लेखक परिचय

रंजीत रंजन सिंह

रंजीत रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्‍थान से पत्रकारिता में स्‍नातकोत्‍तर की उपाधि प्राप्‍त करने वाले लेखक ऑल इंडिया रेडिया (न्‍यूज) के समाचार संपादक हैं।

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-रंजीत रंजन सिंह-
nitish kumar

-नीतीश का लालूकरण-1-

राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से बिहार में राज्यसभा की दो सीटों के उपचुनाव में जनता दल यूनाइटेड ने दोनों सीटें जीत ली। राजद पहले से ही जदयू की जीतनराम मांझी सरकार को समर्थन दे रही है। ऐसे में राज्यसभा के चुनाव में जदयू को समर्थन देना कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लालू प्रसाद से मुंह खोलकर समर्थन मांगना आम जनता के गले से नहीं उतर रहा है और नीतीश कुमार को भी लोग उसी नजर से देखना शुरू कर दिए हैं, जिस नजर से लोग लालू प्रसाद और रामविलास पासवान या अन्य नेताओं को देखते आ रहे हैं। अब आप सवाल करेंगे कि इसमें गलत क्या है और राजद से समर्थन लेने में या जदयू-राजद गठबंधन से आम जनता को ऐतराज क्यों है?

इस सवाल का जवाब देने के लिए मैं अमरिका में घटित एक वाक्या का सहारा लेना चाहूंगा। अमरिका के पूर्व राष्ट्रपति केनेडी की विधवा जेकलीन केनेडी ने स्पेन के करोड़पति आनेसिस से शादी करना तय किया तो अमरिका में हायतौबा मच गई। नैतिकता की दुहाई दी जाने लगी। जरा सोचिए… अमरिका में नैतिकता की दुहाई, वो भी सिर्फ एक औरत की दूसरी शादी करने के निर्णय पर। उस समाज में नैतिकता की दुहाई जहां दो-चार शादियां और तलाक आम बात है। बाद में पता चला कि जेकलीन कभी अमरिकी जीवन की आदर्श पत्नी रही हैं। वहां के लोग उनके आदर्श को आदर्श बनाए रखना चाहते हैं, इसिलिए उनकी दूसरी शादी का विरोध कर रहे हैं।

एक ही आंदोलन से निकले लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की सोच में विकास को लेकर बुनियादी अंतर है। इसी सोच ने 1994 में नीतीश कुमार को लालू प्रसाद से अलग कर दिया और श्री कुमार पहले समता पार्टी और फिर जदयू के बैनर तले लालू प्राद की नीतियों के खिलाफ लड़े। लालू प्रसाद ने 1990 से 2004 तक बिहार को भूतबंगला में तब्दील कर अपराधियों का अड्डा, डर का प्रतीक और नरसंहार का प्रयोगशाला बनाकर रख दिया। लोग रेल सफर में भी बिहार से होकर गुजरने से डरते थे। दूसरे राज्यों में बिहारी और ललूआ शब्द गाली और नफरत का प्रतीक बन गया। बिहारी छात्रों को दूसरे राज्यों में अपमान सहना पड़ा। नीतीश कुमार ने अपनी कार्य-कुशलता से 2005 से 2010 के शासन में बिहार की पहचान बदल डाली। बिहार में हजारों किलोमीटर सड़कें बनी, सैकड़ों पूल व पुलिया बने, कई लाख शिक्षकों की बहाली हुई, स्वास्थ्य सेवाएं बहाल हुईं, साईकिल योजना की सफलता के कारण विद्यालयों में छात्राओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई, प्राथमिक, मध्य और उच्च विद्यालयों की स्थिति सुधरी, 50 फीसदी आरक्षण के कारण पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी, कानून व्यवस्था में सुधार हुआ, लोग देर रात तक घर से बाहर देखे जाने लगे, राज्य का सकल घरेलू उत्पाद पिछले 9 सालों में 10 से 11 के आसपास रहा जो कि देश में सर्वश्रेष्ठ है। बिहारी अस्मिता और स्वाभिमान को भी नई पहचान मिली और देश दुनिया में बिहारी कहलाना सम्मान की बात हो गई। इस तरह से कई और काम हैं जिससे साबित होता है कि नीतीश कुमार ने बिहार को फर्श से अर्श पर पहुंचाने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। पहले शासनकाल में नीतीश कुमार जनता की नजर में एक महानायक बनकर उभरे। नैतिक धर्मों का पालन करने वाला एक ऐसा सैद्धांतिक व्यक्तित्व बने जिसने बिहार को जंगल राज से निकालकर सुबे में अमन चैन स्थापित किया। उनके काम का पुरस्कार जनता ने 2009 के लोकसभा चुनाव और 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में दी। 2010 की जीत ने ही नीतीश कुमार में दंभ और घमंड (जिसे वे स्वाभिमान कहते हैं) भर दिया। उसी घमंड ने सिद्धांत की बात कर जदयू-भाजपा की दोस्ती तोड़ दी। नमो आंधी में जदयू की हालत ऐसी हुई कि पार्टी 2 पर सिमट गई और नीतीश कुमार ने नैतिकता का हवाला देकर मुख्यमंत्री पर से इस्तीफा दे दिया।

