लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

 

वेद, उपनिषद, दर्शनादि ग्रन्थों के अनुसार शरीरी अर्थात जीवात्मा शरीर से पृथक है । सुन्दर वृद्ध होने वाले शरीर में इसका भोग करने वाला बैठा है । जीवात्मा देह बदलता रहता है । सुख- दुःख शरीर को प्राप्त होते हैं, परन्तु जो सदा से है, शरीर के साथ नष्ट नहीं होता, वह इस शरीर से पृथक है । जब एक बालक यौवन और वृद्धता को प्राप्त होता है तो उसका जीवात्मा नहीं बदलता । जीवात्मा नित्य, अजर अर्थात अमर है । श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने युद्ध से विरत अर्जुन को युद्ध करने की प्रेरणा देते हुए कहा है कि वह आत्मा जो सब में बैठा कर्म करवाता है, वह न तो कभी नहीं था, ऐसा है  और न कभी नहीं रहेगा, ऐसा है । इस कारण किसी के मरने-जीने का दुःख करने की आवश्यकता नहीं । कारण यह है कि जो कर्म करने वाला है, वह मरता अथवा पैदा होता ही नहीं । वैदिक सिद्धान्तानुसार-

अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्राता मध्यमो अस्त्यश्नः । 1-164-1

अर्थात- इस सुन्दर बूढ़ा होने वाले तथा यज्ञकर्म करने वाले के बीच में एक इसका भाई भोग करने वाला बैठा है ।

अभिप्राय है कि सुन्दर, बूढ़ा होने वाला और यज्ञकर्म करने वाला यह शरीर (मनुष्य) है । शरीर के भीतर भोग करने वाला शरीर से पृथक् है ।  वह सदा से है। ऐसा नहीं है कि वह कभी नहीं था अथवा ऐसा नहीं है कि वह कभी नहीं रहेगा । वह अजर-अमर ही सब मनुष्यों में है ।

सत् उन पदार्थों को कहा गया है जो अनादि तथा अजर (अमर) होते हैं । असत् उनको कहते हैं जो जिस रूप में दिखाई देते हैं, उस रूप में सदा नहीं रहते तथा नहीं रहें हों । उदहारण के रूप में लकड़ी की एक कुर्सी है। यह असत् है । कुर्सी को तोड़-फोड़कर लकड़ी के टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है अथवा उसको चीर-फाड़कर उसमें से चौकी बनाई जा सकती है। अतः कुर्सी असत् है । चौकी अथवा लकड़ी के टुकड़े भी तोड़े-फाड़े जा सकते हैं । लकड़ी को अग्नि में जलाकर राख किया जा सकता है । अतः लकड़ी के टुकड़े भी असत् हैं । जब लकड़ी जला दी जाती है तो वह कार्बनडाई आक्साइड में बदल जाती है । इस कारण लकड़ी भी असत् है । जल से विद्युत् तरंगे गुजारे जाने पर जल दो प्रकार की वायुओं – ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन में बदल जाता है । इसी प्रकार कार्बनडाई आक्साइड भी कार्बन और ऑक्साईड में बदल जाते हैं । अभिप्राय यह है कि जल तथा कार्बनडाई – ऑक्साईड भी असत् हैं  l कार्बन के बहुत छोटे – छोटे कण होते हैं , जिन्हें परिमण्डल कहा जाता है । जिसे  आज के आंग्ल वैज्ञानिक भाषा में एटम कहते हैं । इसी प्रकार ऑक्सीजन के भी परिमण्डल होते हैं । ये परिमण्डल वस्तुतः कार्बन तथा ऑक्सीजन ही हैं । कारण यह कि उन्हीं के से गुण वाले होते हैं । परन्तु इन परिमण्डलों का भी विखण्डन होता है । सब प्रकार  के परिमण्डल तीन प्रकार के कणों अर्थात पार्टिकल्स में बँट जाते हैं । उनको वैकारिक अहंकार (प्रोटोन्स), तैजस अहंकार (इलेक्ट्रोन्स) और भूतादि अहंकार (न्युट्रोन्स) कहते हैं ।

इस प्रकार परिमण्डल भी असत् है । ये कण भी टूट सकते हैं और फिर टूटकर परमाणु बन जाते है । सांख्य दर्शन में परमाणु साम्यावस्था में कहे गए हैं । यही प्रकृति कहलाती है ।

सांख्य दर्शन में इसके स्वरुप का स्पष्ट वर्णन अंकित है । अतः इलेक्ट्रोन इत्यादि कण भी असत् हैं । परन्तु परमाणु (अल्टीमेट पार्टिकल्स) का विखंडन नहीं हो सकता। इस कारण परमाणु सत् हैं । वैदिक साहित्यों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि पदार्थों के परमाणु सत् हैं , वे नष्ट नहीं हो सकते । उनकी रूप – राशि स्थिर है । जब वे अकेले – अकेले होते हैं , तब भी और जब वे मिलकर अहंकार-परिमण्डल तथा संसार के भिन्न – भिन्न पदार्थ बनाते हैं , तब भी वे (उनकी रूप-राशि) नहीं बदलती । वे भिन्न – भिन्न प्रकार के परिमण्डलों में भिन्न – भिन्न संख्या में भिन्न-भिन्न प्रकार से संयुक्त होकर संसार के सब पदार्थ बनाते हैं ।

