लेखक परिचय

तेजवानी गिरधर

तेजवानी गिरधर

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। हाल ही अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

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तेजवानी गिरधर

बहुदलीय प्रणाली और छोटे व क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय राजनीति में दखल के चलते एक ओर जहां देश में कमजोर गठबंधन सरकारों का दौर चल रहा है, वहीं पार्टी विथ द डिफ्रेंस का विशेषण खोती भाजपा भी कमजोर विपक्ष साबित होती जा रही है। भले ही उसने कई मुद्दों पर कांग्रेस नीत सरकार को घेरने की कोशिश की हो और कुछ कामयाब भी रही हो, मगर यह उसकी कमजोरी का ही प्रमाण है कि काला धन, भ्रष्टाचार और लोकपाल बिल जैसे मुद्दों पर उसकी पकड़ नहीं होने के कारण ही बाबा रामदेव व अन्ना हजारे यकायक उभर कर आ गए हैं।

असल में परिवारवाद और भ्रष्टाचार की मिसाल बनी कांग्रेस की तुलना में भाजपा की अहमियत थी ही इस कारण कि उसमें आम लोगों को चरित्र व शुचिता नजर आती थी। संसद में भले ही वह संख्या बल में कमजोर रही, मगर उसके प्रति एक अलग ही सम्मान हुआ करता था। उसकी यह विशिष्ट पहचान तभी तक रही, जब तक कि वह लगातार विपक्ष में ही रही। जैसे ही उसने सत्ता का मजा चखा, उसी प्रकार के दुर्गुण उसमें भी आते गए, जैसे कि कांग्रेस में कूट-कूट कर भरे हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में जिस प्रकार भाजपा ने अपने असली ऐजेंडे को साइड में रख कर ममता, जयललिता व माया से समझौते दर समझौते कर सरकार चलाई, उसकी अपनी मौलिक पहचान खोती चली गई। आज भले ही मनमोहन सिंह की सरकार गठबंधन की मजबूरी के लिए रेखांकित हो कर जानी जाने लगी है, मगर वाजपेयी भी कम मजबूर नहीं थे। अगर यह कहा जाए कि भाजपा सत्ता के साथ जुड़ी जरूरी बुराइयों का पता ही तब लगा, धरातल की राजनीति के आटे-दाल का भाव ही तब पता चला, जबकि उसने सत्ता को पाया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिंदुत्व, स्वदेश व देश प्रेम की ऊंची व आदर्शपूर्ण बातें उसने विपक्ष में रहते तो बड़े जोर शोर से की और वह लोगों को अच्छी भी लगती थी, मगर जैसे ही भारतीय विमान यात्रियों को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए आतंवादियों को सौंपने जैसी हालत से गुजरना पड़ा, सबको पता लग गया कि उसे भी सत्ता में आने के बाद पूरा विश्व और उसकी व्यवस्था समझ में आ गई है। कदाचित इसी कारण उसे कट्टर हिंदूवाद से हट कर राजनीति करनी पड़ी और वही उसके लिए घातक हो गई। इंडिया शाइनिंग के नारे और मजबूत बनाम सशक्त प्रधानमंत्री के नारे के बाद भी जब सत्ता नहीं मिली तो उसके थिंक टैंकों को यह सोचने को मजबूर होना पड़ गया कि कहीं न कहीं मौलिक भूल हो रही है। एक ओर तो सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढऩे की मजबूरी तो दूसरी ओर मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कान मरोडऩे के बीच उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह आखिर कौन सा रास्ता अख्तियार करे। हालांकि अब भी वह संघ से ही संचालित होती है, मगर उसके भीतर दो वर्ग पैदा हो गए हैं। एक वे जो कट्टर हिंदूवादी हैं तो दूसरे वे जो नरमपंथी हैं। इन्हीं के बीच संघर्ष मचा हुआ है। यह ठीक वैसी स्थिति है, जैसी जनता पार्टी के दौर में थी, जब एक मौलिक वर्ग को अलग हो कर भारतीय जनता पार्टी बनानी पड़ी थी। आज दिल्ली से ले कर ठेठ नीचे तक असली और दूसरे दर्जे के नेता व कार्यकर्ता का संघर्ष चल रहा है।

इतना ही नहीं, एक और समस्या भी उसके लिए सिरदर्द बन गई है। कांग्रेस के परिवारवाद की आलोचना कर अपने अपने भीतर आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई देने वाली भाजपा में राज्य स्तर पर व्यक्तिवाद उभर आया है। उसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है कर्नाटक, जहां पार्टी को खड़ा करने वाले निवर्तमान मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का कद पार्टी से भी बड़ा हो गया है। वो तो लोकायुक्त की रिपोर्ट का भारी दबाव था, वरना पार्टी के आदेश को तो वे साफ नकार ही चुके थे। हालांकि पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई संसदीय बोर्ड के एकमत से इस्तीफा देने के फैसले को मानने के लिए मजबूर हुए, मगर एक बार फिर सिर उठाने लगे हैं।