भाजपा से गठबंधन तोड़ने का निर्णय गलत हो सकता है, नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री का पद छोड़ना सही हो सकता है, लेकिन उसके बाद जो कुछ भी हो रहा है उसे आम जनता को स्वीकारना मुश्किल हो रहा है। नैतिकता के स्वघाषित पुजारी नीतीश कुमार की नैतिकता तब कहां थी जब भाजपा से नाता तोड़ने के बाद इस्तीफा देकर जनता की अदालत में जाना तो दूर, फिर से मंत्रिमंडल का गठन भी उन्होंने उचित नहीं समझा था। एक रेल दुर्घटना पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेलमंत्री पद से इस्तीफा देकर उन्होंने नैतिकता का बेमिसाल उदाहरण पेश किया था, लेकिन गोधरा और गुजरात हिंसा के वक्त उनकी नैतकिता कहां चली गई थी?

नीतीश कुमार ने कहा है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं है। तो क्या यह सच नहीं है कि नरेन्द्र मोदी के कारण भाजपा से नाता तोड़ी गई? मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने कहा है कि भाजपा को रोकना उनका मकसद और गैर भाजपावाद उनकी नीति है। नीतीश कुमार जी, जदयू की नीति तो गैर-कांग्रेसवाद और विकास की रही है। फिर रातों-रात पार्टी की नीति कैसे बदल गई? भाजपा ने ऐसा क्या कर दिया कि पार्टी ने चाल, चरित्र और चेहरा सब बदल लिया? कौन सा भूकंप आ गया कि विकास की राजनीति को छोड़कर आप गैर-भाजपावाद की नीति पर आ गए और वही भाषा बोलने लगे जो आज तक लालू प्रसाद बोलते थे। और तो और, नीतीश जी अब तो आपका दिल भी लालू-लालू बोले जा रहा है और लालू प्रसाद एवं कांग्रेस से दोस्ती के लिए आप बांहें फैलाकर खड़े हैं। मगर सच तो यह है कि आपके ये सारे कदम आपको राजनीतिक आत्महत्या की ओर लेकर जा रही है। क्योंकि 1990-2004 के दौरान लालू-राबड़ी शासनकाल को देखते हुए बिहार की जनता कभी भी लालू प्रसाद को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, और न ही आपकी हरकत उनकी तरह देखना चाहती है। आप कह सकते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, राजनीति में कल का दुश्मन आज को दोस्त हो सकता है, राजनीति में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, आज की राजनीति में नैतिकता और सिद्धांत के लिए कोई जगह नहीं रह गई है। आप यह भी कह सकते हैं कि आप वही कर रहे हैं जो देश के कई बड़े नेता कर रहे हैं, तो इसमें आपकी गलती क्या है? आपसे लोग नाराज क्यों हैं? नाराजगी हैं नीतीश जी, ठीक उसी तरह जिस तरह जेकलीन केनेडी के शादी के निर्णय से अमरिकी जनता में नाराजगी हुई थी।

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1 Comment on "राजनीतिक आत्महत्या की ओर नीतीश कुमार!"

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RAHUL RANJAN DANGI
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नीतीश कुमार का भी बुरा वक्त आ गया है। …..

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