लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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गुजरात में २००२ के दंगों ने जहां भारतीय जनता पार्टी की कथित साम्प्रदायिक छवि को पुख्ता किया था वहीं राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश-दुनिया में अछूत बना दिया था। खासकर पश्चिमी देशों में मोदी के विरुद्ध प्रतिक्रिया अत्यधिक तीव्र थी। तमाम देशों ने मोदी और गुजरात से अपने रिश्तों पर विराम लगा दिया था। किन्तु बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अब इन देशों ने मोदी से अपने रिश्तों को सुधारने और उन्हें एक नया आयाम देने बाबत कमर कास ली है। हाल ही में ब्रिटेन के राजदूत ने मोदी से मुलाक़ात की और वाईव्रैंट गुजरात के जरिए निवेश की संभावनाओं को टटोला। ब्रिटेन के इस कदम से अब उम्मीद बनी है कि अमेरिका भी मोदी विरोध की रणनीति त्याग कर दोस्ती का हाथ बढ़ा सकता है। देखा जाए तो यह सब अचानक नहीं हो रहा। मोदी से दोस्ती के पीछे पश्चिमी देशों में आए आर्थिक व राजनीतिक बदलाव की महती भूमिका है। चूँकि ब्रिटेन यूरोपीय देशों के प्रतिनिधित्व करता है लिहाजा यूरोपीय देशों का निवेश के जरिए मोदी के करीब आना भविष्य की दृष्टि से दोनों के लिए अवश्यंभावी है। दरअसल पिछले एक दशक में गुजरात ने आर्थिक मोर्चे पर जबरदस्त प्रगति की है। वहीँ मोदी की छवि एक सख्त व कुशल प्रशासक की निर्मित हुई है। टाटा, अदानी, अम्बानी जैसे औद्योगिक समूहों को कम कीमत पर सुरक्षित निवेश का माहौल प्रदान कर मोदी ने जमकर वाहवाही बटोरी है। देश ही नहीं वरन विदेशी कम्पनियां भी मोदी के करीब आना चाहती हैं। फिर इस वर्ष मोदी की चीन व जापान यात्रा में जिस तरह का प्रतिसाद मिला है उससे भी मोदी की चमक बढ़ी ही है। पश्चिमी देशों का मोदी के प्रति बढ़ता प्रेम भी इसी चमक की बदौलत है। ब्रिटेन और अमेरिका में आर्थिक संकट का बढ़ना और मोदी का निवेश गुरु के रूप में परिलक्षित होना ही दोनों को करीब ला रहा है। भारत में वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता के दौर में मोदी ही एकमात्र राजनीतिज्ञ दिखाई देते हैं जो इस दौर को समाप्त करने का माद्दा रखते हैं। फिर यूपीए नीत संप्रग सरकार के हालिया कड़े आर्थिक सुधारों को लागू करने में भाजपा कड़ा एतराज कर रही है। पश्चिमी देशों का मानना है कि केंद्र सरकार को अपने फैसले क्रियान्वित करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा किन्तु मोदी के चलते विपक्ष उनके हितों को संरक्षण प्रदान कर सकता है। वैसे भी एफडीआई के मुद्दे पर विदेशी कम्पनियां भारत के बाजार पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहती हैं और मोदी के हाथों उन्हें अपना भविष्य उज्जवल नजर आता है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी ही होगा कि मोदी संघ और भाजपा के रीति-नीतियों से इतर इनके हितों को कितना संरक्षण दे पाते हैं किन्तु मोदी को लेकर जो संभावनाएं तथा कयास लगाए जा रहे हैं उन्हें देखते हुए पश्चिमी देशों की मोदी को लेकर उम्मीद बेमानी भी नहीं लगती।

 

जहां तक पश्चिमी देशों से दोस्ती पर कदमताल करने का सवाल है तो मोदी यह मौका भला क्यों चूकेंगे? ऐसे माहौल में जबकि आए दिन मध्यावधि चुनाव के संकेत पुख्ता होते जा रहे हैं और केंद्र के सहयोगी सरकार से अपना दामन छुडाना चाहते हैं, मोदी के लिए विदेशी निवेश और पश्चिमी देशों से दोस्ती; दोनों ही संजीवनी का काम करेंगी। इससे मोदी की प्रधानमन्त्री पद की दावेदारी अधिक पुख्ता होगी। फिर गुजरात दंगों के चलते मोदी पर दागों के धुलने के आसार भी हैं ही। चूँकि देश की राजनीतिक व्यवस्था अब विदेशी मीडिया के हांके अपना भविष्य तय करने लगी है तो मोदी की विदेशी तारीफ उनके राजनीतिक कद को ऐसे स्थान पर पहुंचा देगी जहां विरोध की तमाम आशंकाओं पर पूर्ण विराम लग जाएंगे। मोदी का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने वाले अमेरिका ने भी मोदी से आपसी अदावत को खत्म करने का मन बनाया है। हालांकि अमेरिका में इस वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद ही इस सम्बन्ध सुधार पर मुहर लग पाएगी किन्तु यदि ऐसा होता है तो निश्चित रूप से उन मुंहों पर ताले लग जाएंगे जो मोदी-अमेरिकी दुश्मनी के चलते अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में महारथ हासिल कर चुके थे। कुल मिलकर मोदी की सांप्रदायिक छवि से परहेज करने वाले पश्चिमी देश और मीडिया यदि मोदी के गुणगान में लगे हैं तो समझ लेना चाहिए कि मोदी की कार्यशैली तथा प्रशासनिक सूझबूझ ने उन्हें लोकप्रिय नेताओं की कतार में अग्रणी बना दिया है। गुजरात चुनाव में जीत मोदी को पार्टी में सिरमौर तो बनाएगी ही, केंद्र की राजनीति में भी अमूल-चूल परिवर्तन लक्षित होंगे जिसका फायदा मोदी सहित पश्चिमी देशों को मिलना तय है।

 

सिद्धार्थ शंकर गौतम

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2 Comments on "यूंही नहीं उमड़ा मोदी प्रेम.."

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anil gupta
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वास्तव में २००२ का गुजरात का सांप्रदायिक दंगा एन डी ऐ के छः वर्षों के शाशन काल का एक अपवाद है अन्यथा भाजपा नेतृत्व वाले एन डी ऐ के शाशन में देश में कहीं पर भी सांप्रदायिक तनाव नहीं रहा. गुजरात भी गोधरा की लोमहर्षक घटना की प्रतिक्रिया थी जिसमे लगभग ग्यारह सौ मृतकों में एक तिहाई हिन्दू थे. इससे कहीं ज्यादा जन हानि १९६९ के महात्मा गाँधी जन्म शताब्दी वर्ष में गुजरात में हुए दंगो में हुई थी जिस समय कांग्रेस के हितेंद्र देसाई मुख्य मंत्री थे.देश की हिन्दू विरोधी शक्तियां केवल बहाना ढूढ़ रही थीं की किस प्रकार… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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मॉर्गन थाऊ की “पॉलिटिक्स अमंग नेशन्स” की पाठ्य पुस्तक कहती है, कि संसार के बडे देश, ही विश्व शक्ति होने की क्षमता रखते हैं। इसमें अमरिका, रूस, चीन, भारत, इत्यादि गिने जाते हैं।
फिर जो भी चुनाव जीत ने की संभावना होती है, उसके साथ संबंध सुधारने के लिए, कुशलता से पैंतरा बदलना होता है।
बस इसी का परिणाम आप पश्चिम का मोदी पैंतरा बदलते देख रहें हैं।
मोदी किसी के कूट्व्यूह में फँसने की संभावना न्यूनतम है।

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