लेखक परिचय

डॉ. विवेकानंद उपाध्‍याय

डॉ. विवेकानंद उपाध्‍याय

देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय से हिंदी साहित्‍य में डॉक्‍टरेट की उपाधि प्राप्‍त करनेवाले विवेकानंद जी इन दिनों अमेरिकन इंस्‍टीट्युट ऑफ इंडियन स्‍टडीज, नई दिल्‍ली में प्राध्‍यापक के रूप में कार्यरत हैं।

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पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले का एक गांव है नक्सलबाड़ी, जहाँ 25 मई 1967 को चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में एक सशस्त्र आंदोलन शुरू हुआ जिसके बारे में हिंदी कवि धूमिल ने कहा था कि भूख से तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है। लेकिन नक्सलवादी गतिविधियों से हम जानते हैं कि यह बयान न तो भूख के बारे में सच है और न ही नक्सलबाड़ी के बारे में। यह शुद्ध रूप से आजादी और गांधी के नाम पर चल रहे सत्ता प्रतिष्ठान के अवसरवादी वर्ग चरित्र के प्रति उपजे आक्रोश की रोमानी और हताशा भरी अभिव्यक्ति है जिसका सपना कुल मिलाकर देश की सत्ता और संपत्ति पर कब्जा करना है। देश के बहुत सारे वामपंथी बुद्धिजीवी जो नक्सलवाद को वैकल्पिक सत्ता विमर्श की अभिव्यक्ति मानकर उसे सीने से चिपटाकर जी रहे हैं वे सब एक साथ मौन हैं। आखिर कुछ तो राज है जिसकी पर्दादारी है। यह याद रखना होगा कि नक्सलवादी जो कि सत्ता को बंदूक की नली से निकालते दिखाई दे रहे हैं, उनकी सबसे बड़ी ताकत बंदूक नहीं बल्कि वह रोमानी भावुकता है जिसके शिकार आजाद भारत में बहुत से बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार रहें हैं। धूमिल का वक्तव्य उसी सार्वजनिक सहानुभूति का हिस्सा या उदाहरण है जो भारत के बौद्धिक जगत में व्याप्त है। और यही नक्सलवाद की असली ताकत है। आप तुलना करें भगत सिंह की जिन्होंने औपनिवेशिक व्यवस्था और साम्राज्यवाद के खिलाफ जनाक्रोश जगाने, फैलाने और संगठित करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया जबकि ये नक्सली व्यवस्था परिवर्तन के लिए अपहरण जैसी कायरतापूर्ण कार्रवाई को अपनी मुख्य रणनीति बनाए हुए हैं। क्या नक्सली इतने नासमझ हैं कि वे अपनी कार्रवाइयों का मतलब नहीं जानते?

समाजवाद बहुत लंबे समय से समानता के पक्षधर लोगों के लिए एक सुंदर आकर्षक विचार रहा है लेकिन वैज्ञानिक समाजवाद की माओवादी धारा का भारतीय संस्करण जिसे हम नक्सलवाद के नाम से जानते हैं वह कोई क्रांति नहीं बल्कि भारत की संसदीय राजनीति की देह के भीतर पल रही एक बीमारी है जो गरीबों और आदिवासियों इत्यादि के नाम पर फैल रही है। पशुपति से तिरूपति के बीच जंगलों में लाल गलियारा ( रेड कारिडोर) बनाने के लिए जमींदारों और साहूकारों के घरों से बहीखातों की लूट से शुरू होकर चारू मजूमदार के सफाया अभियान और अब अपहरण की रणनीति से कौन सा व्यवस्था परिवर्तन हो रहा है यह साफ देखा जा सकता है। यह सबको समझना है और सबसे पहले नक्सलियों को ही समझना है कि नक्सलवाद और प्रजातंत्र तथा विकास साथ -साथ नहीं चल सकते। यह एक नागरिक समाज विरोधी विचार है जिसकी सबसे बड़ी और एकमात्र पूंजी आतंक और डर है। ये दोनों ही चीजें व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकती हैं। और अगर व्यवस्था बन भी गई तो उसका वही हाल होगा जो सोवियत संघ का हुआ।

