लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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naxal1 कहां से पैदा हुआ नक्सलवादनक्सलवाद का नाम आते ही अब जवानों का या तो खून खौल जाएगा या फिर उनकी रूह कांप उठेगी। कुछ ही सालों में नक्लवाद का चेहरा इतना बर्बर और दर्दनाक हो चुका है जिसकी कल्पना मात्र से रोंगटे सिहर जाते हैं। जमीनी हकीकत सेअनजान देश प्रदेश के शासकों द्वारा हमारे जांबाज सिपाहियों को इनके सामने गाजर मूली की तरह कटने को छोड दिया जाता है, जो निन्दनीय है। बीते दिनों छत्तीसगढ में जो कुछ हुआ उसकी महज निंदा से काम चलने वाला नहीं। नक्सलवादी ”सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है” के सिद्धांत पर चल रहे हैं।

दरअसल नक्सलवाद क्या है, क्यों पनपा इसके लिए उपजाउ सिंचित भूमि कहां से और किसने मुहैया करवाई इन पहलुओं पर विचार आवश्यक है, तभी इसका शमन किया जा सकता है। आखिर क्या है नक्सलवाद, इस शब्द की उत्तपत्ति कहां सेहुई। पश्चिम बंगाल के एक गांव नक्सलवाडी से इसका उदह होने की बात प्रकाश में आती है। नक्सलवाडी में कम्युनिस्ट नेता कानू सन्याल, जंगल संथाल और चारू मजूमदार ने 1967 में सत्ता के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह आरंभ किया था। ये दोनों ही नेता चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तंग के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित रहे हैं। इनका मानना था कि जिस तरह चीन में तंग ने सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से सत्ता हासिल की थी उसी तरह हिन्दुस्तान में भी दमनकारी शासकों का तख्ता पलट किया जा सकता है। इस विचारधारा के लोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर अखिल भारतीय स्तर पर एक समन्वय समिति का गठन किया था।

वैसे आजाद हिन्दुस्तान में शसस्त्र क्रांति का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि सशस्त्र लडाई 1948 में तेलंगाना संघर्ष के नाम पर आरंभ हुई थी। उस काल में तेलंगाना सूबे के ढाई हजार गांवों के किसानों ने सशस्त्र लडाई का झंडा उठाया हुआ था। इसके बाद तंग के विचारों पर आधारित इस समन्वय समिति में बिखराव के बीज पड गए और कुछ लोगों ने मार्कस के सिध्दांत को अपनाकर अपना रास्ता अलग कर लिया इन लोगों ने मार्कसवादी कम्युनिस्ट पार्टी का अलग गठन कर लिया। माकपा ने 1967 में चुनावों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर ली। हो सकता है कि इनका मानना रहा हो कि जब तक माकूल वक्त नही आता तब तक सत्ता का स्वाद चखकर कुछ हासिल ही कर लिया जाए। 2 मार्च 1967 में पश्चिम बंगाल के चुनाव में माकपा ने बंगाल कांग्रेस के साथ मिलकर संविद सरकार का गठन किया। वैसे और खंगाले जाने पर पता चलता है कि हिन्दुस्तान में अमीरी गरीबी के बीच बढते फासले, राजनैतिक, आर्थिक व्यवस्था और दिनों दिन भ्रष्ट होती अफसशाही की उपज है नक्सलवाद। वामपंथी दलों में अंर्तविरोध के चलते वाम दलों में विरोध के बीज प्रस्फुटित होते रहे और अंतत: 11 अप्रेल 1964 को असंतुष्ट सदस्यों ने एक नए दल का गठन कर लिया। संवदि सरकार की अवधारणा कानू सन्याल के गले नहीं उतरी और उन्होंने माकपा पर धोखाधडी का सनसनीखेज आरोप लगाकर एक नए गुट की आधारशिला रख दी।

इस आंदोलन की नींव से अनेक संगठनों का जन्म होता रहा। कालांतर में या तो वे हावी हाते रहे या फिर उनका शमन ही कर दिया गया। 1969 में एक और पार्टी का गठन किया गया जिसका नाम था, सीपीआई एमएल। आंध्र में आतंक बरपाने वाला पीपुल्स वार गु्रप इसी पार्टी का एक हिस्सा था। 2004 में पीपुल्स वार गु्रप ने एमसीसी नामक ग्रुप के साथ मिलकर सीपीआई माओवादी को जन्म दे दिया।

नक्सलवाद शब्द की उत्तपत्ति के बारे में गहराई से जाने पर पता चलता है कि जब अदालत के आदेश पर जमींदार के पास रहन रखी जमीन को जोतने एक किसान गया तो उसे जमींदार के लोगों ने बेतहाशा पीटा, जैसे ही यह बात कानू सन्याल और चारू मजूमदार के कानों में आई उन्होंने जमींदार के खिलाफ शसस्त्र लडाई लडकर किसान को उसका हक दिलया। तब से नक्लवाडी से आरंभ इस आंदोलन का नाम नक्सलवाद रख दिया गया। आज नक्सलवाद और माओवाद की जद में देश के 15 सूबों के 233 सेअधिक जिले और 2200 से अधिक थाने हैं। आज बिहार, झारखण्ड, बंगाल, उडीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ आदि सूबों में यह समस्या नासूर बनकर उभ्र चुकी है। उत्तराखण्ड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि सूबों में भी इनकी पदचाप सुनाई देने लगी है। नक्सलवाद 1990 के दशक से जोर पकड रहा है। तीन दशकों मेंनक्सलवाद का चेहरा बहुत ही ज्यादा वीभत्स हो चुका है। माओवादियों और नक्सलियों की भाषा में जंगल के मायने हैं दण्डकारण्य। आंध्र प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है लाल गलियारा। उधर भाजपा के चीफ कमांडर नितिन गडकरी कहते हैं कि लाल गलियारा पशुपतिनाथ से लेकर तिरूपति तक फैला हुआ है।

आज देश के रूपयों पर ही नक्सलवादी पल रहे हैं। कहते हैं बडे बडे नेताओं, अफसरान और उद्योगपतियों के द्वारा इन नक्सलवादी विचारधारा के मुख्यधारा से भटके हुए लोगों का पालन पोषण किया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार नक्सलवादियों का रंगदारी टेक्स वसूली का सालाना राजस्व दो हजार करोड से अधिक का है। नक्सलियों की चौथ वसूली के बढते दायरे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार पुलिस ने पिछले साल नक्सलियों के पास से छ: लाख 84 हजार 140 रूपए बरामद किए थे, जो इस साल महज तीन महीने में बढकर 21 लाख 76 हजार 370 रूपए हो गया है।

(क्रमश: जारी)

-लिमटी खरे


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