लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

पंजाब के जिस उग्रवाद को तब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर नेस्तनाबूद किया था, प्रकाश सिंह बादल ने उसी उग्रवाद की जड़ में खाद पानी डालने का काम कर दिया है। ऐसा उन्होंने बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना की फांसी पर रोग लगवाकर किया है। हालांकि राष्ट्रपति की आदालत में दया याचिका का निवेदन सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था गुरूद्वारा प्रबंध समिति ने किया हुआ है। लेकिन इसकी जबरदस्त पैरवी शिरोमणि अकाली दल और मुख्यमंत्री बादल ने की। यही नहीं कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों ने भी फांसी रोकने का दबाव बनाया। यह एक ऐसा विरला उदाहरण हैं जहां मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की दिनदहाड़े हत्या के आरोप में दोषी ठहराए गए आतंकवादी को राजनीतिक समर्थन मिला है। हालांकि माफी का अभियान चलाने वाली पंजाब सरकार को सर्वोच्च न्यायलय ने बेजा दखल के लिए फटकार लगार्इ है, क्योंकि किसी भी सरकार का काम अदालत के आदेश का अमल करना हैं न कि उसको टालना। दया याचिकाओं के सिलसिले में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल की भूमिका भी समझ से परे है। महामहिम 23 मामलों में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल चुकी हैं। एक स्त्री होते हुए भी विधवाओं के आंसुओं से उनका न जाने क्यों हृदय नहीं पसीज रहा।

दुर्दांत आतंकवादियों को राजनीतिक समर्थन मिलना देश का दुखद पहलू है। राज्य सरकारें संघीय स्वायत्तता का अनुचित लाभ उठाने लग गर्इ हैं। किसी भी राज्य सरकार का काम कानूनी प्रक्रिया के आदेश में दर्ज इबारत के मुताबिक आगे बढ़ाना होता है, न कि अडंगे लगाना। हैरानी होती है कि राजोआना की फांसी के हुक्म को पटियाला जेल के नौकरशाह अधीक्षक लखविदंर सिंह जाखड़ ने ही ठेंगा दिखा दिया। उन्होंने कुछ कानूनी नुक्ता उठाकर हुक्म पर तामील करने से मना कर दिया था। जब अदालत इस परिप्रेक्ष्य में जेलर पर अदालत की अवमानना की कार्रवार्इ करने लगी तो चतुर जेलर ने अवमानना की पेशकश को सुप्रीम कोर्ट दारा 30 साल पहले दी गर्इ एक दलील के जरिए काट दिया।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, कि जेलर को फांसी की सजा पाए अभियुक्त को वास्तविक सजा देने से पहले, निजी स्तर पर यह जानकारी तलब कर लेनी चाहिए कि आरोपी किसी मामले में सह अभियुक्त है तो उनमें से अन्य की सिथति के बारे में सर्वोच्च आधिकारियों और संबंधित अदालत को जानकारी दें। इस मामले में राजोआना के साथ जगतार सिंह हवारा एवं एक अन्य लखविंदर सिंह नाम का व्यकित भी सह अभियुक्त है। हवारा को फांसी की सजा हुर्इ थी। किंतु इसे उच्च न्यायालय ने उम्रकैद में बदल दी। सीबीआर्इ ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की हुर्इ है। इसी तरह लखविंदर सिंह को उच्च न्यायालय ने उम्रकैद की सजा सुनार्इ थी। इसकी भी अपील विचाराधीन है। इस बाबत जेलर का दावा हैं कि जब दो की अपील ऊपरी अदालत में लंबित है तो तीसरे अभियुक्त को फांसी पर कैसे लटकाया जा सकता है ? यदि राजोआना को अदालत ने गवाह के तौर पर पेश करने की मांग की तो उसे फांसी पर लटकाने के बाद कैसे पेश किया जा सकता है ? हालांकि जेलर की इस दलील के पीछे भी राजनीतिक शह रही होगी। क्योंकि इसके पहले इस दलील को कभी फांसी टालने का आधार बनाया गया हो, ऐसा देखने सुनने में नहीं आया। लेकिन इस दलील का आखिरकार मूल लक्ष्य फांसी पर अमल को मुशिकल बनाना ही था।

