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हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनावों के बाद बसपा सहित कई दलों नें ईवीएम में गडबड़ी की शिकायत की थी। इसी के जवाब में चुनाव आयोग ने अपने एक विस्तृत प्रेस नोट में ईवीएम को पूरी तरह सुरक्षित करार दिया है।

निर्वाचन आयोग के अनुसार ये मशीनें किसी भी तरीके से किसी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती है, इसलिए आंकड़ों में फेरबदल संभव ही नहीं है। उच्‍च न्‍यायालय और उच्‍चतम न्‍यायालय ने भी पहले ऐसे आरोपों को खारिज कर चुके हैं।

ये पहली बार नहीं है कि चुनाव आयोग के सामने ईवीएम को लेकर शिकायत की गई हो, और हर बार की तरह इस बार भी चुनाव आयोग ईवीएम पर अपने दावों को लेकर सख्त है।

सन 2000 से अब तक देश में राज्य विधान सभा के लिए 107 आम चुनाव और पिछले 3 लोकसभा के आम चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया है। 15 मार्च 1989 से जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव के बाद ये चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बना था।

ईवीएम उपयोग पर शिकायतें 2001 से ही देश के कई उच्च न्यायालयों में की जा चुकी है जिसमें ईवीएम को गलत साबित नहीं किया जा सका। 2009 में, दिल्ली उच्च न्यायालय में ईवीएम को लेकर आरोप लगाए गए।

जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने ईवीएम में धांधली नहीं होने का फैसला दिया, लेकिन इसकी पारदर्शिता को और बढाने के लिए वीवीपीएटी के विकास को लेकर फैसला किया।

वीवीपीएटी ईवीएम से जुड़ी मशीन है जिसमें एक पेपर पर वोट देखने की सुविधा होती है। अभी देश के कई चुनावों में वीवीपीएटी का उपयोग किया जा रहा है लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में इसके उपयोग के लिए 3 हजार 174 करोड़ रूपए की जरूरत होगी और इसके निर्माण के लिए 30 माह का समय चाहिए।

लेकिन आयोग ईवीएम को ही पर्याप्त मानता है क्योंकि उसके अनुसार ये किसी भी कम्प्यूटर औऱ नेटवर्क से जुड़ा नहीं होता और इसकी चिप एक बार ही काम में लाई जा सकती है। इस तरह एक बार फिर चुनाव आयोग ईवीएम की पारदर्शिता को लेकर सबके सामने आया है।

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