स्मरणीय रहे कि नक्सलवादी उन्हीं क्षेत्रों में वर्षों से सक्रिय हैं जो आज अवैध खनन का केंद्र बने हुए हैं और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट हो रही है। सवाल है कि जल, जंगल और जमीन के स्वयंभू रक्षकों के इलाकों में ही संसाधनों की लूट क्यों और कैसे हो रही है? आखिर नक्सलियों ने कभी खनन माफियाओं और पूंजीवादी कंपनियों के खिलाफ कोई जन कार्रवाई की हो ऐसा उदाहरण नहीं मिलता। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे भी अवैध खनन से लाभ उठाने वाले गठबंधन का हिस्सा हैं। खुद चारू मजूमदार के सहयोगी रहे और 25 मई 1967 को बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन शुरू करने वाले कानू सान्याल ने सन् २००४ में अपने एक साक्षात्कार में नक्सलवादी भटकाव की ओर इशारा करते हुए कहा था, “अपने समय में चाहे यह कितना भी रोमांचकारी क्यों न हो, वामपक्ष का यह भटकाव सैद्धांतिक और राजनीतिक रुप से हमें खत्म कर देता है। हथियारबंद क्रांति करने का दावा करने वाले और मुझे संशोधनवादी बताने वालेअपने अनुभवों से कुछ सीखना नहीं चाहते। उन्हें ये भ्रम है कि वे इतिहास कानिर्माण करते हैं, जबकि सच तो ये है कि जनता को छोड़ कर कोई क्रांति नहींकी जा सकती।” लेकिन विडंबना है कि इसी क्रांति के नाम पर कितना खून बहाया गया इसका अंदाजा गृह मंत्रालय की रपट से लगाया जा सकता है जिसके अनुसार छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और महाराष्ट्र और पं बंगाल में 2007 से 2011 के बीच सबसे ज्यादा हिंसक घटनाएं और हत्याएं हुईं जिनमें छत्तीसगढ़ सबसे ऊपर है। खुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं। फिर भी कुछ खास नहीं हो पा रहा है। स्कूल पर हमले से लेकर खुद आदिवासियों की भी हत्या करने वाले नक्सलवादियों को रोकने के लिए राज्य पुलिस, केंद्रीय अर्ध सैनिक बल सभी विफल साबित हो रहे हैं। वस्तुतः अपहरण आतंकवाद का सबसे ताकतवर और प्रभावशाली हथियार साबित हुआ है। याद कीजिये वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद का अपहरण जिसमें आतंकियों ने अपनी मांगें सफलतापूर्वक मनवा लीं थीं। रूबिया सईद के बदले आतंकी छोड़े गये थे। उसके बाद बहुचर्चित इंडियन एयर लाइंस के विमान के यात्रियों को बंधक बना कर आतंकियों ने पुनः अपनी मांगें सपलतापूर्वक मनवाई थीं। उसके बाद उड़ीसा में इतालवी नागरिकों का अपहरण और विधायक का अपहरण और अंततः छत्तीसगढ़ के सुकमा के जिला कलेक्वर एलेक्स पाल मेनन का अपहरण। हमेशा आतंकी सरकार पर भारी पड़े। होना तो ये चाहिये था कि सरकार आतंकियों की अपहरण की रणनीति के खिलाफ कोई ठोस रणनीति तैयार करती लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आज भी कहीं ऐसा हो रहा कम से कम सरकार के स्तर पर दिखायी नहीं देता। कम से कम छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार बधाई की पात्र कही जा सकती है कि इसने इस अपहरण के मामले में उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार की तुलना में ज्यादा दृढ़ता और समझबूझ दिखाई।