इस मामले में आश्चर्य में डालने वाली बात यह भी है कि अगस्त 1995 में बेअंत सिंह की जो हत्या हुर्इ थी उसमें बलवंत सिंह राजोआना ने खुद अपने जुर्म को कबूल कर लिया है। सजा के बाद उसने ऊपरी अदालत में अपील भी दायर नहीं की। इसके बावजूद सिख असिमता के प्रभुत्व के चलते इस माफी की मुहिम को पंजाब में इतना तूल दिया गया कि पूरे पंजाब में आतंकी के समर्थन में हिंसा का तांड़व हुआ। एक पुलिस दीवान का हाथ काट दिया गया और एक व्यकित की मौत हो गर्इ। सिख और गैर सिखों के बीच सांप्रदायिक वैमनस्यता को हवा दी गर्इ। पंजाब में जिस तरह का यह जो नया कटुता का परिवेश सामने आया है, यह कहीं आतंकवाद के बोतल में बंद जिन्न को बाहर निकलने का अवसर न दे दे।

देश और पंजाब में फांसी को फंदे से दूर ले जाने का यह इकलौता मामला नहीं है। पंजाब के ही प्रखर राष्ट्रवादी मनजिंदर सिंह बिटटा के हमलावर देवेंद्र्रपाल सिंह भुल्लर को 11 साल पहले फांसी हुर्इ थी, लेकिन उसके गले में फंदा अब तक नहीं पड़ा ? जबकि भुल्लर की दया याचिका भी खारिज हो चुकी हैं। तमिलनाडू की विधानसभा राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी की सजा न देने का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। संसद पर हमले के षडयंत्रकारी अफजल गुरू की फांसी का मामला भी बीते 10 साल से लटका है। उसकी पत्नी की ओर से प्रत्तुत दया याचिका राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है। अफजल को फांसी टालने की पैरवी जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कर रहे हैं। वे तो यहां तक धमकी दे रहे हैं कि अफजल को फांसी दी तो कश्मीर जल उठेगा ।

इधर देश की राष्ट्रपति ने तो दया याचिकाओं पर अंतिम निर्णय लेते हुए मौत की सजा पाए 23 लोगों की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया। ऐसे मामलों में दयालुओं की ममता हत्यारों पर तो उमड़ती दिखार्इ देती है, लेकिन वह मारे गए लोगों की विधवाओं और अनाथ बच्चों को सर्वथा नजरअंदाज कर देती हैं। कमोवेश यही कार्यप्रणाली मानवाधिकार आयोग की रहती हैं। यहां सवाल उठता है कि जब देशद्र्रोहियों की सजांए माफ करना है तो इस नजरिए से नीतिगत हस्तक्षेप करके क्यों नहीं धारा 302 का दंड प्रकिया सांहिता से विलोपीकरण कर दिया जाता? यूरोपीय संघ के 94 देशों ने मृत्युदंड को खत्म कर दिया है। यहां राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों की कार्यपद्धति में विरोधाभास देखने में आता है, जब कोर्इ बड़ी आतंकवादी घटना देश में घटती है तो राजनेता दावा करते हैं कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलार्इ जाएगाी और जब तमाम अन्वेषण के बाद पुलिस अथवा सीबीआर्इ अभियुक्त को अदालत से फांसी जैसी कठोर सजा दिलाने में कामयाब हो जाते हैं तो यही राजनेता देशद्रोहियों को बचाने के लिए मुहिम चला देते हैं ? इन दो मुहीं बातों से आतंकवाद को तो हवा मिलेगी ही शहीद के परिजानों को भी सुकून नहीं मिलेगा। इसलिए अच्छा हैं राज्य सरकारें कानूनी प्रकिया में बाधा बनने की बजाए उसके पालन में अपनी दृढ़ इच्छा शकित जताएं।

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1 Comment on "फंदे से दूर होती फांसी / प्रमोद भार्गव"

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mahendra gupta
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सब एक ही थेली के चट्टे बट्टे है .कांग्रेस ने भी वोटों के लिए विरोध किया ,जिसकी हत्या हुई , उसके परिवार से अलग से बुलाकर पूछिए वोह क्या जवाब देंगे? आज धरम के नाम पर उनसे भी यह कहलवाया जा रहा है कि उन्हें ऐतराज नहीं है, पर सच्चाई किसी से छिपी नहीं . जिस दिन सब एक ही थेली के चट्टे बट्टे है .कांग्रेस ने भी वोटों के लिए विरोध किया ,जिसकी हत्या हुई , उसके परिवार से अलग से बुलाकर पूछिए वोह क्या जवाब देंगे? आज धरम के नाम पर उनसे भी यह कहलवाया जा रहा है… Read more »
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