लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

आने वाले वर्षों में देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका शायद पहले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रही है। ऐसा सोनिया कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों को एहसास होने लगा है। वैसे तो देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की सदा से ही महत्ता रही है। ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली पहुंचने का रास्ता लखनऊ से होकर निकलता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से वहां के क्षेत्रीय दलों ने यह रास्ता सोनिया कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए बंदकर दिया है। लखनऊ में सत्ता चाहे मूलायम सिंह के हाथ में आए या उसकी धुर-विरोधी मायावती के हाथ में, सोनिया कांग्रेस और भाजपा का झगड़ा तीसरा और चौथी जगह के लिए होने लगा है। इन दोनों दलों के लिए लखनऊ प्रतिबंधित हो जाने के लिए क्षेत्रीय दलों पर निर्भर होना पड़ रहा है। कई बार तो क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता इतनी बढ़ जाती है कि दोनों ही दल अपने मूल मुद्दे को उठाने से डरने लगते हैं। भाजपा धारा-370 को लेकर मौन धारण कर लेती हैऔर बेचारी सोनिया कांग्रेस भारत को बांटने के लिए लाया गया सांप्रदायिक हिंसा बिल पर चाहकर भी आगे नहीं बढ़ा सकती क्योंकि उसका सबसे मूखर-विरोधी ममता बनर्जी हीं करना शुरू कर देती है। सोनिया कांग्रेस को लखनऊ इसलिए फतह करना है ताकि वह दिल्ली में विदेशी भारत विरोधी साम्राज्यवादियों के एजेंडा को असफल कर सके। सोनिया गांधी ने इस अभियान में युवराज राहुल गांधी को उतारा जिसने भट्टा पारसौल में जाकर अपनी भी फजीहत करवाई और अपनी पार्टी को भी उपहासपद स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया।

पिछले कुछ वर्षों से भारतीय जनता पार्टी भी आधे-अधूरे मने से लखनऊ फतह के प्रयासों में लगी हुई है लेकिन उसे शायद सफलता इसलिए नहीं मिल पा रही क्योंकि एक तो उसके यह प्रयास समग्र योजना के अभाव में कामचलाऊं पेवन जैसे थे और दूसरे आंतरिक गुटों में बंटी भाजपा को एकजूट करना मुश्किल था। विभाजन का यह देश कार्यकर्ता के स्तर पर इतना गहरा नहीं है जितना प्रदेश के नेतृत्व के स्तर पर। लेकिन लगता है अब भाजपा ने लखनऊ में अपनी पहली असफलताओं से सबक सीखते हुए नई रणनीति तैयार की है और आशा है की जानी चाहिए कि देर-सबेर उसके परिणाम भी आने शुरू होंगे।

इसका प्रमाण तब मिला जब पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तमाम संशयों और भ्रमों का निराकरण करते हुए उमा भारती को उत्तर प्रदेश में जनांदोलन चलाने की जिम्मेदारी सौंपी। उमा भारती को लेकर मतभेद हो सकते हैं लेकिन इसबात से कोई इनकार नहीं करता कि उसमें मुद्दों के आधार पर जनता को आंदोलित करने की वह ऊर्जा हो जो आजकल बहुत कम लोगों में दिखाई देती है। प्रश्न उमा भारती की विश्वसनीयता का है जो आज भी जन-जन में उसी प्रकार बरकरार है। उमा भारती की अपिल किसी खास क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों के कारण उसकी व्याप्ति देश के हर ओर-छोर तक है। भाजपा से बाहर रखते हुए भी उमा भारती उन्हीं मुद्दों को लेकर संघर्षरत रही जो मुद्दे भाजपा के लिए आधार का काम करते हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास इस प्रकार का कोई नेता नहीं था जिसकी रसोई सारे प्रदेश में हो। गडकरी ने उमा भारती को उत्तर प्रदेश में कार्य करने का अवसर देकर इस बात के संकेत दिए हैं कि भाजपा अब उत्तर प्रदेश में अल्पकालिक प्राप्तियों के लिए राजनीति नहीं करेगी बल्कि पिछले कुछ दशकों से प्रदेश में हुई छति को पाटने का दीर्घकालीन और वैचारिक आधारवाला प्रयोग करेगी।

इसी शृंखला में गडकरी ने भारतीय जनता पार्टी के श्रेष्ठ संगठनकर्ता संजय जोशी को उत्तर प्रदेश की चुनावी विवाद पर उतारकर यह संकेत दिया है कि भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्रीय अंतर विरोधों को दरकिनार कर वह एक सकारात्मक प्रयोग करना चाहते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि पिछले कुछ अर्से से संजय जोशी की संगठनात्मक ऊ र्जा का लाभ पार्टी को नहीं मिल रहा था। आधुनिक शब्दावली में, जिसका राजनैतिक दलों में भी प्रचलन बढ़ गया है, इसे ‘मैनेजमेंट फैल्यूअर’ ही कहा जाना चाहिए। नितिन गडकरी ने उचित समय पर इस ‘मैनेजमेंट फैल्यूअर’ को चेक किया है और उसे ठीक करने का प्रयास भी। सभी मानते हैं कि मीडिया की चकाचौंध से दूर रहकर संजय जोशी धरातल पर कार्य करने वाले ऐसे कार्यकर्ता हैं जिनकी संगठन क्षमता का लाभ पार्टी अनेक बार मिला है। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी अन्य राजनैतिक दलों की तरह मात्र राजनैतिक दल नही है। बल्कि यह एक ऐसा वैचारिक आंदोलन है जो भारत को विश्वगुरू बनाने का सपना संजोए हुए है और उसकी मूल पहचान को भी बचाए रखना चाहता है। आज जब भारत की इस मूल पहचान पर ही सोनिया कांग्रेस समेत अनेक विदेशी शक्तियां प्रहार कर रही है तो भाजपा के वैचारिक आंदोलन के अगुआ के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वह सभी संविचारी लोगों को एक सूत्र में बांधने के सफल प्रयोग करें। उमा भारती और अब संजय जोशी को इस वैचारिक प्रवाह की धारा में समाहित करके नितिन गडकरी ने एक ऐसा प्रयोग किया है जिसके परिणाम उत्तर प्रदेश में तो मिलेंगे ही बाद में राष्ट्रीय स्तर पर भी उनको अनुभव किया जाने लगेगा।

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