लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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prashant-kishor-leadइक्कीसवीं सदी का भारत –किसने सोचा था कि दुनिया इतनी सिमट जाएगी और वो भी इतनी कि मानव की मुठ्ठी में समा जाएगी, जी हाँ आज इन्टरनेट से सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सोशल मीडिया के द्वारा वो क्रांति आई है जिसकी कल्पना भी शायद कुछ सालों पहले तक मुश्किल थी।तकनीक से ऐसी क्रान्तियाँ हमेशा ही हुई हैं जिन्होंने मानव सभ्यता की दिशा मोड़ दी है लेकिन सोशल मीडिया ने न सिर्फ भारतीय समाज बल्कि भारतीय राजनीति को भी हाई टेक कर दिया है।
राजनीति में शुरू से कूटनीति व्यवहारिकता और प्रोफेशनलिज्म हावी रहती थी लेकिन आज तकनीक हावी है।पहले अस्सी के दशक तक राजनेताओं की एक छवि एवं लोकप्रियता होती थी जो कि उनके संघर्ष एवं जनता के लिए किए गए कार्यों के आधार पर बनती थी किन्तु आज समाँ कुछ यूँ है कि पेशेवर लोगों द्वारा सोशल मीडिया का सहारा लेकर नेताओं की छवियों को गढ़ा जाता है और उन्हें लोकप्रिय बनाया जाता है।पहले परम्परागत राजनैतिक कार्यकर्ता घर घर जाकर नेता का प्रचार करते थे और आज I T सेल से जुड़े पेशेवर लोग आपके राजनेता और अपने क्लाएन्ट अर्थात् ग्राहक की छवि आपके सामने प्रस्तुत करते हैं ।भारत में चुनावों के लिए पेशेवर लोगों का इस्तेमाल पहली बार राजीव गाँधी ने किया था जब उन्होंने अपनी पार्टी की चुनावी सामग्री तैयार करने और विज्ञापनों का जिम्मा विज्ञापन एजेंसी “रीडिफ्यूजन ” को दिया था।
प्रशांत किशोर आज के इस राजनीति के वैज्ञानिक दौर में राजनैतिक दलों के लिए तारणहार बनकर उभरे हैं।सोशल मीडिया और प्रशांत किशोर के तड़के का प्रभाव सबसे पहले 16 मई 2014 को आम चुनावों के नतीजों के बाद द्रष्टीगोचर हुआ था जब नरेन्द्र मोदी भारतीय ओबामा बनकर उभरे थे।उसके बाद हाल के बिहार विधानसभा चुनावों में जिस प्रकार नीतीश कुमार ने कुछ माह पूर्व के लोकसभा चुनावों की तर्ज पर जीत दर्ज की वह एक प्रोफेशनल सांटिफिक एप्रोच के साथ सोशल मीडिया के रथ पर सवार होकर विजेता के रुप में उभरने की कहानी है।मोदी की ” चाय पर चर्चा ” नीतीश के लिए “बिहारी बनाम बाहरी” और अब पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर सिंह के लिए”काफी विद कैप्टन” तथा “पंजाब का कैप्टन” जैसे नारों का सोशल मीडिया पर वाइरल हो जाना अपने आप में राजनीति के व्यवसायीकरण तथा सोशल मीडिया की ताकत का एहसास दिलाने के लिए काफी है।
इसका सबसे पहला सफल प्रयोग 2008 में यू एस के राष्ट्रपति चुनावों में बराक ओबामा द्वारा किया गया था दरअसल 2007 तक ओबामा अमेरिकी राजनैतिक परिदृश्य में एक अनाम सीनेटर थे उनकी टीम ने जिस प्रकार डाटाबेस तैयार किया 2008 के चुनाव इतिहास बन गए ।इन चुनावों के नतीजों पर सोशल मीडिया का इतना अधिक प्रभाव देखने को मिला इन चुनावों को “फेसबुक इलेक्शन्स आफ 2008 ” कहा गया।तो यह समझा और कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया ने वैश्विक स्तर पर एक क्रांति को जन्म दिया है एक ऐसा तूफान जिसमें जो इस तकनीक से जुड़ा वो पार लग गया और जिसने इस तकनीक को कमतर आँका वो पिछड़ गया। आज सभी भारतीय राजनेता इस बात को समझ चुके हैं शायद इसीलिए जहाँ 2009 तक शशी थरुर ही एकमात्र नेता थे जो नेट पर सक्रिय थे वहीं आज पाँच साल बाद 2016 में शायद ही कोई नेता है जिसका फेसबुक और ट्विटर अकाउंट न हो।
पूर्व की सूचना की क्रान्तियों की बात करें तो रेडियो को जन जन तक पहुंचने में 38 साल लगे थे, टीवी को 14 साल,इन्टरनेट को 4 साल और फेसबुक को केवल 9 महीने ( यह आंकड़े फेसबुक स्टेटिस्टिक्स और विकिपीडिया के आधार पर हैं)।
फरवरी 2015 के दिल्ली के विधानसभा चुनावों के नतीजे तो आपको याद ही होंगे जब आम आदमी पार्टी ने जीत के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे इन नतीजों ने राजनीति में सोशल मीडिया की मौजूदगी को मजबूती प्रदान की थी।चुनाव का अधिकांश युद्ध फेसबुक और ट्विटर पर चला ।दिल्ली में लगभग 13 मिलियन रेजिस्टरड वोटर थे जिनमें लगभग 12.15 मिलियन आनलाइन थे।सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 15 अप्रैल 2014 को आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया कि राहुल और मोदी से लड़ने के लिए ईमानदार पैसा चाहिए –दो दिन में एक अपील पर एक करोड़ रुपए जमा हो गए।
