लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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गोहत्या को रोकने के लिए मानव हत्या करना अनुचित ही नहीं अपराध भी है. इसकी निंदा होनी ही चाहिए. सभी पक्षों ने निंदा की भी है. लेकिन इसके बाद भी जो कुछ वादविवाद के रूप में देखने को मिल रहा है उससे सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के महत्व को और भी उजागर होते देख रहा हूँ. कुछ लोग यदि हिन्दू समाज के प्रति दुराव उत्पन्न करने के इरादे से जानबूझ कर गोहत्या का जघन्य अपराध करते हैं वे भी क्षमा योग्य नहीं हैं. समाजहित में ऐसा क़ानूनी प्रावधान होना आवश्यक है कि उन्हें कड़ी सज़ा दी जाए. भारत के संविधान में गोहत्या को रोकने के लिए कानून बनाने का आग्रह इस विषय की ऐतिहासिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ही किया गया है. देश के अधिकाँश राज्यों ने तदर्थ व्यवस्था विधान किया भी हुआ है. इसके बावजूद राजनीतिक लाभ हानि के तराज़ू पर तौल कर इसे अनावश्यक टीका टिपण्णी का विषय बनाना और समाज के बहुत बड़े वर्ग की भावनाओं का मखौल उड़ाना किसी के लिए भी हितकर नहीं है.

सदियों से भारत के लोग गौ को मात्र एक पशु नहीं अपितु गौमाता मानते चले आए हैं. इसलिए देश के किसी मजहब या राजनीतिक तबके में ऐसा कोई भी कारण मान्य नहीं होना चाहिए जिससे देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाने की अनुमति किसी को भी दी जाए. इसी के अनुरूप देशहित में बहुसंख्यक समाज का भी यह कर्तव्य बनता है कि वह अल्पसंख्यक समाज की मानवीय मज़हबी भावनाओं की कद्र करे. भारत सहिष्णुता के बल पर ही महान बना है पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कोई अपने अधिकारों की तो दुहाई देता रहे लेकिन देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति से कतराए.

भारत जैसे देश में मज़हब के नाम पर गोमांस के सेवन को किसी के अधिकार के नाते मान्यता नहीं दी जा सकती. कोई बताए कि इस्लाम में कहाँ ऐसा कहा गया है कि मुसलमानों के लिए गोमांस का सेवन उसके मज़हबी कर्तव्यों की सूचि में शामिल है? यदि ऐसा हो तो फिर विश्व भर में अनेक मुस्लिम देश हैं वहां इस पर कोई आग्रह क्यों नहीं है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर इस मुद्दे पर भारत में ही बवाल क्यों? शांतिप्रिय मुस्लिम जनसाधारण के मन में गहरा उतर कर सोचने से भी इस सवाल का वाजिब जवाब नहीं मिलेगा. भारत में मुस्लिम शासन के ज़माने में हिन्दुओं को जोर जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन करने के लिए उन्हें गोमांस खिलाने की अनेक घटनाओं का ज़िक्र आता है. यदि देश का वर्तमान सम्पूर्ण जनसमाज उस बर्बरतापूर्ण इतिहास का इमानदारी और गहराई के साथ मंथन करे तो समझ में आएगा कि गोहत्या और गोमांस भक्षण समस्त भारतवासियों के लिए त्याज्य है. उनके लिए और भी अधिक जो अपने उन हिन्दू पूर्वजों के वर्तमान वंशज हैं जिनका मुगलकाल में धर्म परिवर्तन हुआ था. उस काल की विवशता को इस काल की आवश्यकता नहीं माना जा सकता.

सच्चाई यह है कि ऐसे संवेदनशील विषय को सत्ता के भूखे कथित सेकुलरवादी राजनीतिज्ञ और सदा भ्रम उत्पन्न करने वाली लेखनी और वाणी के धनी बुद्धिजीवी विवाद का विषय बना कर समाज में बचे खुचे सद्भाव की भी धज्जियां उड़ाने से बाज़ नहीं आते. अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने के लिए वे अपना धर्म ईमान और देश के प्रति अपने कर्तव्य तक की आहुति चढ़ाने के लिए सदा तैयार रहते हैं. अन्यथा क्या कारण है कि मानव हत्या का अपराध करने वाले किसी को भी विधिवत न्याय प्रक्रिया में दण्डित होने तक भड़काऊ टीका टिप्पणियों से बचा न जाए. इसलिए भी ताकि ऐसा जघन्य अपराध होने के कस्बे के लोग स्वत: आत्म मंथन कर अपने आस पास के वातावरण को बिगड़ने से बचाएं. दादरी के लोगों ने सद्भाव पुन: कायम करने का सफल प्रयास किया. हिन्दू मुस्लिम फसाद नहीं होने दिए.