श्रीमदभगवदगीता के अध्याय 2 के  श्लोक 17 में नाश रहित और अविनाशी अर्थात असत् का वर्णन करते हुए कहा है –

अविनाशी तु तद्विद्वि येन सर्वमिदं ततम् ।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति । ।

-श्रीमदभगवदगीता अध्याय 2 श्लोक 17

अर्थात – नाशरहित उसको जानो जो जो यह सब जगत में उपस्थित (ओत – प्रोत) है । इस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं ।

 

‘इदं सर्वमिदं ततम्’ का अर्थ है यह सब संसार ।

यह परमाणु रूप प्रकृति पूर्ण संसार में व्याप्त है । यह सत् है । इसी कारण इसे अविनाशी कहा है । इस अविनाशी (परमाणु रूप प्रकृति) का कोई नाश नहीं कर सकता । छान्दोग्योपनिषद 6-2-1 में कहा है –

सदेव सोम्येदमग्र आसदेकमेवाद्वितीयम् । तर्द्धक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयमतास्माद्सतः सज्जायत ।

-छान्दोग्योपनिषद 6-2-1

अर्थात – हे सौम्य ! आरंभ में यह एकमात्र सत् ही था । उसके विषय में ऐसा भी कहा गया है कि आरम्भ में वह एकमात्र असत् ही था । उस असत् से सबकी उत्पत्ति हुई ।

छान्दोग्योपनिषदकार कहता है कि सत् से असत् और असत् से सत् ऐसा कहा जाता है । कौन पहले और कौन बाद में , कुछ नहीं कहा जा सकता । जगत से परमाणु और परमाणु से पुनः जगत आदिकाल से यह क्रम चला आया है ।

संयोग-वियोग एक दूसरे के उपरान्त चलता रहता ही ,परन्तु जो बात विशेष है वह यह कि किसी एक पदार्थ के परमाणु उस पदार्थ के टूटने के उपरान्त पुनः उसी प्रकार मिलेंगे , नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार बने पदार्थ असत् हैं l गीता के कुछ भाष्यकार उपरोक्त मन्त्र में ‘इदं सर्वमिदं ततम्’ का अर्थ यह सब संसार तो मानते हैं परन्तु तद्विद्वि का अर्थ परमात्मा करते ,लगाते हैं । वैदिक विद्वानों के अनुसार यह अशुद्ध है , क्योंकि यहाँ प्रकृति का वर्णन हो रहा है , परमात्मा का नहीं । और आत्मा का क्षेत्र यह शरीर है । शरीर से बाहर नहीं । इसे यह स्पष्ट होता है कि यहाँ सत् – असत् प्रकृति के दो रूपों का वर्णन हो रहा है । जो सत् है वह सब स्थान पर हैl यह प्रकृति का वह स्वरुप है जो नित्य है अर्थात परमाणु रूप है ।

इसके आगे के श्लोक अर्थात श्रीमदभगवदगीता  अध्याय 2 , श्लोक 18 में मनुष्य अथवा प्राणियों के शरीर को नाशवान अर्थात असत् और शरीर में वास करने वाले जीवात्मा को नित्य कहा है –

 

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युद्यस्व भारत । ।

-श्रीमदभगवदगीता अध्याय 2 श्लोक 18

अर्थात – अप्रमेय तथा नित्य शरीरी (जीवात्मा) के ये शरीर नाश होने वाले कहे गए हैं ।

 

अभिप्राय यह है कि जो शरीर है वह असत् है । शरीर का रूप नष्ट होता है । इसका वह स्वरुप जो मूलप्रकृति का है , नष्ट नहीं होता । वह सदा बन रहता है । इसलिए हे भारत ! युद्ध कर । सत् और असत् का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को श्रीमदभगवद गीता के अध्याय दो में बताया है कि शरीर तो नित्य नहीं होने के कारण नष्ट होने वाला है तो फिर इसका नाश हो जाने से कुछ हानि नहीं होगी क्योंकि यह कभी न कभी तो नष्ट होगा ही, हाँ, जीवात्मा नित्य है, वह मरता नहीं । प्रश्न उत्पन्न होता है कि तो फिर मरता क्या है? मृत्यु शरीर और आत्मा (नाशवान और अविनाशी) के संयोग की समाप्ति ही है । संयोग का टूटना अथवा बनना किसी उद्देश्य से होता है । यदि वह उद्देश्य जिससे शरीर और जीवात्मा का संयोग हुआ था, पूर्ण नहीं हो रहा अथवा वह संयोग धर्म का नाश कर रहा है तो उसके टूटने में कोई हानि नहीं, लाभ ही होगा ।

 

 

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