लेखक परिचय

नवीन देवांगन

नवीन देवांगन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्म। पत्रकारिता में बी.जे.एम.सी.की डिग्री बिलासपुर तथा एम.बी.जे प्रसारण पत्रकारिता की डिग्री भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से ली। दिल्ली और मुंबई के अनेक टेलिविज़न प्रोडक्शन हाऊस में कार्य करने के बाद रामोजी फिल्म सिटी के इंटरटेनमेन्ट् सेक्शन में चार वर्ष एडीटर के पद पर कार्य। दिल्ली के विभिन्न मीडिया शैक्षणिक संस्थानों में टेलिविज़न प्रोडक्शन में गेस्ट फैकेल्टी के रुप में कार्यानुभव। लेखन में रुचि। फिलहाल पिछले 6 वर्षो से सहारा समय के क्रिएटीव विभाग में सीनियर एडिटर के पद पर कार्य कर रहे है।

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आज़ादी के 62 साल बाद भी समाजिक, आर्थिक नीतियों के चलते हिन्दुस्तान का एक बहुत बड़ा हिस्सा लगभग 70 प्रतिशत लोग आज भी हाशिए पर जीने को मज़बूर है जिनके सरोकारों की चिंता न सरकारों को रही न ही नीतियों को, न व्यवस्थापिका को, न ही कार्यपालिका को रही, और तो और न्यायपालिका भी हमेशा मौन ही रही है। दुनिया भर में रोज़ भूखे सोने वालो में से एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा हिन्दुस्तान का ही है आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी क्या हम उन लोगों के प्रति न्याय कर पाएं है जो वास्तव में न्याय के हक़दार है। आज लगभग 90 करोड़ हिन्दुस्तानी ऐसे है जिनकी दैनिक आमदनी 20 रुपए से भी कम है इन लोगो की चिंता किए बिना चंद मुठ्ठी भर पूंजीपतियों के पीछे भागने भर से काम नही बनने वाला। अराजकतावादी दृष्टिकोण और शासन की नीतियों से पैदा हुए विक्षोभ को निजी स्वार्थो के लिए संकीर्णता पर आधारित होकर के इसका उपयोग करने का तरीका ही नक्सलवाद को जन्म देता है बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे सामाजिक स्थितीयां बदल जाऐगी?

देश में आज लगभग 9 राज्यों के 200 से अधिक जिले नक्सल समस्या से प्रभावित है और तक़रीबन सभी जिलों में आज भी विकास की नाम पर सारे आंकडे सिर्फ फाईलों में ही बंद है, आदिवासी इलाकों में तो स्थिति और भी भयावह है इस स्थिति को सुधारने के लिए हमारे संविधान में भी ख़ास प्रावधान रखा गया। पंचायती राज कानून और पेसा-1996 कानून इसी उद्देश्य को लेकर लागू किया गया, जो ये सुनिश्चित करता है कि इन ग्रामीण बहुल्य और आदिवासी इलाको में विकास की किरण सही ढंग से पहुंच सके। विकास के मायने इन क्षेत्रों में इनके जीवन से संबंध रखता है अगर इन इलाकों के प्राकृतिक संसाधनो का हम सिर्फ दोहन करते रहेंगे जिसका स्वार्थवश पूरा फायदा कुछ पूंजीपतियों को मिलता रहे और इनके बदले वहा के बाशिंदों को कुछ नहीं मिले, तो जाहिर तौर पर अंसतोष तो ऊपजेगा ही, यहां के खनिज सम्पदा से बनी हुई चीज़ों से विकास के मायने तय नहीं किये जा सकते मसलन आयरन, बाक्साईड से हम हवाईजहाज बेशक बना ले पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इन जहाजों में कोई भी आदिवासी सैर नहीं करने वाला। विकास का रास्ता सही मायने इन जंगली इलाकों में पीने का स्वच्छ पानी, भोजन, स्वास्थ सुविधाएं, सड़क आदि से होकर ही गुजरेगा। अब भी समय है कि पूंजीपतियों की ख़ातिरदारी बंद कर सही विकास उन लोगों तक पहुंचाए जो इस विकास की आस में अब भी बैठे हुए है नहीं तो कुछ हिंसावादी लोग उन तक आएंगे और उनसे कहेंगे कि देखो ज़म्‍हूरियत ने आपको ये सब नही दिया जो आपका अधिकार है मेरे पास बंदूक है आप मेरे पीछे चलिए हम इस सरकार को सबक सिखायेंगे और इस तरह नक्सलवाद पनपने का सिलसिला लगातार चलता रहेगा।

