लेखक परिचय

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। संपर्क: द्वारा जयप्रकाश, दूसरा तल, एफ-23 ए, निकट शिवमंदिर कटवारिया सराय, नई दिल्ली – 110016

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kamlaलालकृष्ण आडवाणी की आधी जिंदगी कमला आडवाणी नहीं रहीं..पत्रकार की भूमिका में रहते हुए कमला जी को कई बार देखने का मौका मिला..उनकी कई छवियां स्मृतियों में दर्ज हैं..लेकिन उनके निधन की खबर सुनते ही 19 दिसंबर 2013 को दिल्ली के फिक्की भवन के कैंपस में बैठी कमला जी की छवि बार-बार सामने आ रही है।

मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ भारतीय जनमानस के मन बना लेने का आभास लगातार हो रहा था..लेकिन तब तक यह उहापोह खत्म नहीं हो पाया था कि सोनिया गांधी की अगुआई वाले सत्ताधारी यूपीए को चुनौती देने वाले की भूमिका में कौन होंगे..गुरु लालकृष्ण आडवाणी या उनके शिष्य नरेंद्र मोदी।

भारतीय जनता पार्टी में इसे लेकर खींचतान जारी थी। कुछ ही दिन पहले दिल्ली के सिविक सेंटर में पांचजन्य और ऑर्गनाइजर के बदले रूप का लोकार्पण करते वक्त संघ प्रमुख मोहन राव भागवत ने परिवर्तन को अपरिवर्तनीय बताते हुए आडवाणी को साफ संकेत दे दिया था कि मनमोहन के खिलाफ नरेंद्र मोदी ही बीजेपी की अगुआई करेंगे। हालांकि तब तक आडवाणी नेतृत्व छोड़ने की बात को मन से स्वीकार नहीं कर पाए थे।

इस माहौल की पृष्ठभूमि में 19 दिसंबर 2013 की गुलाबी ठंड की रात में उनकी ही चार पुस्तकों का लोकार्पण मोहन राव भागवत कर रहे थे। इस मौके पर सुषमा स्वराज ने आडवाणी की तारीफ में जबर्दस्त भाषण दिया था। सुषमा का यह भाषण आडवाणी के दिल में स्थित दर्द के आंखों के रास्ते बह जाने का जरिया बन गया था..फिक्की सभागार के मंच पर आडवाणी रो रहे थे, लेकिन कमला आडवाणी बाहर बड़े स्क्रीन पर आडवाणी को रोते हुए देख रही थीं और साथ ही मेहमानवाजी में मसरूफ थीं। उनके होठों पर मंद मुस्कान तो थी, लेकिन कहीं से नहीं लग रहा था कि वे तनाव में हैं या परेशान हैं..उनका साथ दे रहे थे उनके बेटे जयंत आडवाणी..मेहमानों के नाश्ते के लिए तैयार मिठाइयों और पकौड़ों को वे बार-बार ला रहे थे।

कमला-लालकृष्ण की बेटी प्रतिभा को देश ने आडवाणी के साथ मंचों-यात्राओं में बार-बार देखा है। लेकिन जयंत को लोगों ने कम ही देखा है। भारतीय जनता पार्टी को फर्श से अर्श पर पहुंचाने वाले आडवाणी देश के उपप्रधानमंत्री रहे, गृहमंत्री रहे, लेकिन उनके बेटे से भारतीय समाज वैसे परिचित नहीं हो पाया..जैसा आज के नेता पुत्रों की रवायत बन गई है। पता नहीं तब क्यों ऐसा लगा था कि जयंत जहां मातृभक्त हैं, वहीं प्रतिभा पिता की दुलारी हैं।

कमला आडवाणी के निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सही ही कहा है कि वे मोटिवेशनल यानी प्रेरक महिला थीं। जिस रामरथ यात्रा के जरिए ना सिर्फ आडवाणी, बल्कि भारतीय जनता पार्टी देश की जनता की अहम पसंद बन गई, उस यात्रा की परिकल्पना बेशक प्रमोद महाजन ने की थी। लेकिन उसका सारथी बनने के लिए आडवाणी को तैयार करने में कमला आडवाणी की अहम भूमिका थी।

