लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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लोकेन्‍द्र सिंह राजपूत

किले से दिखाई देता कस्बे के मध्य स्थित तालाब...

नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश का मिनी कश्मीर कहलाता है। इस उपमा ने मेरे मन में नरसिंहगढ़ के लिए खास आकर्षण बनाए रखा। 2006 में मैंने पहली बार नरसिंहगढ़ के सौंदर्य के बारे सुना था। तभी से वहां जाकर उसे करीब से देखने का लोभ मन में था। मेरी यह इच्छा इस माह (मार्च 2011) की शुरुआत में पूरी हो सकी। जिस सुकून की आस से में नरसिंहगढ़ में पहुंचा था, उससे कहीं अधिक पाया। वैसे कहते हैं कि नरसिंहगढ़ बरसात के मौसम में अलौकिक रूप धर लेता है। यहां के पहाड़ हरी चुनरी ओढ़ लेते हैं। धरती तो फूली नहीं समाती है। नरसिंहगढ़ का अप्रतिम सौंदर्य देखकर बादलों से भी नहीं रहा जाता, वे भी उसे करीब से देखने के मोह में बहुत नीचे चले आते हैं। सावन में वह कैसा रूप धरता होगा, मैं इसकी सहज कल्पना कर सकता हूं। क्योंकि मार्च में भी वह अद्वितीय लग रहा था।

किले पर स्थित मंदिर..

शाम के वक्त मैं और मेरे दो दोस्त किले पर थे। किले से कस्बे के बीचोंबीच स्थित तालाब में बीचोंबीच स्थित मंदिर बहुत ही खूबसूरत लग रहा था। इस तालाब की वजह से निश्चित ही कभी नरसिंहगढ़ में भू-जलस्तर नीचे जाने की समस्या नहीं होती होगी। तालाब की खूबसूरती के लिए स्थानीय शासन-प्रशासन के प्रयास जारी हैं। एक बात का क्षोभ हुआ कि खूबसूरत किले का बचाने का प्रयास होता कहीं नहीं दिखा। नरसिंहगढ़ का किला बेहद खूबसूरत है। फिलहाल बदहाली के दिन काट रहा है। एक समय निश्चित ही यह वैभवशाली रहा होगा। तब यह आकाश की ओर सीना ताने अकड़ में रहता होगा। संभवत: उसकी वर्तमान दुर्दशा के लिए स्थानीय लोग ही जिम्मेदार रहे होंगे। खिड़की-दरवाजे की चौखट गायब हैं। कई भवनों से लोग पत्थर निकाल ले गए हैं। पूरे परिसर में झाड़ खड़े हैं। एक बात उल्लेखनीय है कि इस पर ध्यान न देने के कारण यह अपराधियों की शरणस्थली भी रहा है। दो-तीन बार यहां से सिमी के मोस्ट वांटेड आतंकी पकड़े गए हैं। किले में आधुनिक स्नानागार (स्विमिंग पुल) भी है।

नरसिंहगढ़ की एक खास बात यह भी है कि यहां अधिकांश स्थापत्य दो हैं। जैसे बड़े महादेव-छोटे महादेव, बड़ा ताल-छोटा ताल, बड़ी हनुमान गढ़ी-छोटी हनुमान गढ़ी आदि। नरसिंहगढ़ के समीप ही वन्यजीव अभयारण्य है। जिसे मोर के लिए स्वर्ग कहा जाता है। सर्दियों में प्रतिवर्ष नरसिंहगढ़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। यह भी आकर्षण का केन्द्र है।

 

नरसिंहगढ़ फिलहाल पर्यटन के मानचित्र पर धुंधला है। मेरा मानना है कि नरसिंहगढ़ को पर्यटन की दृष्टि से और अधिक विकसित किया जा सकता है। इसकी काफी संभावनाएं हैं। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर तो बढ़ेंगे ही, साथ ही निश्चित तौर पर मध्यप्रदेश के कोष में भी बढ़ोतरी होगी। बरसात में नरसिंहगढ़ के हुस्न का दीदार करने की इच्छा प्रबल हो उठी है। कोशिश रहेगी कि इसी सीजन के दौरान मैं मिनी कश्मीर की वादियों का लुत्फ उठा सकूं।

नरसिंहगढ़ किले पर डबरा निवासी मित्र हेमंत सोनी के साथ...

 

 

नरसिंहगढ़ किले से डूबते सूरज का नजारा...

 

 

बदहाल नरसिंहगढ़ का खूबसूरत किला...

 

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2 Comments on "प्रकृति की गोद में बसा है मध्यप्रदेश का ‘मिनी कश्मीर’"

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लोकेन्द्र सिंह राजपूत
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डॉक्टर साहब वैसे तो आप भोपाल में रुक कर वहां भ्रमण पर जा सकते हैं। फिर भी मैं जल्द ही कोशिश करूंगा कि वहां रुकने का कोई अच्छा ठिकाना आपको बता सकूं।

डॉ. मधुसूदन
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बहुत सुंदर। कोई रूकने के स्थान के विषय में कोई जानकारी?

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