लेखक परिचय

नवीन देवांगन

नवीन देवांगन

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्म। पत्रकारिता में बी.जे.एम.सी.की डिग्री बिलासपुर तथा एम.बी.जे प्रसारण पत्रकारिता की डिग्री भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से ली। दिल्ली और मुंबई के अनेक टेलिविज़न प्रोडक्शन हाऊस में कार्य करने के बाद रामोजी फिल्म सिटी के इंटरटेनमेन्ट् सेक्शन में चार वर्ष एडीटर के पद पर कार्य। दिल्ली के विभिन्न मीडिया शैक्षणिक संस्थानों में टेलिविज़न प्रोडक्शन में गेस्ट फैकेल्टी के रुप में कार्यानुभव। लेखन में रुचि। फिलहाल पिछले 6 वर्षो से सहारा समय के क्रिएटीव विभाग में सीनियर एडिटर के पद पर कार्य कर रहे है।

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आज से भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक नई इब़ारत लिखी जाएगी जिसे कई वर्षों पहले ही हो जाना चाहिए था, बधाई हो आपको, देर सबेर ही सही शिक्षा का अधिकार कानून आज से लागू हो गया। देश के मानव संसाधन मंत्री की माने तो ये कानून देश के हर बच्चों को अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में यह मील का पत्थर साबित होगा, भारत सरकार द्वारा सबको शिक्षा मिले इसके लिए कई तरह की योजनाएं पहले ही चल रही है सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, आपरेशन ब्लैकबोर्ड आदि योजनाओं से शायद ही कोई अपरिचीत हो पर हमें इन योजनाओं पर भी एक सरसरी तौर पर एक नज़र ज़रुर डाल लेनी चाहिए पिछली योजनाओं का पोस्टमार्टम किए बिना और उसके अनुभवों से सिखे बिना इस कानून को पटरी पर लाना आसान न होगा।

कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांवो में निवास करती है गांव शब्द सुनतें ही हमारीं आखों में एक ऐसी छबि उभरती है जहां मुलभुत सुविधाओं का हमेशा आभाव रहता है ख़ासकर चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में, भारत सरकार द्वारा इस मुलभुत सुविधाओं के लिए पिछले सालों में लाखों करोड़ो रुपये खर्च किए गए पर समस्या जस की तस ही बनी हुई है उचित चिकित्सा के आभाव में न जाने कितनी ही जाने रोज़ जाती है एड्स से मरने वालों की अपेक्षा आज भी ज्यादा जाने मलेरिया, डायरिया, उचित प्रसव का आभाव आदि से जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में तो स्थिति और भयावह है गांवो में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति से आप और हम पुरी तरह से परिचित है हर 30 बच्चों पर एक शिक्षक की सरकार की योजना शायद ही कहीं नज़र आती है, कई जगह तो पुरा का पुरा स्कुल एक शिक्षक के भरोसे ही चल रहा है ऐसे में शिक्षा के स्तर में सुधार की बात करना बेमानी ही होगा। शिक्षा की गुणवत्ता पर भी समय समय में सवाल उठते ही रहते है, जो शिक्षा या जिस प्रकार की शिक्षा आज जो हम सरकारी स्कुलों मे दे रहे है क्या वाकई वह ग्रामीण ईलाको के बच्चों को फ़र्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले गुणवत्तापूर्ण प्राईवेट स्कुलों के बच्चों से मुकाबला करने के लिए तैयार कर पाऐंगें ऐसे समय में सरकारी स्कुलों के बच्चों में आने वाली हीन भावना का ज़िम्मेंदार आख़िर कौन होगा? शिक्षा की असमानता भी आज मुख्य समस्या बनी हुई है प्राईवेट स्कुलों और सरकारी स्कुलों में शिक्षा के स्तर में ज़मीन आसमां का अंतर है यही कारण है कि आज भी अभिभावक सरकारी स्कुलों के अपेक्षा प्राईवेट स्कुलों को ज्यादा तरजीह देते है।

आज हमारे देश मे लगभग 22 करोड़ बच्चे स्कुली शिक्षा प्राप्त कर रहे है यह इतनी विशाल संख्या है कि इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह अमेरिका की आबादी लगभग 28 करोड़ के एक तिहाई के बराबर ही है इतनी बड़ी संख्या तक उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाना सरकार के लिए वाकई आसान नहीं है कुछ केंद्रिय विद्यालय इस कार्य में ईमानदारी पूर्वक अवश्य लगें हुए है पर इन विद्यालयों तक सिर्फ 10 लाख बच्चों की ही पहुंच है ऐसे मे सरकार के सामने सिर्फ एक ही विकल्प बचता है कि ग्रामीण और शहरी दोनो क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता बढ़ाई जाएं, पुर्णरुप से प्रशिक्षित शिक्षकों की ही भर्ती की जाएं और समय समय पर शिक्षकों की उचित प्रशिक्षण भी सुनिश्चित किया जाएं।

केन्द्र सरकार इस कानून को पूर्णरुप से फलीभूत अपने बल बुते पर कभी नहीं कर सकती जब तक उन्हें राज्य सरकार, लोकल कम्युनिटीस् और पंचायतों का पुरा सहयोग न मिलें,राज्य सरकारों का ही ये फर्ज बनता है कि जिन जगहों पर स्कुल नहीं है वहां जल्द से जल्द स्कुल खोले, उसमें पर्याप्त शिक्षकों की भर्ती करें और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था भी सुनिश्चित करें, वैसे पिछले कुछ सालों में प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या में लगातार बढ़ते ग्राफ कुछ सुकुन देने वाला तो अवश्य है पर सरकारी स्कुलों के स्तर में आ रही लगातार गिरावट को रोके बिना सिर्फ स्कूल तक बच्चों को पहुचांने से काम नहीं बनने वाला वहीं सरकार द्वारा कानून बना देने से हमें ये सोचकर निश्चिंत नहीं बैठना चाहिए कि अब ये सब सरकार का ही काम है, हमें भी देश का जागरुक नागरिक होने के नाते बच्चों को उनके मौलिक अधिकार दिलाने के लिए ईमानदारी से प्रयास करने चाहिए,ताकि कल के देश के भविष्य इन बच्चों के सामने हमें शर्मिंदा न होना पड़े।

-नवीन देवांगन

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