आडवाणी ने खुद एक जगह लिखा है कि रथयात्रा की राजनीतिक कामयाबी को लेकर उन्हें संदेह था। लेकिन कमला ने उन्हें रथयात्री बनने के लिए तैयार किया। भारतीय राजनीति में विरले ही लोग होंगे, जिन्हें कोई ना कोई व्यसन ना हो। लेकिन आडवाणी गिने-चुने लोगों में से हैं, जो अनुशासित जीवन जीते रहे हैं। इसमें उनके परिवार का भी योगदान रहा है।

यह दुनिया ने देखा है कि कमला आडवाणी उनके हर कदम पर साथ नजर आती रही हैं। आडवाणी की राजनीतिक यात्राओं और कार्यक्रमों में कमला हमेशा चट्टान की तरह खड़ी रहीं। हर कामयाब पुरुष के पीछे मजबूत स्त्री के होने की जो मान्यता रही है, कमला उस मान्यता पर भी खरी उतरी हैं।

कमला जी से आडवाणी जी की शादी फरवरी 1965 में हुई थी। आडवाणी के घर होली-दीवाली पर होने वाले आयोजनों में कमला जी भी उत्साह से भाग लेती थीं। भाजपा में प्रमोद महाजन, वेंकैया नायडू, अनंत कुमार, सुषमा स्वराज और खुद नरेंद्र मोदी का सांगठनिक व्यक्तित्व विकसित करने में लालकृष्ण आडवाणी का अहम योगदान रहा है। उनकी ही छत्रछाया में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के ये सितारे चमके हैं। जाहिर है कि ये सभी कमला आडवाणी में मां का अक्स देखते रहे हैं। कहीं न कहीं इन राजनेताओं के उभार के पीछे उनकी प्रतिभा और आडवाणी के मार्गदर्शन के अलावा कमला जी का लाड़-दुलार भी रहा है।

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी बेहद मशहूर रही है। इन दोनों नेताओं के आपसी भरोसे और विश्वास ने ही भारतीय जनता पार्टी को मजबूत आधार बनाने में मदद दी। अटल जी भी कमला आडवाणी को सहज स्नेह देते रहे हैं। याद आता है 2002 का साल। तब अटल और आडवाणी में मतभेद की खबरें भारतीय मीडिया को मथ रही थीं। हर पत्रकार इसी ताक में लगा रहता था कि कब दोनों के मतभेद को लेकर कोई स्कूप हाथ लग जाए।

शायद वह मई या जून का महीना था। अचानक एक चिलचिलाती दोपहर प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया प्रभारी का पत्रकारों के पास फोन आया, जल्द से जल्द पृथ्वीराज रोड स्थित आडवाणी के घर पहुंचो। पता चला, तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उस दोपहर कमला आडवाणी को फोन पर उलाहना दिया था, कमला जी आजकल खिलाती-पिलाती नहीं हैं। कमला जी ने तुरंत प्रधानमंत्री को लंच के लिए आमंत्रित कर दिया था। इसके बाद उन्हें तब के उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को फोन करके जल्द घर बुला लिया। यह बताते हुए कि प्रधानमंत्री उनके यहां खाना खाने आ रहे हैं।

अटल जी ने उस दिन जो खाना खाया, उसके बाद अटल-आडवाणी के बीच मतभेद की खबरें तलाश रहे पत्रकारों को खासी निराशा हुई। अटल और कमला आडवाणी के स्नेहिल रिश्ते ने एक झटके में शीर्ष पर मतभेद की अटकलों को खारिज कर दिया था..माना तो यह जाता है कि दोनों शीर्ष नेताओं में मतभेद तो थे। लेकिन वाजपेयी ने उसे बढ़ाने की बजाय उसे खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया और जरिया बनी थीं कमला आडवाणी। अब वही कमला नहीं रहीं। निश्चित तौर पर अब आडवाणी अकेले रह गए हैं।

नियति और हालात से आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर विराम लग चुका है। लेकिन जानकारों का एक धड़ा मानता है कि आडवाणी देश के अगले राष्ट्रपति होंगे। कमला आडवाणी अपने पति को प्रधानमंत्री बनते नहीं देख पाईं..क्या पता उनके मन में भी आडवाणी जी को राष्ट्रपति बनते देखने की चाहत थी या नहीं..लेकिन यह सच है कि अगर आडवाणी राष्ट्रपति बने तो उन्हें सबसे ज्यादा कमला की ही याद आएगी।

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