2008 में प्लानिंग कमीशन द्वारा तैयार कि गई एक रिर्पोट पर नज़र डाले तो दो बातें मुख्य रुप से उभर कर सामने आती है कि इन नक्सल प्रभावित इलाको में सुरक्षाबल को कैसे मज़बुत किया जाए, दूसरा कि पंचायती राज कानून को कैसे और अच्छी तरह ईमानदारी से अम्लीज़ामा पहनाई जाएं, जब तक वहां के लोगों में सरकार अपना विश्वास नहीं बना पायेगी तब तक इस समस्या का हल दूर दूर तक नज़र नहीं आता, वहां के लोगो को खुद अपने विकास के लिए आगे आने के लिए प्रेरित करना पड़ेगा नौकरशाही से हटकर इन आदिवासीयों को अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए पूरी छूट और पूरा सहयोग देना होगा जिन इलाको में नक्सल समस्या थोड़ी कम है वहां विकास के इतने मिशाल कायम करने होंगे जिससे उनमें ये विश्वास कायम हो सके कि लोकतांत्रिक समाज में ही रहकर वे अपना जीवन स्तर सुधार सकते है साथ ही साथ जंगली इलाको में इंडियन फारेस्ट सर्विस के अधिकारियों की और कर्मचारियों को भी अपना काम और अधिक ईमानदारी और सूचितापूर्वक करना पड़ेगा क्योकि आदिवासी परोक्ष रुप से इसी जंगल पर ही निर्भर रहते है।

नक्सलियों द्वारा पटरी उखाड़ फेकना, सड़क बिजली को नुकसान पहुंचाना, निश्चित तौर पर ये उनके मंसूबे को जाहिर करता है कि वे विकास के पक्षधर कतई नहीं है फिर आख़िर मसला क्या है, नक्सलियों के इरादे क्या है, क्यों युवा इन लोगों के साथ शामिल होते जा रहे है स्थानीय लोग क्यों इनका मौन सहमति के साथ सुर में सु र मिलाते है सलवा जुडुम जैसे स्वस्फूर्त आंदोलन को छोड़ दिया जाए तो इक्का दुक्का ही संगठन सामने आते है जो नक्सली आंदोलन का डटकर सामना कर रहे हो। हिंसा के बल पर इस समस्या को कभी ख़त्म नहीं किया जा सकता सरकार द्वारा सैनिक बलों के प्रयोग से माहौल और बिगड़ सकता है, ये समस्या हमारे घर की है। हमला हमारे अपनों द्वारा अपने ही घर के आंगन में किया जा रहा है। हमें ये सोचना ही होगा कि इस लड़ाई मे आखिर बलि किसकी चढ़ रही है मर कौन रहा है। भटके हुए युवा नक्सलियों में शामिल होकर किसका नरसंहार कर रहे है वे किसे मार रहे है बेगुनाहों की हत्या कर देने से कोई क्रांत्रि का रास्ता प्रशस्त नहीं होने वाला, जो इन माओवादियों द्वारा किया जा रहा है, मरने वालों लोगो के परिवार वालों की आत्मा क्या कभी इसे स्वीकार कर पायेगी। रही बात इस समस्या के समाधान की तो इसका एकमात्र विकल्प सिर्फ संवाद ही है इतिहास गवाह है कि बडे से बड़े समस्या का समाधान संवाद के माध्यम से हल किया जा सकता है। सरकार द्वारा पहल कर नक्सलियों से संवाद का रास्ता ढूंढना ही होगा, साथ ही साथ उन क्षेत्रों में विकास की किरण ईमानदारी से पहुंचानी ही होगी जो आज तक विकास से वंचित रहे, ताकि हमें कल और किसी के घर से रोने की आवाज़ न सुननी पड़े।

-नवीन देवांगन

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