सोशल मीडिया आम आदमी और राजनेताओं दोनों के लिए एक जिन बनकर उभरा है जहाँ एक तरफ चुनाव प्रचार के लिए , प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के ऊपर राजनैतिक दलों की निर्भरता खत्म हुई वहीं दूसरी तरफ आम आदमी को अपनी बात राजनेताओं तक पहुंचाने का एक सशक्त एवं प्रभावशाली माध्यम मिल गया जो आम आदमी अपनी अभिव्यक्ति की जड़ें तलाशने में लगा था उसे फेसबुक ट्विटर और वाट्स अप ने अपने विचारों को प्रस्तुत करने की न सिर्फ आजादी प्रदान करी बल्कि एक मंच भी दिया जिसके द्वारा उसकी सोच देश के सामने आए।
सोशल मीडिया का सबसे बड़ा योगदान हमारे देश की आधी आबादी (महिलाएं) एवं हमारी युवा पीढ़ी को राजनीति से जोड़ने का रहा क्योंकि इन दोनों ही वर्गों के लिए राजनीति हमेशा से ही नीरस विषय रहा है लेकिन आज फेसबुक और अन्य माध्यमों से यह दोनों ही वर्ग न सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं अपितु अपने विचार भी रख रहे हैं ।।8 से 22वर्ष के वोटर जो पहले अपने परिवार की परंपरा के आधार पर वोट डालते थे आज उनकी खुद की सोच है पसंद नापसंद है।ट्विटर और फेसबुक के पेज शख्सियत केन्द्रित है न कि विचारधारा केन्द्रित।पार्टी ब्रांड से ज्यादा व्यक्ति पर आधारित है इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण पिछले लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गाँधी के बीच देखने को मिला था।
सोशल मीडिया का यह प्रभाव केवल राजनैतिक परिदृश्य में देखने को नहीं मिला सामाजिक क्षेत्र में जो जागरूकता आई है वो भी कम नहीं है।जब चेन्नई में बाढ़ आई थी जो सोशल मीडिया का जो रूप उभर कर आया था उसने आम आदमी के समाज में योगदान को नए आयाम दिए ।
प्रशासनिक स्तर पर सोशल मीडिया का जो उपयोग हमारे केन्द्रीय मंत्री कर रहे हैं वो काबिले तारीफ है जिस प्रकार रेलमंत्री सुरेश प्रभु  ने देश के नागरिकों से सीधा संवाद स्थापित किया है और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने हमारे देश के एन आर आई के लिए स्वयं को सहज उपलब्ध कराया है वह हमारे अनेक नेताओं के लिए अनुकरणीय हो सकता है।
विज्ञान की हर नई खोज मानव सभ्यता को आगे लेकर गई है आज इन्टरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार ने दुनिया को छोटा कर दिया है सामाजिक होने की परिभाषा बदल दी है और समाज के हर वर्ग में जागरूकता का संचार किया है।
आज जब राजनीतिक अखाड़ा एक बाज़ार बन चुका है और राजनेता ऐसे उत्पाद जिनकी मार्केटिंग
में प्रोफेशनल दिग्गजों द्वारा उन्हें एक ब्रांड के रूप में वोटरों के सामने परोसा जा रहा है तो हमें भी एक जागरूक उपभोक्ता बनकर अपने नेता का चुनाव करना चाहिए।सोशल मीडिया अगर उत्पाद बेचने का एक मंच बनकर उभरा है तो निसंदेह वह जागरूकता फैलाने का एक सशक्त माध्यम भी है।यह तो आम आदमी पर निर्भर करता है कि वह इसे अपनी ताकत बनाता है या फिर कमजोरी।
डॉ. नीलम महेंद्र

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2 Comments on "लोकप्रियता का नया पैमाना सोशल मीडिया ……"

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इंसान
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भारतीय संदर्भ में ऐसे विषय को क्रान्ति स्वरूप लिखना केवल शहरों में बैठ बिस्कुट खाने से है जबकि बहुधा भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में रोटी के लाले पड़े हुए हैं| समाजवादी कल से आज के वैश्विक उपभोक्तावाद में अकस्मात छलांग लगा औसत सामान्य नागरिक छला हुआ अनुभव कर रहा है| और उस पर सर्वव्यापक भ्रष्टाचार और अनैतिकता में उसकी सोच विचारने की क्षमता को और भी क्षति पहुंची है| ऐसे में केवल राजनैतिक ही नहीं, सामाजिक नेतृत्व की भी आवश्यकता है| और, नेतृत्व संगठन में ही संभव है| मेरा तात्पर्य है जबकि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी सफाई और आधुनिक शौचालयों जैसी… Read more »
Bipin kumar sinha
Guest

Social media ek fantasi jagat ka nirman karta hai.yatharth isase door hota hai. Yah bhi ek din samapt hoga.

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