लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डा0 आशीष वशिष्ठ

‘यह अजीब देश है जहां 60 प्रतिशत आबादी खुले में शौच करने जाती है लेकिन मोबाइल फोन धारकों की संख्या 70 करोड़ पहुंच गर्इ है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का यह बयान खुद उनको और यूपीए सरकार को तो कटघरे में खड़ा करता ही है, वहीं देश की सच्ची और करूण तस्वीर को भी बखूबी बयां करता है। विश्व के तमाम विकासशील देशों में भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति ठीक-ठाक है, और सरकार खुद को बड़ी तेजी से उभरती शकित और मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया के सामने पेश करती है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आजादी के 64 सालों बाद भी आबादी के बड़े हिस्से तक मामूली बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। कस्बों और गांवों की ही नहीं शहरों व महानगरों की दशा भी दयनीय और चिंताजनक है। रमेश ने सरकार द्वारा चलाये जा रहे सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) पर चिंता जतार्इ। उन्होंने कहा कि इस अभियान को मात्र एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है। रमेश ने कहा कि महिलाएं शौचालय नहीं मोबाइल फोन मांग रही हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सहस्राबिद विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2011-12 को जारी करते हुए रमेश ने कहा कि महिलाएं शौचालय नहीं, मोबाइल फोन मांग रही हैं, स्वच्छता काफी कठिन मुद्दा है। जब देश का केंद्रीय मंत्री चिंता जता रहा हो तो समस्या की गंभीरता और गहरार्इ का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। डब्लयूएचओ और युनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में खुले में शौच करने वालों की संख्या 1.2 बिलियन है, जिसमें से 665 मिलियन भारत के निवासी हैं।

 

गौरतलब है कि साफ-सफार्इ का प्रदूषण प्रभाव काफी व्यापक होता है। सतही जल के तीन-चौथार्इ संसाधन प्रदूषित है ओर अस्सी फीसदी प्रदूषण मात्र सीवेज लाइन के कारण हैं। कमजोर साफ सफार्इ की परिस्थितियों विशेष रूप से स्लम्स में होती है। जिनसे हैजा, और आंत्रशोध की बीमारियां फैल जाती है। समूचे भारत में जलीय बीमारियों से काफी बड़ी संख्या में नश्वरता होती है और उससे लोगों के जीवन और उत्पादकता की दृषिट से काफी बोझ बढ़ जाता है। पर्यावरणीय स्वास्थ्य बोझ के लिए साठ फीसद के लिए जल और साफ सफार्इ की बीमारियां जिम्मेदार है। आज भारत की गिनती विश्व के उन देशों में की जा रही है, जो सर्वाधिक गंदे एवं प्रदूषित हैं। ग्रामों, कस्बों एवं शहरों की सड़कों पर कूड़े-कचरे के ढेरों को देखा जा सकता है। यहां ऐसी झोपड़-पटिटयां हैं, जहां शौचालय की कोर्इ व्यवस्था नहीं है। बच्चों को नित्य-क्रिया के लिए नालों, पोखरों और नदियों के किनारे बैठा देखा जा सकता है। हमारे देश में अधिकांश लोगों की यह सामान्य आदत है कि जब भी, विशेषरूप से प्रात:काल रेलगाड़ी रेलवे स्टेशनों पर खड़ी होती है, यात्री तभी शौच क्रिया से निवृत्त होते है जिसके कारण मल पटरियों पर जमा होता रहता है। यही कारण है कि एक विदेशी प्रतिनिधि मण्डल द्वारा यह लज्जाजनक की गर्इ टिप्पणी ‘भारत एक विशाल शौचालय है’

 

