लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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japanflagजापान में परिवर्तन की बयार ऐसी बही कि लगभग पिछले पांच दशकों से जापान में सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। विगत 30 अगस्त को संपन्न हुए मध्यावधि चुनावों में विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान को सहयोगी दलों के साथ दो तिहाई सीटों पर विजय प्राप्त हुई।

सन् 1955 के बाद से ही सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी जापान में लगातार सत्तारूढ़ रही है। प्रमुख विपक्षी दल डेमोक्रटिक पार्टी आफ जापान ने यद्यपि विपक्षी दल के रूप में जापान में अच्छी खासी साख बटोरी। लेकिन डीपीजे को सरकार में रहने का मौका सिर्फ एक बार ही मिला वह भी अत्यल्प समय के लिए। सन् 1993-1994 के बीच सिर्फ दस महीने के लिए जापान में डीपीजे के नेतृत्व में सरकार रही। किंतु डीपीजे सरकार के पतन के बाद फिर से एलडीपी ने जापान की कमान अपने हाथ में ले ली।

लेकिन इस बार 30 अगस्त, 2009 को सम्पन्न चुनावों के पूर्व ही डीपीजे को 480 सदस्यीय लोकसभा में दो तिहाई सीटें मिलने का दावा अनेक सर्वे एजेंसियों ने किया। इन सर्वेक्षणों को चुनाव परिणामों ने भी सत्य सिध्द कर दिखाया। 308 सीटों पर विजय प्राप्त कर डीपीजे ने अकेले ही सरकार बनाने के लक्ष्य को हासिल कर लिया। डीपीजे गठबंधन में शामिल सहयोगी दलों सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी और पीपुल्स न्यू पार्टी भी डीपीजे के साथ नई सरकार में शामिल होंगे। पराजित सत्तारूढ़ एलडीपी को 118 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई है। डीपीजे संसदीय दल के नेता और नेता प्रतिपक्ष युकियो हातोयामा अब जापान के प्रधानमंत्री होंगे। डायट के विशेष अधिवेशन में आगामी 16 सितंबर को वह प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। युकियो हातोयामा के दादा इचिरो हातोयामा भी जापान के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर चुके हैं। मध्यावधि चुनाव की घोषणा जापान के प्रधानमंत्री तारो असो ने इस गर्वोक्ति के साथ की थी कि उन्हें पुन: सरकार बनाने से कोई रोक नहीं सकता।

दरअसल में जापान में विगत जुलाई माह में सम्पन्न हुए स्थानीय विधानमंडलों के चुनाव में सत्तारूढ़ दल को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। उस समय सत्तारूढ़ दल के अनेक प्रमुख नेताओं ने पराजय की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री तारो असो से त्यागपत्र की मांग की थी। इसी के साथ विपक्षी गठबंधन ने डीपीजे के नेतृत्व में समूची सरकार पर इस्तीफे का दबाव बढ़ा दिया। लेकिन प्रधानमंत्री तारो असो टस से मस न हुए। उन्होंने त्यागपत्र देने की बजाए सीधे चुनावों में उतरने का ऐलान कर दिया।

इसके ठीक पूर्व इटली में आयोजित जी-20 देशों की बैठक के समय उन्होंने वेटिकन में पोप बेनेडिक्ट से मुलाकात कर उनसे आशीर्वाद की कामना की। इस मुलाकात में उन्होंने पोप के समक्ष अपने कैथोलिक ईसाई पंथ की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की और वेटिकन में होने वाले कैथोलिक अनुष्ठानों के अनुसार पोप का अभिनन्दन किया। इस मुलाकात में पोप ने उनसे अफ्रीका में चलाए जा रहे सेवा कार्यों में खुलकर मदद की अपील की। प्रधानमंत्री तारो असो ने तब पूरी मदद करने का आश्वासन दिया।

उल्लेखनीय है कि जापान में ईसाई कुल आबादी के मात्र दो प्रतिशत भी नहीं हैं। सरकार की ओर से बौध्द एवं शिंतों धर्म के साथ जापान में प्रचलित अन्य स्थानीय मत-पंथों के संरक्षण का पूरा प्रयास होता है। जापान सरकार के प्रमुख के रूप सम्राट इस दृष्टि से अभिभावक की भूमिका का निर्वहन करते हैं।

