लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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M Id 129512 anti naxal operation मज़बूत इच्छाशक्ति से ही खत्म होगा नक्सलवाद.
छत्तीसगढ़
के दंतेवाडा के घने जंगलों में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल बटालियन पर अब तक का सबसे बडा हमला कर 76 जवानों की निर्ममता पूर्वक ह्त्या पर, अपने जांबाजों की शहादत पर देश स्तब्ध है. नक्सल या वाम मार्ग के नाम पर देश और दुनिया में फैले इस संगठित गिरोह और उसके सभी भोपुओं का केवल और केवल इतना ही लक्ष्य रहता है कि देश के किसी भी कोने में एक समस्या खोज कर उसे अंतराष्ट्रीय समस्या का दर्ज़ा दे दिया जाय.और फिर अपनी दुकानदारी बदस्तूर जारी रखी जाय. आप गौर करें….! नक्सली आतंकवादियों द्वारा आज तक यह स्पष्ट नहीं किया गाय है कि आखिर यह खुरेंज आक्रमण हो क्यू रहा है . नक्सलियों के पक्ष में घरियाली आंसू बहाने वाले लेखकगगण भी आज तक नहीं कह पाए हैं कि आखिर नक्सलियों को चाहिए क्या? हाल तक इनसे बातचीत का आपराधिक राग अलापते गृह मंत्री को भी नहीं पता होगा कि वार्ता के बिंदु क्या हो सकते हैं. बस चुकि अपनी दूकान चलानी है तो कही से एक समस्या खोज कर लाओ और उसकी अच्छी पैकेजिंग की व्यवस्था करो और शुरू हो गयी अपनी दुकानदारी. समझ में आने लायक मामला केवल उन 2000 करोड सालाना की वसूली का है जिसके कारण इतना प्रपंच और मजलूमों की जान जा रही है. अगर विचारधारा की बात करें तो इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि इसके जन्मदाता “कानू” ही इस आंदोलन को आतंक का नाम दे रहे थे. ख़बरों के अनुसार आहत हो कर इन्होने आत्महत्या भी कर ली.

सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि नक्सली एक ऐसी विचारधारा है जो किसी भी तरह के लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली में विश्वास नहीं रखता और उसका एक मात्र लक्ष्य है वर्ग-संघर्ष के द्वारा कथित “जनताना सरकार” का गठन यानी सत्ता की प्राप्ति. लेकिन आप गौर करेंगे कि यह कोई विचार-धारा नहीं है. केवल पैसा और ताकत प्रात करना इसका इकलौता लक्ष्य है. अगर लोकतंत्र इतनी ही बुरा लगता इन गिरोहों को तो नेपाल में सत्ता प्राप्ति के लिए लोकतंत्र का ही सहारा नहीं लेते. या झारखण्ड में कोई दुर्दांत नक्सली झामुमो के टिकट पर चुनकर संसद या विधान सभा नहीं पहुचता. तो जिस तरह भी हो अपने स्वार्थ का साधन इसका ध्येय है. चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. तो भारत में लोकतंत्र के खिलाफ, नेपाल में लोकतंत्र के लिए युद्ध. दुनिया भर में जाति आधारित व्यवस्था के खिलाफ चिल्ल-पों तो बिहार में जातिवादी सेनाओं के माध्यम से ही युद्ध. धर्म भले ही उनके बाइबिल में अफीम लेकिन हथियार और अन्य सहायता के लिए मज़हब आधारित आतंकियों से गठजोर करने का दोमुहापन. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आसरा लेकर झूठ-सच गढ़ सरकारों को बदनाम करने की साज़िश, लेकिन अगर कही सत्ता में आ गए तो सबसे पहले इसी स्वतंत्रता पर प्रहार. “मानो या मरो” की अपसंस्कृति में विश्वास रखने वाले ये लोग मजहबी आतंकियों से भी ज्यादे खतरनाक हैं. बात-बात पर मानवाधिकार की बात करने वाले ये लोग दांतेवाडा के ही एर्राबोर में डेढ़ साल की बच्ची “ज्योति कुटयम” को भी ज़िंदा जलाने से परहेज़ नहीं करते.

इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि आज़ादी से पहले और उसके बाद भी वहाँ के आदिवासियों का जम कर शोषण एक हकीकत है. भोले-भाले वनवासियों को आदिम जमाने में रख उनके संसाधनों से भोपाल और दिल्ली गुलज़ार होता रहा है. तो यहाँ पर इन गिरोहों ने “सपने” को एक उत्पाद की तरह से बेचना शुरू किया. पहले इन गिरोहों ने भोले-भाले आदिवासियों को शोषण से मुक्ति का स्वप्न दिखाया. और जब अंचल इनकी गिरफ्त में पूरी तरह आ गया तब दिखना शुरू हुआ इनका असली चेहरा. जिन व्यवसाइयों पर निशाना साधने की बात करते थे, उनसे ही गठजोर कर व्यापारियों का पैसा, विदेशियों का हथियार, कलमबेचुओं से वैचारिक आधार, और भाड़े के मीडिया (कु)कर्मियों द्वारा झूठे-झूठे ख़बरों की बिना पर अपनी दूकान बदस्तूर चलाना इन्होने जारी रखा. समस्या तो इनको तब हुई जब राज्य निर्माण के बाद सरकारों ने इस क्षेत्र पर ध्यान देना शुरू किया. वनवासी गण भी जागरूक हुए और नक्सलियों के शोषण के खिलाफ उठ खड़े हुए. सपने हमारे बेच रहे थे कुछेक लोग, हमने जो आँख खोली तो आ के डपट गए. उसके बाद तो इनके दमन का चक्र ही शुरू हो गया. इनसे डर कर सरकारी शिविरों में रहने वाले दांतेवाडा के एर्राबोर में मारे गए पचासों लोग हो, रानीबोदली के शहीद आरक्षी गण, फिर महाराष्ट्र की सीमा से लगे राजनांदगांव के मदनवाडा में शहीद हुए एसपी विनोद चौबे समेत २९ जवान या ताज़ा हमले में शहादत प्राप्त दांतेवाडा के ही७६ जवान, हर जगह बौखलाहट में इन्होंने मजलूमों का खून करना शुरू किया. उन्ही आदिवासियों का जिनके हित की बात करना इनका यूएसपी था. खैर…!

हाल के इस हमले के बाद ऐसा लग रहा है कि वास्तव में लोकतंत्र पर ये मुट्ठी भर अपराधी हावी हो गए हैं. लेकिन ऐसे बात बिलकुल नहीं है. अगर कोई कमी है तो केवल सरकारों में इच्छा शक्ति की. श्रीलंका में लिट्टे का सफाया या पंजाब की शांति इस बात का गवाह है कि अगर सरकार पूरे दम ख़म के साथ, राजनीति को अलग रखते हुए, मानवाधिकार के नाम पर दूकान चलाने वाले रुदालियों की उपेक्षा करते हुए जम कर जुट जाय तो किसी भी चुनौती से पार पाना मुश्किल नहीं है. बस केंद्र सरकार इसको आतंक मानने की अपने नीति पर कायम रहे. सीधे तौर पर इन समूहों को देश का दुश्मन माने. अगर ज़रूरत हो तो सेना का इस्तेमाल किये जाने के विकल्प पर भी विचार हो. इसी दंडकारन्य में राक्षसों द्वारा मारे गए मुनियों के अस्थियों का ढेर देख कर भगवान राम ने पृथ्वी से राक्षसों की मुक्ति का संकल्प लिया था. आइये दंतेवाडा में अपने जवानों की शहादत पर यह संकल्प लें कि किसी भी कीमत पर लोकतंत्र को इन राक्षसों से मुक्त करवाने के यज्ञ में अपनी भी आहुति देंगे.

-पंकज झा.


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