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिरकर इन हालातों के लिए जिम्मेदार कौन है? देश को आजादी मिले 64 साल हुए हैं और मोबाइल सेवाओं को लांच हुए लगभग ढार्इ दशक बीते हैं, सही मायनों में देश के आम आदमी तक मोबाइल की पहुंच को अभी एक दशक भी नहीं हुआ है। मोबाइल, इंटरनेट और डिश टीवी को आम आदमी तक पहुंचाने में सरकार और मल्टी नेशनल कंपनियां जितनी गंभीर और प्रयासरत हैं, अगर उस मेहनत का दस फीसद ध्यान भी अगर कस्बों, गांवों और नगरों में शौचालय बनाने की ओर दिया जाए तो हालात बदल सकते हैं। रमेश ने अपनी कमी को खुद इशारा करने की हिम्मत तो जुटार्इ लेकिन ये वो कड़वी हकीकत और सच्चार्इ है जिसे सुनकर सारी दुनिया के सामने हमारी गर्दन झुक जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 5161 शहरों में से 4861 शहरों में सीवरेज की व्यवस्था ही नहीं है। 2001 की जनगणना के अनुसार देश में 12.04 मिलियन शहरी खुले में शौच करते थे। 5.48 मिलियन शहरी घरों में सामुदायिक शौचालय का प्रयोग करते थे और 13.4 मिलियन घरों के निवासी शेयरेड शौचालय प्रयोग करते थे। भारत की 125 करोड़ जनसंख्या से लगभग 5 लाख टन मानव मल प्रतिदिन पैदा होता है। अधिकांशत: मानव-मल को बिना उपचार के गडढों, तलाबों, नदियों आदि में डाल दिया जाता है।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्रो में आबादी का बड़ा हिस्सा शौचालय के अभाव में खुले में शौच करता है। शौचालय, सीवरेज व्यवस्था और साफ-सफार्इ के अभाव में गंभीर और संक्रामक रोगों का फैलना देश में आम बात है, और इसका सबसे बड़ा शिकार कम उम्र के बच्चे होते हैं। भारत के अधिकांश कस्बों एवं नगरों में स्वच्छता की समुचित सुविधाएं न होने के कारण लोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक परिस्थितियों में निवास करते हैं। जिसके फलस्वरूप झोपड़पटिटयों आदि में अक्सर महामारी फैलती है। आंकड़ों के हिसाब से हर साल दुनिया भर में तकरीबन 2 मिलियन बच्चे डायरिया, 6 लाख सेनीटेशन से जुड़े तमाम रोगों और बीमारियों के कारण एवं 5.5 मिलियन बच्चे हैजा के कारण मरते हैं। इन बच्चों में एक बड़ा आंकड़ा भारतीय बच्चों का होता है। युनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन पांच साल से कम आयु के एक हजार बच्चे डायरिया, हैपाटाइटिस और सैनिटेशन से जुड़ी दूसरी कर्इ बीमारियों की वजह से काल के मुंह में समा जाते हैं। देश के स्वास्थ्य को खराब करने और नागरिकों को गंभीर बीमारियां देने के अलावा सेनिटेशन की सुविधाओं के अभाव में वातावरण में प्रदूषकों की मात्रा भी बढ़ रही है, वही पर्यावरण और पारिस्थितिक का क्षरण और हास हो रहा है।

 

आंकड़ों से इतर अगर देखा जाए तो देश के मैट्रो सिटिज से लेकर गावं-कस्बे में सुबह-शाम खुले में शौच करते सैंकड़ों लोग देखे जा सकते हैं। शौचालय के अभाव में सबसे अधिक परेशानी का सामना महिलाओं, वृद्वों और बच्चों को करना पड़ता है। देश में बलात्कार के मामलों में शिकार महिलाओं का अगर कारण खोजा जाए तो गांवों और कस्बों में अक्सर ऐसी घटनाएं शौच के लिए आते-जाते ही घटित होती हैं। लेकिन जिम्मेदार सरकारी अमला और व्यकित अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आते हैं। जब देश का मंत्री यह कह रहा हो कि 60 फीसद आबादी खुले में शौच करने जाती है तो इसका मतलब है कि असल में यह आंकड़ा 70 से 75 फीसद से कम नहीं होगा। यह विडंबना है कि देश में 11 पंचवर्षीय योजनाओं और तमाम दूसरी योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के बावजूद देश की तीन चौथार्इ आबादी शौचालय जैसी मामूली और जरूरी सुविधा से वंचित है। 12 वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने 2017 तक खुले में शौच से मुक्त करने का संकल्प लिया है, लेकिन पूर्व के अनुभवों के आधार पर ऐसा संभव होता दिखार्इ नहीं देता है। लाल फीताशाही और सरकारी अमले का भ्रष्टाचार में लिप्त होना सीधे तौर पर विकास को प्रभावित करता है। बड़े शहरों और महानगरों में जनता थोड़ी जागरूक और पढ़ी-लिखी है यह समझकर विदेशों और तमाम दूसरी संस्थाओं से चंदा बटोरने की नीयत से कुछ काम किया जाता है। गांवों-कस्बों और दूर-दराज के इलाकों में तो फाइलों का पेट भरने की कार्रवार्इ होती है। जयराम रमेश ने बुनियादी मुददे और आमजन से जुड़ी बड़ी और गंभीर समस्या को जाने-अनजाने हवा दी है और स्वयं अपनी कमियों और सरकारी योजनाओं में चल रही गड़बडि़यां, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की ओर इशारा भी किया है। जिस तेजी से देश की आबादी बढ़ रही है, उसी अनुपात में शहरीकरण और स्लम भी बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में सरकार को तमाम दूसरी योजनाओं के साथ देश के प्रत्येक नागरिक के लिए शौचालय की सुविधा उपलब्ध करवाने के काम को प्राथमिकता के आधार पर जरूरी काम करना चाहिए। क्योंकि अगर दो दशकों में 70 करोड़ मोबाइल फोन धारक बन सकते हैं तो सरकार नागरिकों को बेहद मामूली और आवश्यक बुनियादी सुविधा उपलब्ध करवा पाने में सफल क्यों नहीं हो पायी, ये सोचने को मजबूर करता है। दुनिया के नक्षे पर बड़ी तेजी से उभरते भारत और नागरिकों के यह बेहद शर्म की बात है कि 60 फीसदी आबादी आजादी के 64 सालों बाद भी खुले में शौच करने जाती है।

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1 Comment on "64 सालों में 60 फीसद के लिए शौचालय नहीं"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest

सारे कम सरकार पर नहीं छोड़े जा सकते जब तक लोगो की सोच साफ सफाई की नहीं होगी तब तक बदलाव नहीं आ सकता.

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