पिछले अनेक दशकों से ईसाई मिशन जापान में अपनी जड़ें मजबूती से जमाने में जुटा है। अठारहवीं सदी के अंत में अमेरिकी कमांडर कमोडोर पैरी के जापान आगमन के बाद इस कार्य में बढ़ोत्तरी हुई। इसके पूर्व सत्रहवीं सदी में भी वेटिकन ने जापान को ईसाई देश बनाने का असफल प्रयास किया था लेकिन तब के शोगुन शासकों ने इस समय रहते भांप लिया। ये शोगुन शासकों का ही निर्णय था कि देश के तमाम गिरजाघर एक ही झटके में जमींदोज कर दिए गए और सभी मतांतरित ईसाइयों को अपने अपने देशज पंथों में वापस जाने का आदेश जारी कर दिया गया। तब से लेकर जापान में सम्राट के शासन के अंत तक अर्थात सन् 1948 तक ईसाई मिशनरी कभी खुलकर जापानी जनता का मतांतरण कर पाने में कामयाब नहीं हो सके। इस लिहाज से प्रधानमंत्री पद तक एक मतांतरित कैथोलिक ईसाई तारो असो का पहुंचना उनके लिए बहुत ही मुफीद बात थी। मिशनरियों को अपने कार्य के लिए जापान अब काफी सुविधाएं भी हो गई हैं।

लेकिन इधर प्रधानमंत्री तारो असो पोप से मिलकर अपना ईसाई प्रतिबध्दता को जाहिर कर रहे थे उधर जापान की जनता ने ऐतिहासिक फैसला सुनाने का निश्चय कर लिया। सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर प्रधानमंत्री की आलोचना की। इन नेताओं ने कहा कि सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण देश आर्थिक और औद्योगिक मंदी में तबाह हो रहा है। बरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही है और उसने अब तक के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं परिणामत: युवा वर्ग सहित समूचे जापान में भारी निराशा का वातावरण फैल गया है। तारो असो ने अपने दल सहित समूचे विपक्ष की आवाज को अनसुना किया। अपनी कुर्सी को बचाए रखने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की मदद की ओर रूख किया। विश्लेषकों का कहना है कि इसी प्रक्रिया में वह पोप बेनेडिक्ट से मिलने गए थे।

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में जापान में सत्ता परिवर्तन कई लिहाज से महत्वपूर्ण हो गया है। एलडीपी जहां अमेरिका के अनुसरण को अपना ध्येयवाक्य मानती रही है वहीं डीपीजे शुरू से ही अमेरिकी वर्चस्व के जापान के दोनों प्रमुख दल एलडीपी और डीपीजे भारत के साथ दोस्ताना संबंध सदैव प्रगाढ़ रखने के हिमायती रहे हैं। विपक्षी दल के रूप में डीपीजे का रूख जापान में साधारणतया अमेरिका विरोधी रहा है। डीपीजे उन सभी प्रावधानों को खत्म करने का प्रबल समर्थक रहा है जिनके कारण जापान की सुरक्षा का दायित्व अमेरिका पर आता है। इसी के साथ अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं की तैनाती के सवाल पर, अमेरिकी युध्दक पोतों को जापान में ईंधन आदि सुविधाएं देने के सवाल पर भी डीपीजे का विरोध मुखर रहा है।

डीपीजे के नेता और डायट के निचले सदन में नेता प्रतिपक्ष युकियो हातोयामा बार बार पश्चिम के वर्चस्व को चुनौती देने की भाषा दोहराते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि युकियो हातोयामा के नेतृत्व में जापान खुद सामरिक ताकत बनने के लिए अमेरिका से अलग अपने संसाधन आजमा सकता है। एशिया को संगठित होकर विश्व मंच पर अपनी सशक्त उपस्थित दर्ज करानी चाहिए इस तर्क के भी वे प्रबल समर्थक हैं। यद्यपि चुनाव परिणामों के बाद अमेरिका की ओबामा सरकार ने उनका जबरदस्त स्वागत किया है लेकिन जापान अमेरिका के प्रति अब क्या रणनीति अपनाएगा, अभी स्थिति बहुत साफ नहीं है। अमेरिका में भी अब बुश की जगह ओबामा के नेतृत्व वाली सरकार है। जाहिर है बहुत सारी नीतियों पर दोनों देशों के बीच एका बनने की संभावनाएं खुली हैं।

