लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव- nepal-mao-350x234 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पड़ोसी देशों से मैत्री की प्रगाढ़ता का जो संकल्प लिया है, वह व्यापार से कहीं ज्यादा सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि निवेश के बहाने चीन उन सभी देशों में दखल दे रहा है, जिनकी सीमायें भारत से जुड़ी हैं। नेपाल में तो चीन का हस्तक्षेप विकास के बहाने चीनी भाषा मंदारिन को पाठशालाओं में पढ़ाने तक पहुंच गया है। राजनीति में यह हस्तक्षेप चीनी माओवाद के लगातार विस्तार के रूप में हो रहा है। इस लिहाज से किसी भारतीय प्रधानमंत्री की 17 साल बाद नेपाल यात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। पडोसी देशों में नेपाल और भूटान ऐसे देश हैं जिनके साथ हमारे संबंध विश्वास और स्थिरता के रहे हैं। यही वजह है कि भारत और नेपाल के बीच 1950 में शांति और दोस्ती की संधि आज भी कायम है। नेपाल और भूटान से जुडी 1850 किमी लंबी सीमा रेखा बिना किसी पहरेदारी के खुली हुई है। बावजूद चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह कोई विवाद नहीं हैं। बिना पारपत्र के लोंगो की आवाजाही निरंतर है। करीब 60 लाख नेपाली भारत में काम करके रोजी-रोटी कमा रहे हैं। 3000 नेपालियों को भारत हर साल छात्रवृत्ति देता हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच कितनी आत्मीय मानवता है, इसकी जानकारी नेपाल के खोये हुए 10 बर्षीय बालक जीतबहादुर के मोदी द्धारा पाले-पोसे और पढ़ाए जाने से मिलती है। अब यह बालक मोदी को बड़ा भाई और धर्म पिता मानता है। 14 साल बाद मोदी ने नेपाल- यात्रा के दौरान जीत को उसके रक्त-संबंधियों से भी मिला दिया। यह आत्मीयता इस बात का संकेत है कि अनजाने में भी हमारे भीतर कहीं परस्पर विश्वास की डोरियां गूंथने का काम करती हैं। नेपाल के विदेशी निवेश में भी 47 फीसदी भारत का है। बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के बाद कोई दूसरा प्रधानमंत्री नेपाल रिश्तों को सुधारने के लिए नहीं गया। हालांकि मोदी की यात्रा से पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने नेपाल की यात्रा कर जमीन तैयार कर दी थी। स्वराज की प्रेरणा से ही भारत नेपाल संयुक्त आयोग को 23 साल बाद पुनर्जीवन मिला। इसी के अंतर्गत दूसरे कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की सहमति बनी। इसमें सड़क, परिवहन, राजमार्ग, ऊर्जा, जल संसाधन, वाणिज्य, शिक्षा और संस्कृति प्रमुख हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच ऐसे 25 द्विपक्षीय आधार हैं, जिनके संदर्भ में बातचीत का सिलसिला लगातार जारी रहता है। नतीजतन दोनों देशों के बीच सालाना द्विपक्षीय व्यापार करीब 4.7 अरब डालर का है, लेकिन लंबे समय तक संवादहीनता के चलते चीन सक्रिय हुआ और उसने नेपाल के ढांचागत विकास में 60 फीसदी निवेश करके भारत को पीछे छोड़ दिया। शायद नरेन्द्र मोदी ने चीन के दखल को रोकने की मंशा से ही आर्थिक मदद के साथ साथ भावनात्मक पहलें भी की है। इस मौके पर जीत बहादुर को पेश करना भी इस पहल का हिस्सा हो सकता है। इसी क्रम में मोदी को जब नेपाली संसद में बोलने का अवसर मिला तो उन्होने नेपाली भाषा में नेपाल के सांसदों व अन्य गणमान्य नागरिकों को संबोधित करकेे उनका दिल जीत लिया। यही नही भारत और नेपाल के नेताओं के बीच सभी द्विपक्षीय वार्तायें हिन्दी में हुई। नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोईराला और विदेश मंत्री महेन्द्र पांडेय हिंदी में दक्ष हैं। मोदी ने भावनायें भुनाने की दृष्टि से ही नेपाल और भारत के संबंधों को हिमालय और गंगा जितना पुराना बताया। यह सही भी है, धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषा और सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से भारत और नेपाल सबसे निकटतम देश हैं। दोनों देशों में सनातन हिंदू धर्म की परंपराएं जीवन जीने का माध्यम हैं। नेपाल में पानी की बहुलता है। लेकिन उसका बिजली निर्माण और सिंचाई के लिए दोहन नहीं हो पा रहा है। इसलिए मोदी ने पनबिजली परियोजनाओं को गतिशील बनाने पर जोर देते हुए कहा कि ‘हम नेपाल का अंधेरा दूर करेंगे और 10 साल बाद नेपाल हमारा अंधेरा दूर करेगा।’ इस बावत दोनों देशों के बीच पंचेश्वर बिजली परियोजना का रास्ता साफ करके एक समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए। 5600 मेगावाट की इस परियोजना पर एक साल के भीतर काम शुरू हो जायेगा। इसकी लागत करीब 30 हजार करोड़ रुपये है। भारत ने नेपाल को 6300 करोड़ रूपये देने का ऐलान भी किया है। कई सड़क परियोजनाओ को पूरा करने में भी भारत ने रुचि दिखाई है। मीडिया के क्षेत्र में भारतीय दूरदर्शन और नेपाल के सरकारी टीवी चैनल के बीच भी भारतीय कार्यक्रम व समाचार प्रसारण का समझौता हुआ है। नेपाल के कुछ क्षेत्रों में प्रदूषित पेयजल के चलते घेंघा के रोगियों की तादात बहुत ज्यादा है। भारत इस रोग से मुक्ति के लिए 6.9 करोड रूपये की मदद से नेपाल को आयोडीन युक्त नमक की आपूर्ति करेगा। मोदी द्वारा एचआईटी मंत्र दिए जाने के बावजूद उर्जा संबंधी कई मुददों पर सहमति नहीं बनी। इस मंत्र का मतलब है, एच, हाईवे (राजमार्ग) आई-वे, यानी इंफॉर्मेशन टेक्नालॉजी (सूचना प्रौद्योगिकी) और टी-वे यानि ट्रांसमिशन, मसलन बिजली लाईनों का जाल फैलाना। भारत नेपाल के सुखेत में करनाली नदी पर 900 मेगावाट की बिजली परियोजना का निर्माण करना चाहता है। यह परियोजना नेपाल के केबीनेट में मंजूरी के लिए अटकी है। भारत अपनी सरहद से नेपाल के अंदर 80 किलोमीटर लंबी तेल पाईप लाइन बिछाना चाहता है, जिसकी लागत 300 करोड़ रूपये है। यह काम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को करना है। जिसमें पेंच यह है कि इस परियोजना से जो आमदनी होगी, वह 100 फीसदी कॉर्पोरेशन की होगी। लिहाजा इन उर्जा व्यापार अनुबंधों पर सहमति नहीं बन पा रही है। अब ये करार 45 दिन के भीतर नए प्रारूप में तैयार किए जाकर समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। भारत और नेपाल के बीच जो भी समझौते हुए हैं, उन पर चीन के बढ़ते असर का दबदबा साफ है। क्योंकि चीन 100 अरब रूपये का निवेश 2 बिजली परियोजनाओं पर पहले ही कर चुका है। कुल मिलाकर चीन नेपाल के ढांचागत विकास में 60 फीसदी निवेश कर रहा है। उसकी परियोजनायें पूरी होने की दिशा में भी तेजी से बढ़ रही हैं। सड़क निर्माण में भी चीन रूचि ले रहा है। अर्से से इन्हीं कूटिल कूटनीतिक चालों के चलते कम्युनिष्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में लिया और नेपाल के हिन्दु राष्ट्र होने के संवैधानिक प्रावधान को खत्म करके प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। चीन नेपाल के स्कूलों में चीनी अध्यापकों से चीनी भाषा मंदारिन भी मुफ्त में सिखाने का काम कर रहा है। माओवादी प्रभाव ने ही भारत और नेपाल के प्राचीन रिश्ते में हिंदुत्व और हिंदी की जो भावनात्मक तासीर थी, उसका गाढ़ापन ढीला किया। गोया, चीन का हस्तक्षेप और प्रभुत्व नेपाल में लगातार बढता रहा है। चीन की ताजा कोशिशों में भारत की सीमा तक आसान पहुंच के लिए तिब्बत से नेपाल तक रेलमार्ग बनाना हैं। चीन की क्रूर मंशा यह भी है कि नेपाल में जो 20-22 हजार तिब्बती शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं, यदि वे कहीं चीन के विरूद्ध भूमिगत गतिविधियों में शामिल पाये जाते हैं तो उन्हें नेपाली माओवादियों के कंधों पर बंदूक रखकर नेस्तनाबूत कर दिया जाए। 17 साल बाद ही सही, भारत ने नेपाल मे यह आत्म-गौरव जगाया है कि वह एक संप्रभु राष्ट्र है और भारत उसके साथ मजबूती से खडा है। यह भरोसा नेपाल में चीन के बढते कदमों को थामने का काम करेगा।

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1 Comment on "नेपाल: चीनी दखल रोकने की पहल"

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dr.ashokkumartiwari@gmail.com
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dr.ashokkumartiwari@gmail.com
चीनी दखल रोकने में महत्वपूर्ण देश हैं :— 1) वियतनाम 2) जापान 3) कजाकिस्तान 4) तजाकिस्तान 5) किर्गिस्तान 6) मंगोलिया 7) रूस 8) इंगलैंड 9) अमेरिका 10) दलाईलामा का समर्थन —– पर अंधभक्तों को और उनके आकाओं की समझ केवल बगलें झाँकने की है —– कितना मुकाबला नेपाल और भूटान ने चीन से किया है — अरे कभी जोकरों से बाजार लगती है ? ? ? बच्चे हैं अभी राजनीति शास्त्र पढ़ना आता नहीं ! चाणक्य बनने चले हैं !! डॉ. अशोक कुमार तिवारी
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