इसी प्रकार राजस्थान का मामला भी सर्वाधिक चर्चित रहा, जिसकी वजह से पार्टी की प्रदेश इकाई खूंटी पर लटकी नजर आई। यहां पार्टी आलाकमान के फैसले के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। बड़ी मुश्किल से उन्होंने पद छोड़ा, वह भी राष्ट्रीय महासचिव बनाने पर। उनके प्रभाव का आलम ये था कि तकरीबन एक साल तक नेता प्रतिपक्ष का पद खाली ही पड़ा रहा। आखिरकार पार्टी को झुकना पड़ा और फिर से उन्हें फिर से इस पद से नवाजा गया। ऐसे में भाजपा के इस मूलमंत्र कि ‘व्यक्ति नहीं, संगठन बड़ा होता है, की धज्जियां उड़ गईं।

गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे कई राज्य हैं, जहां के क्षत्रपों ने न सिर्फ पार्टी आलाकमान की आंख से आंख मिलाई, अपितु अपनी शर्तें भी मनवाईं। अफसोसनाक बात है कि उसके बाद भी पार्टी सर्वाधिक अनुशासित कहलाना चाहती है। आपको याद होगा कि दिल्ली में मदन लाल खुराना की जगह मुख्यमंत्री बने साहिब सिंह वर्मा ने हवाला मामले से खुराना के बरी होने के बाद उनके लिए मुख्यमंत्री पद की कुर्सी को छोडऩे से साफ इंकार कर दिया था। उत्तर प्रदेश में तो बगावत तक हुई। कल्याण सिंह से जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा लिया गया तो वे पार्टी से अलग हो गए और नई पार्टी बना कर भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाया। मध्यप्रदेश में उमा भारती का मामला भी छिपा हुआ नहीं है। वे राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को खुद पर कार्रवाई की चुनौती देकर बैठक से बाहर निकल गई थीं। शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर उन्होंने अलग पार्टी ही गठित कर ली। एक लंबे अरसे बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर थूक कर चाटने का मुहावना चरितार्थ किया गया।

इसी प्रकार गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कद आज इतना बड़ा हो चुका है कि पार्टी पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगने के बाद भी हाईकमान में इतनी ताकत नहीं कि उन्हें कुछ कह सके। इसी प्रकार झारखण्ड में शिबू सोरेन की पार्टी से गठबंधन इच्छा नहीं होने के बावजदू अर्जुन मुण्डा की जिद के आगे भाजपा झुकी। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में वरिष्ठ नेता चमन लाल गुप्ता का विधान परिषद चुनाव में कथित रूप से क्रास वोटिंग करना और महाराष्ट्र के वरिष्ठ भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे का दूसरी पार्टी में जाने की अफवाहें फैलाना भी पार्टी के लिए गंभीर विषय रहे हैं।

स्पष्ट है कि सिद्धांतों की दुहाई दे कर च्पार्टी विथ दि डिफ्रेंसज् का तमगा लगाए हुए भाजपा समझौता दर समझौता करने को मजबूर है। पार्टी की विचारधारा को धत्ता बताने वाले जसवंत सिंह व राम जेठमलानी को छिटक कर फिर से गले लगाना इसका साक्षात उदाहरण है।

पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर हालांकि संघ का पूरा वरदहस्त है, मगर वे भी बड़बोलेपन की वजह से पद की गरिमा कायम नहीं रख पाए हैं। गडकरी ने अपने बेटे की शादी को जिस शाही अंदाज से अंजाम दिया है, उससे यह साबित हो गया है कि पार्टी अब तथाकथित दकियानूसी आदर्शवाद के मार्ग का परित्याग कर चुकी है। गडकरी ने ही क्यों इससे पहले भाजपा नेता बलबीर पुंज व राजीव प्रताप रूड़ी भी इसी प्रकार के आलीशान भोज आयोजित कर पार्टी कल्चर के हो रहे रिनोवेशन का प्रदर्शन कर चुके हैं। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ठाठ कीकानाफूसी भी कम नहीं होती है।

कुल मिला कर ये सब कारण हैं, जिसकी वजह से भाजपा कमजोर हुई है और उसी कारण सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही। भाजपा शासित राज्यों में हुए भ्रष्टाचार का परिणाम ये है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह कांग्रेस को घेरने में जब कामयाब नहीं हुई तो बाबा रामदेव व अन्ना के हाथ में ये मुद्दे आ गए। विपक्ष की सच्ची भूमिका नहीं निभा पाने का यह सबसे बड़ा उदाहरण है।

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1 Comment on "…इसलिए नहीं निभा पा रही भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी तो साम्प्रदायिक सोच थी ही अब यह भी साफ़ हो गया है की उसमे कांग्रेस की साड़ी बुराइयां भी मोजूद हैं.

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