जहां तक संबंध भारत का है युकियो हातोयामा की सरकार के साथ भारत के संबंध प्रगाढ़ रहने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच विवाद का यदि कोई सम्बंध है तो वह सिर्फ परमाणु अप्रसार संधि को लेकर ही हो सकता है जिस पर हस्ताक्षर के लिए जापान भारत से आग्रह करता रहा है।

उल्लेखनीय है कि किंतु सन् 1998 में पोखरण-2 के बाद जापान सरकार ने भारत के विरूध्द रूख कड़ा कर लिया था। अनेक आर्थिक प्रतिबंध दुनिया की तमाम महाशक्तियों ने तब भारत पर थोपे थे और उसमें जापान अग्रणी था। लेकिन कुछ ही साल बीतते जापान को भारत की विश्व शक्ति के रूप में बढ़ती संभावनाओं का पता चल गया। जापान ने अपनी ओर से ही रिश्तों पर जमी बर्फ को साफ किया और सन् 2004 आते आते सम्बंध सामान्य होने लगे। विशेषज्ञों का मानना है कि जापान परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर के लिए भारत पर इस सत्ता परिवर्तन के बाद भी दबाव बनता रहेगा। भारतीय विदेश मंत्रालय सहित भारत के अनेक प्रतिष्ठित विदेश मामलों के विशेषज्ञों ने भी इस बात की पुष्टि की है।

लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि जापान के नई सरकार के प्रधानमंत्री युकियो हातोयामा ने एशिया को विश्व पटल पर एक संगठित शक्ति के रूप में खड़ा करने के पक्ष में हैं। जापान जानता है कि उसे इस कार्य में भारत के सक्रिय सहयोग के बगैर सफलता नहीं मिलेगी। चीन और सोवियत रूस जापान के परंपरागत शत्रु रहे हैं जबकि इसके विपरीत भारत के साथ जापान के मैत्री संबंध सदियों पुराने हैं। जापान और भारत दोनों देशों ने विगत् साल 2008 को एक दूसरे के साथ मित्र-वर्ष के रूप में मनाया है। इसका परिणाम भी अत्यंत सकारात्मक निकला है। भारत में एक भाषा के रूप में जापानी सीखने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है वहीं जापान के अनेक प्रमुख विश्वविद्यालयों में हिंदी को पाठयक्रम के रूप में शामिल कर लिया गया है। भारत और जापान के रिश्तों पर चीन की नजर सदा से रही है। चीन ने इसे बहुत पहले ही समझ लिया था और दोनों देशों में अपनी भाषा शक्ति को बहुत पहले से ही स्थापित करना प्रारंभ कर दिया था। इसलिए आज भी भारत और जापान दोनों देशों में चीनी भाषा को जानने-समझने की ललक कहीं ज्यादा है। लेकिन भारत और चीन के बीच संबंधों में खटास जिस तेजी से बढ़ रही है, जाहिर है कि भारत को जापान को तवज्जो देनी ही होगी। आज भी सोवियत रूस और जापान ये दो ऐसे देश हैं जो एशिया में किसी भी शैतानी ताकत को आसानी से निपटाने की क्षमता रखते हैं। भारत को इस लिहाज से सावधानी बरतते हुए चीन की बजाए सोवियत रूस और जापान से आर्थिक, सामरिक, सांस्कृतिक संबंध सदा ही प्रगाढ़ रखने के उपायों पर जोर देना होगा।

इतिहास रच दिया युकियो हातोयामा ने    

Yukio-Hatoyama-001-350x210‘इतिहास फिर से लिखने का समय आ गया है’ इस आह्वान के साथ चुनाव मैदान में उतरे 62 वर्षीय युकियो हातोयामा ने सचमुच इतिहास रच दिया है। आगामी 16 सितंबर को वे जापान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे। 