अधिकार और कर्तव्य एक दूसरे के पूरक बन कर ही किसी समाज को दिशा प्रदान करते हैं. वही सभ्यता की प्रतीक सही दिशा भी होती है. इसके विपरीत दिशा सभ्यता के विनाश की तरफ धकेलती है. हम भाग्य से आज विकास पथ पर अग्रसर हुए हैं. यह जरूरी है कि आत्मविनाश के मार्ग पर जाने से बचें. `सबके विकास के लिए सबके साथ की आवश्यकता है`. प्रधानमंत्री श्री मोदी का यह आह्वान महत्वपूर्ण है. सबका साथ तभी सम्भव हो सकता है यदि समूचे समाज के सभी वर्गों और पंथों के बीच सद्भाव का एक मजबूत ढांचा कायम रहे. जो ऐसी घटनाओं से चरमरा कर ढह न जाए. जो योजनाएं देश के राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा लोगों के समक्ष रखी जाती हैं उनके प्रति सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सके. लेकिन ऐसे समय यदि किसी वर्ग के द्वारा विकास योजनाओं के स्थान पर बिना सोचे समझे विवाद उत्पन्न करने वाले मुद्दे उछाले जाने शुरू होंगे जिनका दशकों से कोई समाधान नहीं हो सका है तो लोगों का ध्यान विकास से हट कर उन मुद्दों पर ही केन्द्रित होने लगेगा. विकास विरोधी तत्व यही करने के प्रयास में जुटे हैं ताकि असंतोष उत्पन्न करके अपना राजनीतिक हितसाधन कर सकें.

दादरी में हुई एक दुखद घटना को इतना अधिक पीटा और घसीटा गया है कि समाज में एक दूसरे के प्रति शंका और दुर्भाव को जन्म मिल रहा है. सभी ने इसकी निंदा की है लेकिन साथ ही गंदी राजनीति की दलदल में इसे घसीटा गया है. जो मामला पुलिस की छानबीन के आधार पर अदालत में जाना चाहिए था भाजपा विरोधी राजनीतिज्ञों ने उसे एक के बाद एक बयानबाज़ी में उलझा कर अनुत्तरदायी मीडिया के झोले में डाल दिया. जिसे कभी वे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते आए थे उस मुस्लिम समाज को हिन्दुओं के विरुद्ध भड़काने के काम में जुट गए. बहसों पर बहसें अभी भी जारी हैं. कहीं हिंदुत्व के उभार का खतरा बताया जा रहा है तो कहीं प्रधानमंत्री को इसलिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है कि उन्होंने इस घटना पर उसी दिन कोई टिप्पणी क्यों नहीं की जिस दिन घटना घटी थी. उन्होंने जब टिप्पणी की और यह कहा कि `हिन्दुओं को फैसला करना होगा कि मुसलमानों के साथ लड़ें या उन्हें साथ लेकर विकास पथ पर आगे बढ़ें` तो क्या उनके विरोधियों ने उसे सराहा? नहीं, क्योंकि उन्हें विकास से कोई लेना देना नहीं है.

उन्हें वह व्यक्ति ही नहीं भाता जिसे बरसों से वे आगे बढ़ने से रोकने की असफल कोशिश में जुटे रहे हैं. दुनियाँ भर में उस को सराहा जाने लगा था जिसने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात को विकास पथ पर आगे बढ़ाया. वह व्यक्ति जिसने अनेक अवरोधों को पार कर दिल्ली तक अपनी नेतृत्व क्षमताओं का प्रमाण प्रस्तुत किया. वह जो समर्पण भाव से राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को निभाता धर्मपंथ बंधन मुक्त सर्वहितकारी शासन देश को दे रहा है. परिवर्तन का दौर है जो अधिकाँश के लिए अंतत: सुखकर सिद्ध हो सकता है. उनके सिवा जो ऐसे परिवर्तन के विरोधी हैं. जो कभी बाबरी तो कभी दादरी में अपने पुनरुद्धार की उम्मीद में खुद भटकते चले आए हैं उनसे देश में स्थिरता, शांति और विकास की उम्मीद कभी भी नहीं की जा सकती.

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