लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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-प्रवीण दुबे-   upa
क्या दस वर्षों के पाप कुछ थोड़े से पुण्य या यूं कहें कि थोड़ा सा लालच देकर धोए जा सकते हैं? मनमोहन सरकार का अंतिम बजट देखने के साथ ही यह सवाल रह-रहकर दिमाग में कौंध रहा है। इसके साथ ही यह बात भी मस्तिष्क में कौंध रही है कि वास्तव में क्या बजट का सीधा प्रभाव जनमानस पर पड़ता है, अथवा यह एक औपचारिकता मात्र है। सर्वविदित है कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में देश की जनता कमरतोड़ महंगाई के अलावा गलत आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम झेलती रही है। इतना ही नहीं मनमोहन सिंह ने महंगाई कम करने के बजाए यहां तक उलाहना मारा कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते। भरपेट खाना पांच रुपए में मिलने और बढ़ती महंगाई के लिए देशवासियों द्वारा सब्जी, दाल ज्यादा खाने की बात कहकर उनका मजाक उड़ाया गया। जनता चीख-चीख कर महंगाई कम करने की बात कहती रही और मनमोहन से लेकर चिंदंबरम् तक कानों में रुर्ई डाले रहे। यह सब लगातार दस वर्षों से चलता रहा। दूसरी पारी की शुरुआत को याद करें तो मनमोहन सिंह ने पहले एक माह फिर सौ दिन में महंगाई कम करने के झूठे आश्वासन दिए लेकिन इस पर कभी ईमानदारी से अमल नहीं किया। आखिर अब जबकि चुनाव में दो माह का समय शेष है। देश में व्यवस्था परिवर्तन के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। सारे चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में मनमोहन सरकार जाती दिखाई दे रही है। मनमोहन सिंह को जनता की याद आई है। क्या इस देश की जनता को बेवकूफ समझा है? क्या उसे चंद टुकड़े डालकर फुसलाया जा सकता है? किसी ने ठीक ही कहा है-
‘ये पब्लिक है सब जानती है,
भीतर क्या है बाहर क्या है
यह सब कुछ पहचानती है
ये पब्लिक है…
चिदंबरम् के बजट में सबसे ज्यादा वाहवाही लूटने की कोशिश ”पूर्व सैनिकों की एक रैंक एक पैंशन’ योजना को मंजूरी, शिक्षा ऋण पर ब्याज माफी तथा 10 साल में 10 करोड़ नौकरियां देने की घोषणाओं को लेकर की जा रही है। बारी-बारी से इन घोषणाओं की असलियत जानने की कोशिश करें तो साफ हो जाता है अपनी संभावित हार से मनमोहन सरकार के होश उड़े हुए हैं। जिस एक रैंक एक पेंशन की बात बजट में की गई है वह 42 वर्ष पुरानी है। हाल ही में सबसे पहले रेवाड़ी की रैली में नरेन्द्र मोदी ने यह मुद्दा सैनिकों के समर्थन में उठाया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि लगातार सत्ता में रहने वाली मनमोहन सरकार को इतने वर्षों में इस घोषणा की याद क्यों नहीं आई। मुद्दा हाथ से निकलते देख वह घबरा गई और घोषणा कर दी। साफ है सरकार को अब 30 लाख से ज्यादा सैनिकों, पूर्व सैनिकों के वोट खिसकते नजर आ रहे हैं इस कारण उन पर डोरे डालने की कोशिश चिदंबरम ने की है। जहां तक शिक्षा ऋण में ब्याज माफी और 10 वर्षों में 10 करोड़ नौकरियों की बात है। ऋण पर ब्याज माफी का फायदा केवल उन्हें ही प्राप्त होगा जिन्होंने 31 मार्च 2009 से पहले शिक्षा ऋण लिया है। वैसे भी भीतर की बात तो यह है कि ये पैसा सरकार डूब चुका मान रही है। यानी चुनाव के समय घोषणा करके वाहवाही लूटने की कोशिश की गई है। रही बात 10 करोड़ नौकरियां देने की तो चुनाव के समय सरकार को इसकी याद क्यों आई ? वैसे भी लाख टके की बात तो यह है चार महीने के लेखानुदान में यह घोषणा सरकार पूरी कैसे करेगी। साफ है यह एक छलावा जैसा है। साफ है मनमोहन सरकार की नजर युवाओं के 33 प्रतिशत वोटों पर है। यही कारण है शिक्षा ऋण, नौकरियां या फिर मोबाइल, बाइक आदि सस्ता करने की बात इन्हीं वोटों को ध्यान में रखकर की गई है। इससे युवा वोट पंजे का बटन दबाएगा ऐसा मानना दिवास्वप्न जैसा ही है। अब उस बात पर भी चर्चा जरूरी है जिसे हमने शुरू में उठाया था। भारत में बजट में किए गए प्रावधानों का वास्तव में कोई महत्व है? आर्थिक विशेषज्ञों की मानी जाए तो जब देश के तमाम बड़े विभागों की कमान स्वतंत्र एजेंसियों के हाथ सौंपी जा चुकी है तो ऐसे में बजट प्रावधान महज दिखावा बनकर रह गए हैं। अंतिम निर्णय तो रेगूलेटरी बॉडी को ही करना होता है। इसके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। अत: वर्ष में कई-कई बार जनता को महंगाई की मार झेलना पड़ती है। उधर अंतरिम बजट का तो वैसे भी ज्यादा कोई महत्व नहीं होता। ऐसी स्थिति में मनमोहन सरकार के दस वर्ष के पाप बजट से धुल जाएंगे ऐसा कतई संभव नहीं।

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