आतंकियों का मकसद सबसे पहले अपनी और ध्यान आकृष्ट करना होता है। उसके बाद आम लोगों में अपने ताकतवर होने का भ्रम पैदा करना होता है। इसके अलावा सरकार से अपनी मांगें मनवाना होता है। जब वे कोई हिंसक कार्रवाई करते हैं तो उस दिन तो लोगों का ध्यान उनकी तरप जाता तो है लेकिन उनकी कोई मांग पूरी नहीं होती और अगले दिन कोई नई घटना सुर्खी बन जाती है और लोग भूल जाते हैं। दूसरे खून बहाने से जनता में आतंकियों के प्रति गुस्सा पैदा होता है और उससे भी बड़ी बात के उनके समर्थक बुद्धिजीवियों के लिए उनका बचाव करना मुश्किल हो जाता है। तीसरी बात कि सरकार के सामने एक तर्क और सुविधा होती है उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की। लेकिन जब वे अपहरण की रणनीति अपनाते हैं तो सबसे पहले वे आसानी से सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं और तब तक खींचे रखते हैं जब तक कि उनके नाटक का सफलतापूर्क पटाक्षेप न हो जाए। दूसरी बात कि उस काम में खून कम से कम बहता है और सरकार लगभग असहाय होती है। वह उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं होती है और उनसे बातचीत करने और उनकी मांगें मानने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं होता। ऐसी स्थिति में जनता में आतंकियों के खिलाफ कोई सीधा गुस्सा भी पैदा नहीं होता और आतंकियों के समर्थक बुद्धिजीवियों को उनकी वकालत करने में कोई असुविधा नहीं होती। और यही उनकी सफलता का रहस्य है। कानू सान्याल का यह वक्तव्य इसी और संकेत करता है।

“बंदूक लेकर जब हम आतंक फैलाते चलते थे तो हमें भी लोग समर्थन देते थे लेकिन आतंकवाद के रास्ते में भटक जाना हमारे लिए घातक सिद्ध हुआ।” क्रांति कम्यनिस्ट पार्टी नहीं देश की जनता करती है लेकिन नक्सलियों को अपने हथियारबंद दस्ते पर जनता से ज्यादा भरोसा है। नक्सलियों का समर्थन करनेवाले बुद्धिजीवी भी नक्सलियों का बचाव मानवाधिकारों और लोकतंत्र के नाम पर करते हैं। वे इस बौद्धिक दिवालियेपन का शिकार हैं क्योकि खुद नक्सली किसी के मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार की परवाह और सम्मान नहीं करते। व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति आक्रोश होना हर एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है लेकिन उसके लिए नक्सलियों की गोद में जाकर बैठ जाना वैसे ही है जैसे पश्चिमी देशों के प्रति गुस्से के कारण तालिबान का समर्थक हो जाना।

समाजवाद भारत ही नहीं दुनिया के लिए भी एक आवश्यक विचार है लेकिन उसका नक्सलवादी या माओवादी संस्करण दुनिया के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए हानिकारक है। माओवादी आखिर किस माओवाद के मोह में फंसे हैं। खुद चीन में उस माओवाद को तिलांजलि दी जा चुकी है और वहां माओवाद केवल लोकतंत्र को स्थगित करने के विचार और प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य किसी भी रूप में जीवित नहीं है। आखिर जब माओवादियों को भी निजीकरण ओर विदेशीपूंजी के सहारे ही काम करना है तो भारतीय लोकतंत्र से ही इतनी घृणा क्यों ?

आतंकवाद के खिलाफ सरकारी रणनीति में अब सबसे पहले अपहरण की रणनीति की काट खोजने की जरूरत है। जिस तरह से एलेक्स पाल मेनन ने सुरक्षा निर्देशों की अवहेलना करते हुए बिना उचित सुरक्षा के बाहर जाने का निर्णय किया उसे दुस्साहस या मूर्खता नहीं कहा जा सकता और वह कतई क्षम्य भी नहीं है क्योंकि वे तो वापस आ गये लेकिन उनके साथ के सुरक्षा कर्मचारियों को अपनी जान देनी पड़ी और पूरी चर्चा में उनकी जान का कोई मूल्य नहीं समझा गया। अपहरण से निपटने की सबसे बेहतर तकनीक यह है कि अपहर्ताओं को उनकी मागें पेश करने के पहले ही घटना स्थल के आस पास ही चारों तरफ से घेर लिया जाए और उनके सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचने के मार्ग को बाधित कर दिया जाए। इसके लिए बेहतर निगरानी तंत्र और सक्षम कार्यबल की चौबीस घंटे तत्परता आवश्यक होगी।

