लेखक परिचय

केशव आचार्य

केशव आचार्य

मंडला(म.प्र.) में जन्‍म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से प्रसारण पत्रकारिता में एमए तथा मीडिया बिजनेस मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल कीं। वर्तमान में भोपाल से एयर हो रहे म.प्र.-छ.ग. के प्रादेशिक चैनल में कार्यरत।

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छत्तीसगढ़ के एक प्रादेशिक चैनल में काम करते हुए एक बार नक्सलियों के विचारों और कार्यशैली को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान नक्सलियों ने तत्कालीन गृहमंत्री को जान से मारने को लिये एक धमकी भरा पत्र लिखा था जिसे सबसे पहले मीडिया मे हमारे चैनल ने दिखाया यह दिन की सबसे बड़ी ख़बर तो थी ही लेकिन इस ख़बर ने मुझे इस बात को सोचने में मज़बूर कर दिया कि आखिर इन नक्सलियों की मांगें इस तरह से क्यों हैं औऱ मीडिया ने सामाजिक पहलू से इस पूरी बिरदारी और इनकी जायज या नाजायज मांगों के बीच क्या भूमिका निभाई। नक्सलवाद कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का वो अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्यूनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ।

नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने १९६७ मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। इन कामरेडों का मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और परिणामस्वरुप कृषितंत्र पर दबदबा हो गया है; और यह सिर्फ़ सशस्त्र क्रांति से ही खत्म किया जा सकता है। १९६७ में “नक्सलवादियों” ने कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग हो गये और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। १९७१ में मजूमदार की मौत के बाद नक्सलवाद कई शाखाओं में बट गया और अलग अलग पार्टियां बना कर काम करने लगा। लेकिन जैसे जैसे नक्सलवादियों का प्रभाव समाज में बढने लगा इनके आंदोलन का मूल सिंद्धात भी बदलता गया वर्तमान में नक्सलबाद सिर्फ एक भटका हुआ आंदोलन मात्र बनकर रह गया है। कुछ अशांत दिमाग के चलते शोषण मुक्त समाज की अवधारणा वाले इस आंदोलन ने लोगों को वेबज़ह परेशान करने और आमदनी का एक ज़रिया मात्र बनाकर रख दिया है। नक्सलवाद का मूल सिंद्धात बदलकर अब सिर्फ हिंसा तक केंद्रित रह गया है। इनका संघर्ष सर्वहिताय से हटकर राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र बनकर रह गया है।

….अगर हम बात करें छतीसगढ की तो आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र की तो यहां पुलिस दवाब से बचने के लिये बस्तर में तीन दशक पुर्व आये नक्‍सलियों ने प्रारम्भ में तो बस्तर के वन प्रान्त को सिर्फ शरण स्थाली के रूप में इस्तोमाल किया परन्तु कालान्तर में उन्होंने महसूस किया यहां भी कमावेश शोषण की वही हालात मौजूद है जिसके वह विरोध करते रहें है। आंध्र और महाराष्‍ट्र की सीमा में शरण लेने पहुचे नक्‍सलियों ने अपने लिये बस्तर में अनुकूल आशंका रहित वातावरण स्रजित करने के लिऐ क्षेत्रीय ग्रामीणों के बीच अपनी पैठ बनाई। शोषण के विरूद्ध उनकी इस लडाई ने जहां एक तरफ दमन कारी शासकीय नीतियों और सरकारी शोषणकर्ताओं से उन्हें मुक्ति दिलाई वही नक्सललियों को दादा जैसे सम्मान तक पहुचा दिया लेकिन समय के साथ ही नक्सललियों के इस शोषण विरोधी अभियान का स्वरूप बदलता गया और आज एक सामाजिक शूल के रूप में सामने आया है।

आज नक्सलियों का जो स्वरूप है उसकी वजह सिर्फ उनका हाथियार आतंक है जिसकी वजह उनकी हिंसा है। इस वजह से अब उन्हें उथ्धा के रूप में देखने का वातावरण समाप्त हो चुका है और पाचं सालों बाद यही प्रशासन ने ग्रीन हंट छेड दिया है। इस आपरेशन हंट में नक्सलियों के दमन में मीडियों की महत्वपूर्ण भुमिका रही है। जिसके चलते नक्सलियों पर मानसिक दबाव बना है।