युकियो हातोयामा के नेतृत्व में जापान के प्रमुख विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान ने वह कार्य कर दिखाया जिसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार अधिकांशत: असंभव मानते थे। 

सन् 1955 में जब जापान में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी स्थापित हुई और सत्तारूढ़ हुई तो उसका नेतृत्व करने इचिरो हातोयामा युकियो हातोयामा के दादा थे। 1955 से लेकर 2009 तक एलडीपी का जापान पर एकतरफा वर्चस्व कायम रहा जिसे तोड़कर युकियो हातोयामा ने समूचे विश्व का ध्यान अपनी नेतृत्व क्षमता की ओर आकृष्ट कर लिया है। 

पेशे से शिक्षक युकियो हातोयामा भी राजनीतिक जीवन के प्रारंभ में एलडीपी से ही जुड़े हुए थे। सत्तारूढ़ एलडीपी के नेताओं के लगातार बढ़ते आर्थिक भ्रष्टाचार ने उन्हें अपने दादा द्वारा स्थापित पार्टी के खिलाफ विद्रोह के लिए बाध्य कर दिया। 

स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय, कैलीफोर्निया के इंजीनियरिंग स्नातक युकियो हातोयामा ने अपने इस निर्णय में अपने परिवार का विरोध भी झेला। उनके दादा जहां एलडीपी की ओर से जापान के प्रथम प्रधानमंत्री बने वहीं उनके पिता भी एलडीपी सरकार में 70 के दशक में जापान के विदेश मंत्री रह चुके हैं। हातोयामा के बड़े भाई फिलहाल विदा हो रही पराजित एलडीपी सरकार में केबिनेट मंत्री थे। 

युकियो हातोयामा ने सन् 1986 में एलडीपी की प्राथमिक सदस्यता छोड़कर जापान में सशक्त राजनीतिक विकल्प की खोज प्रारंभ की और 1993 में डीपीजे के गठन की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने तब 11 महीने तक एलडीपी को जापान सरकार से बेदखल रखने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। 

युकियो हातोयामा ने जापान में अमेरिकापरस्ती के विरोध को नये आयाम दिए। उन्होंने द्वितीय विश्वयुध्द के समय तबाह हुए जापान के संविधान को अमेरिकी दबाव में निर्मित बताया और कहा कि सत्ता में आने पर उनकी पार्टी इस संविधान को बदल देगी। 

युकियो हातोयामा ने संविधान के उस हिस्से पर हमला किया जिसके अंतर्गत जापान को सैन्य बल रखने की मनाही है और सैन्य सहायता के संदर्भ में उसे सदा ही अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ता है। 

दुनिया की दूसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति के इस संवैधानिक उपबंध को युकियो हातोयामा ने यह कहते हुए चुनौती दी कि अमेरिका के साथ रिश्ते बनाते समय पलड़े का संतुलन बिगड़ने नहीं दिया जाएगा। ये रिश्ते बराबरी के आधार पर नूतन रूप ग्रहण करेंगे। और इस कार्य में बाधक सभी संवैधानिक उपबंधों को समाप्त कर दिया जाएगा।

 

-राकेश उपाध्याय

(लेखक काशी हिंदु विश्वविद्यालय में जापान के विशेष संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के परास्तानक अध्येता रह चुके हैं।)

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1 Comment on "जापान में नया सबेरा/50 साल के अमेरिका समर्थक शासन का अंत"

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kapildev singh
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राकेश जी आप का लेखन बहुआयामी है, आप कवि भी है, पत्रकार भी हैं, राष्ट्रीय संदभों मे आपका लेखन हम पढते ही रहे हैं, अब अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भी पढने को मिल रहा है। निश्चित रूप से आपका लेखन ज्ञानवर्धक है, प्रतियोगी छात्र हों या युवा पत्रकार आप सभी को ध्यान में रखकर लिखते हैं, इसमें तथ्य भी है, शोध भी। आप विचार भी देते हैं, आप आगे भी लिखें, मेरी शुभकामना।

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