी के सेकुलर शैतान चुप हैं… ! गाँधी जी यदि नेहरूजी के राष्ट्र पिता थे तो बापू ‘भयंकर ढोंगी बूढा’ कैसे हो गए . यह वही बापू थे जिन्होंने फ़िरोज़ खान घांदी को फ़िरोज़ गाँधी नाम दिया …नेहरु की नाक कि खातिर ! . फ़िरोज़ खान घांदी से निकाह कर इंदिरा जी तो मैमुना बेगम उर्फ़ इंदिरा खान हो गई थी. गाँधी जी की कृपा से आज नेहरु-इंदिरा परिवार गांधीजी की विरासत संभाले देश पर हकुमत कर रहा है और गांधीजी के असली वारिस चार पुत्र और उनकी संतान गुमनामी के अंधेरों में गुम हैं. ..जयेष्ट पुत्र हिरा लाल तो अपने बापू की बेरुखी से बेज़ार हो कर इस्लाम कबूल कर अब्दुल्लाह गाँधी हो गए, बाकि के मणि लाल, राम दास और देवदास को कोई जानता तक नहीं…

जिन्हें गाँधी जी ने बड़े चाव से ‘ कायदे आज़म’ की उपाधि से नवाज़ा था … जिन्ना भी उन्हें थर्ड क्लास रेलवे कम्पार्टमेंट में सफ़र करने का दिखावा करने वाला ‘ ढोंगी’ पुकारते थे. शायद इस लिए भी कि ‘बापू’ को अंग्रेज़ सरकार द्वारा मुहय्या करवाया गया थर्ड क्लास कम्पार्टमेंट फर्स्ट क्लास की सभी सुविधाओं से परिपूर्ण था. बापू के मुस्लिम प्रेम और पाकिस्तान परस्ती को देखते हुए तो कुछ आलोचक उन्हें पाक-राष्ट्रपिता मानते हैं. यह बापू की ही जिद थी कि नेहरु की केबिनेट को अपना वह फैसला तुरंत बदलना पड़ा, जब पाक को देय ५५ करोड़ रूपए पर केंद्र सरकार ने रोक लगा दी थी , क्योंकि पाक ने हमला कर कश्मीर के बड़े भूभाग पर कब्ज़ा कर लिया था. बापू का वध करने वाले नाथू राम गोडसे भी विभाजन के वक्त पाकिस्तानी शैतानों के सताये हुए हिन्दू परिवारों में से ही एक

थे…. और ये हिन्दू बापू के मुस्लिम प्रेम से बेज़ार और आक्रोशित थे.

इसी लिए नयी पीढ़ी के इस सवाल ,…. बापू को राष्ट्रपिता कब और किसने बनाया ? का उत्तर , आज उन लोगों के पास भी नहीं जिन्होंने अपनी सुविधा और स्वार्थ के अनुसार गांधीजी को कभी ‘राष्ट्रपिता और कभी ‘भयंकर ढोंगी बूढा ‘ प्रचारित किया !

 

 

 

 

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