लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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-श्रीराम तिवारी

४०-४५ साल पहले नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सल संघर्ष आज आधे भारत में फ़ैल चुका है. छतीसगढ़, झारखंड, आन्ध्र प्रदेश, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सरकारें इस पर अपने-अपने ढंग से रणनीति निर्धारित करती रही हैं. कई बार प्रतिक्रांतिक कार्यवाही के लिए प्रशासकीय संसाधनों की बदतर तस्वीर भी प्रचार माध्यमों से जनता को प्राप्त हुई है. दंतेवाड़ा, लालगढ़ की घटनाओं में महज इतना फर्क है कि दंतेवाड़ा में जहाँ नक्सलवादियों ने असावधान ७५ अर्धसैनिक बलों को काट डाला तो लालगढ़ में ममता के किराये के पिठ्ठुओं ने नक्सलवादियों-माओवादियों के नाम पर आम गरीब जनता पर निर्मम प्रहार किये.

दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्‍यमार्गी मीडिया ने अपने-अपने नजरिये से नक्सलवाद पर लिखा है. बहस-मुसाहिबे, सेमिनार हुए हैं. बाज मर्तवा एक आध ने नक्सलवादियों के ख़ूनी आतंक को क्रांति का शंखनाद भी बताया है और उसका खामियाजा भी भुगता है.

नई पीढ़ी के शहरी युवाओं के दिमाग में नेट के जरिये और संचार माध्यमों से नक्सलवाद के बारे में दिग्भ्रमित अधकचरी सूचनाएँ ठूंसी जा रही हैं. उधर अरुंधती, स्वामी अग्निवेश और महाश्वेता देवी जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी भी माध्यम मार्ग के अहिंसावादी शांतिकामी वामपंथ को नीचा दिखने के लिए नक्सलवाद का उटपटांग समर्थन कर रहे हैं.

वर्तमान दौर की महाभ्रष्‍ट पूंजीवादी व्यवस्था में एक तरफ समृद्धि के शिखर पर अम्‍बानियों की भोग लिप्सा बढ़ती जा रही है दूसरी ओर अभाव और दीनता का सारे देश में बोलबाला है. इस कठिन स्थिति में आदिवासी अंचलों से, वनांचलों में हिंसात्मक स्वर गूंजने लगे हैं.

घोर अभाव में भी एन–केन-प्रकारेण अपनी आधी-अधूरी शिक्षा से असहाय, असफल, दिशाहीन, भटका हुआ नौजवान-नंगे भूंखे रहकर मर जाने की अपेक्षा क्रान्तिकारी जिजीविषा की खोज में उधर पहुँच जाता है जहाँ से लौटना नामुमकिन हो जाता है. उसे जब क्रांति के सब्‍जबाग दिखाए जाते हैं तो वह घोर धर्म भीरु या अहिंसक होने के वावजूद वर्ग शत्रुओं की कतारों पर टूट पड़ता है जिसने एक बार उस मांड का दाना पानी पी लिया, वह उधर से वापिस नहीं लौट सकता. या तो क्रांति की चाह में उत्सर्ग को प्राप्त होगा या अपने ही साथियों की गोलियों का शिकार हो जायेगा.

भारत में इस रास्ते से क्रांति कभी नहीं आ सकती। महान जनवादी साहित्यकार हरिशंकर परसाई ने भारत में वामपंथ के तीन भेद माने हैं. इसका बड़ा ही रोचक व्यंगात्मक आलेख भी उन्होंने लिखा था. किसी मित्र ने उनसे जब साम्यवाद के भारतीय तीनों भेदों का खुलासा चाहा तो उन्होंने चाय की केतली का उदाहरण दिया. उनका मानना था कि केतली की गरम-गरम चाय जब सीधे केतली से ही हलक में उतार ली जाये तो इसे नक्सलवाद कहते हैं. जब चाय को टोंटी से गर्म-गर्म हलक में उतारी जाए तो माकपा कहते हैं …और चाय को प्लेट में डालकर बहस में खो जाएँ चाय ठंडी हो जाये और उसमें मख्खी भी गिर जाये फिर पी जाये तो सी पी आई कहते हैं.

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8 Comments on "गरीब जनता पर निर्मम प्रहार कर रहे हैं नक्‍सलवादी"

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अभिषेक पुरोहित
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abhishek purohit
5 years 8 months ago

अप जैसे विद्वान के द्वारा हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद कपूर साहब…………….

डॉ. राजेश कपूर
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dr.rajesh kapoor
5 years 8 months ago

abhishek purohit jee aapkee tippani lekh se kaheen adhik wichaarottejak w upayogee hai. haardik shubhkaamanaayen.

डॉ. राजेश कपूर
Guest
dr.rajesh kapoor
5 years 8 months ago
अभिषेक जी आपका कथन बिलकुल सही है और मार्क्स वाद पर सार्थक टिप्पणी है. संसार में यह विचार जहां भी गया वहाँ विध्वंस, विनाश, रक्तपात और घृणा को ही इसने फैलाया. निर्माण इस विचार से संभव नहीं, इसका इतिहास इस बात का प्रमाण है.चीन और रूस में हुआ विकास साम्यवाद की सफलता नहीं, उसकी विफलता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. पूजीवाद को अपना कर ही वे आर्थिक प्रगति की रास्ते पर बेध रहे हैं. पर यह रास्ता भी अंत में विनाश की और ही तो ले जस्ता है. दुर्दशा का सहकार बन रहा अमेरिकी समाज इसका प्रमाण है. – भाई तिवारी… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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abhishek purohit
5 years 8 months ago
“हिंदुत्व एवं वामपंथ” वामपंथ का चिंतन करते समय हमारे देश में बहुधा सतही बातचीत होती है ज्यादा से ज्यादा भारत-चीन-रूस की कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकलापो के आधार पर टिका टिप्पणी होने लग जाती है पर अमूमन वामपंथ के मूल विचार की अनदेखी कर दी जाती है या उसके प्रति ग्रीन या आदर भाव से देखा जाता है पर विचारात्मक समालोचना अधूरी रह जाती है | मुझे नहीं पता किसने किया अनुवाद पर कम्युनिस्ट या “लेफ्टिस्ट” का सही अनुइवाद “वामपंथ नहीं है क्योकि ” वामपंथ” एक प्राचीन भारतीय पध्धति है जिसके द्वरा शिव-शक्ति की उपासना की जाती है जिसका कम्युनिस्ट विचार… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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abhishek purohit
5 years 8 months ago

आपने लिखा सही है पर समस्या के मर्म तक आप भी पहुच नहीं पाए,या आप पहुचना ही नहीं चाहते है आपकी मर्जी है लेकिन इस समस्या का मूल है वामपंथी विचार जहा जहा ये विचार है वहा वहा हिंसा है रातिम राजनीतिक हत्याए है नक्सलवाद के नाम से हो चाहे माओ वाद के नाम से हो चाहे “क्रांति” के नाम से वाम पंथ केवल केवल हिंसा सिखाता है??क्यों??

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