रही बात मीडिया की तो नक्सलवाद से जुड़ी हर ख़बर को लेकर उत्साहित मीडिया ने कभी भी इस बात को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई कि नक्सलवादियों से जुडी जिन ख़बरों को वे लोगों के सामने ला रहे हैं उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव क्या पडेगा। आम लोगों के बीच इन ख़बरों को लेकर किस तरह का माहौल पैदा होगा, सबसे पहले ब्रेकिंग करने की होड में हम कई बार यह भी भूल जाते हैं निरकुंश हो चुके इन उपद्रविय़ों की इस तरह की खबरों को दिखाने के चक्कर में कहीं ना कहीं हमने नक्सलियों के और समाज के बीच एक आतंक का माहौल ही पैदा किया है। छत्तीसगढ़ में कई साल तक काम करते हुए कई बार ऐसे मौके आये जब यह स्थिति आम रही। इन ख़बरों के पीछे भागते हुए हम पागलों की तरह पुलिस के दिये बयानों में यकीन करते रहे, कई बार यह बात भी गौर करने आई पुलिस द्वारा पकडे गये तमाम लोगों के पीछे यह जोड दिया जाता है कि गिरफ्तार व्यक्ति नक्सली गतिविधियों लिप्त था या फिर इसके तार नक्सलियों से जुड़े हैं जबकि कई बार तो हकीकत इससे कोसों दूर रही है यहां पर यह कहना कदाचित् अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि नक्सलियों का इस्तेमाल कुछ हद तक राजनैतिक स्वार्थों के लिए भी होता रहा है। प्रदेश के कई हिस्सों में चुनावों के दौरान इनका इस्तेमाल भी बडे पैमाने पर किया जाता रहा है। मुझे एक बात औऱ समझ में नहीं आई कि आखिर किसी साहित्य को पढना या किसी विचार को पढ़ना किस हद तक अपराध की श्रेणी में आता है, आखिर हमने भी तो स्कूल और कालेज के दौरान कई विचारधाराओं को पढ़ा और काफी हद तक उन्हें आत्मसात् भी किया है। मीडिया ने हमेशा से नक्सली गतिविधियों को ख़बरों का केंद्र बिंदु माना लेकिन इन नक्सलियों के परिवर्तित विचारधारा को जानने का प्रयास आज भी अधूरा है, राजनैतिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किये जा रहे नक्सलियों की तरफ किसी का ध्यान आज तक क्यों नहीं गया यह एक अलग से शोध करने का बिंदु हो सकता है। कई बार तो हम यह सोचना भी भूल जाते हैं कि नक्सलवाद के आरोप में आज तक जितनी भी गिरफ्तारियां हुई उनके पीछे की वजह क्या है, हम यह भी भूल जाते हैं किसी जनसमुदाय का यह आंदोलन किसी राजनैतिक दबाब के चलते तो नहीं हुआ है। बात इतनी सी ही है कि इन आंदोलनों के पीछे कई बार कई तरह की राजनैतिक साजिशें भी होती है। मीडिया का काम नक्सल नामक इस मुहिम को सिर्फ ख़बरों के लिए ना होकर समाज की मुख्य धारा से भटके इन क्रांतिकारियों (अगर मूल सिंद्धातों की दुहाई ना दे तो) की निराशा की वजह खोजना भी होना चाहिए। आखिर समाज के इस चौथे स्तंभ का कुछ जिम्मेदारियां भी तो है जिसमें समाज को समाज का असली चेहरा भी दिखाना है….

-केशव आचार्य

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2 Comments on "नक्सलवाद और मीडिया"

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पंकज झा
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बहुत अच्छा well done केशव.

मिहिरभोज
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आखिर समाज के इस चौथे स्तंभ का कुछ जिम्मेदारियां भी तो है ………जिम्मेदारी है ना….ब्रैकिंग न्यूज

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