लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार- politics

‘टोपी – झाड़ू’ वाली नयी नाटक – मंडली के सारे ‘ड्रामे’ कैमरे के सामने ही क्यों होते हैं ? इसे समझना ‘रॉकेट साईन्स’ समझने जैसा कठिन नहीं हैl अपने शुरुआती दौर ‘नुक्कड़’ से लेकर आज तक इस मंडली के निर्देशक और अन्य ‘नाटककार’ आज के दौर में कैसे सुर्खियों में बना रहा जाता है, इसका‘फलसफा’ भली- भांति समझ व जान चुके हैंl रामलीला मैदान, जंतर-मंतर से लेकर ‘रंगशाला’ तक के इनके सफर में ‘कैमरे’ की बहुत ही अहम भूमिका रही है l अगर ‘कैमरे’ का दौर ना होता तो शायद इस ‘नाटक-मंडली’ के ‘नुक्कड़’ से ‘रंगशाला’ तक का सफर भी पूरा ना होता!

अब चंद बातें इस ‘नाटक-मंडली’ की रोज बदलती ‘पटकथाओं’ की l इस मंडली ने ‘भ्रष्टाचार’ की पटकथा के सहारे ‘ऊंचाइयां’ हासिल कीं, लेकिन उस ‘सुपर-हिट’ पटकथा को भूला कर अब ये ‘सांप्रदायिकता’ की नयी पटकथा के सहारे ‘सुपर-डुपर-हिट’ के ख्वाब संज़ों रहे हैंl पहले तो इस मंडली ने‘वंशवाद’ की ‘ठोकी-बजायी व प्रमाणित’ पटकथा में अनेकों ‘मीन-मेख’ निकाले लेकिन अब तो खुद उसी पटकथा के ‘प्लॉटस’ बड़ी ढीठई से चुरा रहे हैंl अब तो इसने ‘गांधी, शास्त्री” जैसे उपनामों वाले किरदार भी ढूंढ लिए हैं l पहले तो ‘मार-धाड़’ वाली पटकथाओं से भी इस मंडली को परहेज था लेकिन अब तो इसके ‘नायक’ हों या ‘सह-नायक’, ‘कैरेक्टर-आर्टिस्ट’ हों या ‘एकस्ट्रा’ सभी को ‘एक्शन-पैक्ड’ एवं ‘वॉयलेंट’ पटकथाएं ही लुभा रही हैं, इसके कुछ नायकों व कलाकारों ने तो प्राचीन किन्तु आजमाई हुई “भारतीय मार्शल –आर्ट : लट्ठ-बाजी एवं रोड़ेबाजी” का ‘ब्लैक-बेल्ट’ भी हासिल कर लिया हैl पहले इस मंडली के नाटकों के ‘सेट्स’ भी ‘आम व मध्य-वर्गीय परिवेश’ में ‘रंगे’ होते थे लेकिन अब इस मंडली के ‘सेट्स’ भी ‘भव्य –भड़काऊ-दिखाऊ’ होने लगे हैंl अब तो ये मंडली अपने नाटकों का ‘प्रचार-प्रसार’ ‘पांच-सितारा होटलों’ में हजारों रुपयों के ‘डोनर्स-डीनर्स कार्ड’ बेच कर रही हैl करें भी तो क्या करें ये? ‘‘गांधी जी के मुस्कुराते चेहरे वाले कागजों” की महिमा ही अपरम्पार है और बिना  इसके ‘नाटकों’ का ‘देश-व्यापी मंचन’ भी संभव नहीं है l पहले तो विदेशों से आयी‘प्रोत्साहन-राशि’ का भी सहारा था, लेकिन ‘प्रतिस्पर्द्धि मंडलियों’ और ‘दर्शकों’ की ‘चिल्लों-पौं’ ने तो उस पर भी ‘लगाम’ ही लगा दिया हैl

इस महीने से ‘राष्ट्रीय नाट्य-उत्सव व प्रतियोगिता’ शुरू होने वाली है, देश की अनेकों ‘रंगशालाओं’ में नाटकों का मंचन होना है, प्रतियोगिता में शामिल होने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी हैl जिस मंडली के जितने ज्यादा ‘हिट’ मंचन होंगे, उसका ‘देश की सबसे बड़ी रंगशाला’ में उतना ही ‘दबदबा’ होगाl इस नाटक-मंडली को भी अनेक मंचों पर अपना ‘जलवा’ दिखाना हैl इसी बीच इस मंडली के कलाकारों के बीच में ‘रोल’ पाने के लिए ‘लतम-जूतम’ भी जारी हैl ‘स्ट्रगलर्स’ की एक बड़ी जमात भी आस लगाए बैठी हैl अनेक ‘मंजे हुए कलाकार’ मंडली के ‘कर्ता-धर्ता’ पर ‘प्रसाद-ग्रहण’ कर रोल बांट देने का आरोप भी लगा रहे हैंl लेकिन इन सबसे बेपरवाह मंडली का ‘कर्ता-धर्ता’ ‘मदमस्त हाथी’ की तरह वही कर रहा है जो उसे पसंद हैl संचालन-मंडली की तो ‘पौ-बारह’ है, तभी तो  अपने नाटकों की ‘धूम’ मचाने के लिए ये रोज नए-नए ‘हथकंडे’ अपनाने से परहेज भी नहीं कर रही हैl

लेकिन मेरे जैसे ‘नाटक प्रेमी’ को अब इंतजार बस इस बात का  है कि इन ‘हथकंडों’ की मदद से देश की सबसे ‘बड़ी रंगशाला’ में इस मंडली की ‘दमदार एंट्री’ हो पाती है या नहीं ?

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