सरकार, पुलिस और प्रशासन को सच में संवेदनशील बनना पड़ेगा ताकि व्यवस्था के प्रति आम आदमी का गुस्सा कम हो सके। जनाक्रोश को कानून व्यवस्था का मुद्दा बना कर उससे निपटने की रणनीति जनाक्रोश को और उभारती है। दिल्ली में जब बाबा रामदेव के समर्थकों पर आधी रात को पुलिस की सहायता से हमला किया गया जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी और अन्ना हजारे के आंदोलन से निपटने के लिए कानून व्यवस्था के मुद्दे का बहाना बनाया या संसद की सर्वोच्चता को अपनी ढाल बनाने की कोशिश की तो हम सहज कल्पना कर सकते हैं कि निरीह आदिवासियों के साथ जंगलों में क्या होता होगा।

यह कुल मिलाकर यह एक वैचारिक लड़ाई है नक्सलवाद भ्रांति और नागरिक समाज के बीच। देश की शान्ति और उन्नतिप्रिय जनता को अपनी सरकार और नक्सलियों दोनों पर अंकुश लगाने के लिए यह लड़ाई लड़नी है। राजसत्ता पर अगर अंकुश नहीं लगा तो वह अमानवीय और निरंकुश हो जाती है तथा अगर जनता जागरूक न हो तो अतिवादी विचार उसके ही भीतर फैलने लगते हैं और निरंकुश सरकार और अतिवादी तत्व दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ हिंसक कार्रवाई को उचित ठहराते हैं। इस बीच में आम जनता ही पिसती है। इसी भारतीय जनता ने औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के खिलाफ शानदार संघर्ष किया था और अपने संविधान को आत्मार्पित भी किया था। इसलिए समाज और संविधान की रक्षा की अंतिम जिम्मेदारी भी उसी की है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो राष्ट्रहित जैसी कोई चीज नहीं बचेगी और महान भारतीय जनता का भी अस्तित्व नहीं रहेगा।

एक शेर है

मेरे कातिलों की तलाश में कई लोग जान से जायेंगे।

मेरे कत्ल में मेरा हाथ था, मेरे कातिलों को पता नहीं।

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3 Comments on "नक्सलवाद का दुःस्वप्न / विवेकानंद उपाध्‍याय"

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Jeet Bhargava
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नक्सलवाद का सम्बन्ध अब वैचारिक नहीं होकर गिरोहबंद होकर खौफ फैलाने और हफ्ता वसूली से हो गया है. अब तक वामपंथी पार्टिया इसका इस्तेमाल करती थी. लेकिन अब ngo के वेश में ईसाई मिशनरियां भी नक्सलियों का साथ लेकर अपना आधार फैला रही है वही कोंग्रेस भी विनायक सेन जैसो को सरकारी समितियों में लेकर इनका फ़ायदा उठाने की फिराक में है.

Bipin Kishore Sinha
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नक्सलवाद कोई गंभीर समस्या नहीं है। दोनों तरह के आतंकवाद – इस्लामी आतंकवाद और नक्सलवादी आतंकवाद, भारत सरकार की ढ्लमुल नीति, तुष्टीकरण और कमजोरी के कारण पनपा ही नहीं, फल फूल रहा है। सरकार के पास दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी है। लंका की सरकार जब लिट्टे का जड़-मूल से सफाया कर सकती है, तो हम क्यों नहीं? लेख लिखने से या समझाने बुझाने से इन आतंकियों पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। एकमात्र गंभीर कांबिंग ओपरेशन ही इनकी दवा है।

Ramanarayan suthar
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उपाध्यायजी बहुत अच्छा लेख व्यक्ति के शरीर में जैसे धीरे धीरे संक्रमण फैलता है फिर उसव्यक्ति का उचित इलाज न किया जाये तो वो मोत का कारन भी बन सकता है ऐसे ही नक्सलवाद का संक्रमण अब भारत में बड़ी तेजी से फैलता जा रहा है इसका भी इलाज समय रहते करना जरुरी है
नक्सलवाद का कारन एक राज नैतिक विसंगति है जो इसे कम करने के बजे बढ़ावा देने का कम करती है अब वोट बैंक किसी भी कीमत पर नक्सलवाद को मिटने नहीं देगा

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