लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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प्रतिमा शुक्ला

dentistsबेरोजगारी अब स्वास्थ्य विभाग में भी आ गई है। जी हां, देश के 309 डेंटिस्ट कॉलेज से प्रतिवर्ष 26000 दांत के डॉक्टर निकलते है। अब तादात इतनी बढ़ चुकी है कि उनके पास कोई काम ही नहीं है। इसलिए भारत में सभी नए डेंटल कॉलेजों को रोकने का फैसला किया है। डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया की आम सभा की बैठक में इस बात का निर्णय लिया गया। क्योंकि डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया ही नए संस्थानों के लिए अनुमति देता है। वर्तमान भारत में 309 डेंटल कॉलेजों, जो हर साल करीब 26,000 दंत चिकित्सकों निकालते है। 2010 में सबसे अधिक 30,570 डेंटिस्ट निकले जबकि 1970 में केवल 8,000 ही दंत चिकित्सा छात्रों ने स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कुछ अनुमानों के मुताबिक भारत में 3 लाख दंत चिकित्सकों है लेकिन उनके प्रसार में असंतुलन है। 2004 में, भारत के शहरी क्षेत्रों में 10,000 लोगों में प्रति एक दंत चिकित्सक थे और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 2.5 लाख लोगों में एक दंत चिकित्सक हुआ करते थे। अब यह अनुमान है कि भारत में 2020 में अधिक से अधिक 1 लाख दंत चिकित्सकों हो जाऐंगे। “भारत में पिछले कुछ वर्षों में डेंटल कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई है जिससे भारत में डेंटिस्ट ज्यादातर बेरोजगारी हो गए है। जिससे दंत चिकित्सकों के लिए नौकरियों की संभावना बहुत कम हो गए है। एक तरफ देश में मेडिकल शिक्षा के कारोबार को नियंत्रित करने के लिए एनईईटी जैसी एकल प्रवेश परीक्षा आयोजित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता सवालों के घेरे में है। मेडिकल कॉलेजों के नवीनीकरण के लिए जब ‘मेडिकल कॉलेज ऑफ इंडिया’ (एमसीआई) की बैठक में जांच रिपोर्ट रखी गई, तो विशेषज्ञ हैरान रह गए। रिपोर्ट में 50 में से 32 कॉलेज ऐसे पाए गए, जो दाखिले लायक ही नहीं हैं।
एमसीआई की रिपोर्ट में 32 कॉलेजों को नए दाखिले नहीं देने की सिफारिश की गई है। जबकि कई अन्य कॉलेजों से भी तथ्य मांगे गए हैं। कहीं शिक्षक, डॉक्टर नहीं हैं, तो कहीं अस्पताल में उपचार की सुविधा न होने से मरीज ही नहीं आते।
मेडिकल कालेजों में एडमिशन के लिए इस साल एनईईटी से बात अब लगभग तय मानी जा रही है कि केन्द्र सरकार इस साल एनईईटी को टालने की कोशिश करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल के अपने फैसले में कहा है कि पूरे देशभर के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए सिर्फ एनईईटी की परीक्षा हो और इसको इसी साल से लागू किया जाए. सर्वदलिय बैठक में ज्यादातर पार्टियों ने सरकार पर इस बात का दबाव बनाया कि वो इस साल एनईईटी से किसी तरह छुटकारा दिलाए. एनईईटी लागू हो जाने के बाद स्टूडेंट्स को तमाम मेडिकल क़ालेज में एडमिशने के लिए अलग अलग परीक्षा नहीं देनी होगी. एक ही परीक्षा में रैंक के आधार पर उन्हें पता चल जाएगा कि उन्हें किस मेडिकल कालेज में एडमिशन मिल सकता है. लेकिन आखिर क्या वजह है कि तमाम राज्य सरकारें और पार्टियां इस कदर एनईईटी का विरोध कर रहीं है? क्या सचमुच एनईईटी लागू होने से क्षेत्रिय भाषाओं वाले स्टूडेंट्स के साथ भेदभाव होगा और वे पीछे छूट जाएंगें? या फिर नेता एनईईटी अपने फायदे के लिए स्टूडेंट्स के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं?
एनईईटी से स्टूडेंट्स को होने वाली दिककतों को बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है. दरअसल सारा खेल ये है कि प्राइवेट मेडिकल कालेज के मालिक और जिन नेताओं का पैसा इन कालेजों में लगा है वे लोग मेडिकल सीटों पर कैपिटेशन फीस और मैनेजमेंट कोटे से होने वाली कमाई को छोडने के लिए तैयार नहीं हैं. ये बात किसी से छिपी नहीं है कि तमाम मेडिकल कालेज या तो सीधे प्रभावशाली नेता और उनके परिवार से जुड़े हैं या फिर नेताओं का पैसा वहां लगा हुआ है. खासतौर पर महाराष्ट्र, कनार्टक, आंध्रप्रदेश, तेलांगाना और तमिलनाडु में प्राइवेट मेडिकल कालेजों में मोटी तगडी कैपिटेशन फीस के बदले एडमिशन आम बात है.
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डाक्टर पैदा करने वाला देश है. करीब आधे मेडिकल कॉलेज प्राइवेट हैं. लेकिन इन प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों का स्तर क्या है इसका अंजादा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पिछले ही साल मेडिकल कांउसिल ने 45 मेडिकल कालेजों में 3830 सीटों की मान्यता रद्द कर दी. ये सिलसिला हर साल चलता है. घटिया स्तर के बावजूद, प्राइवेट मेडिकल कालेज हर सीट पर एडमिशन के लिए 25 लाख से लेकर 75 लाख रूपए तक वसूलते हैं. तमाम प्राइवेट मेडिकल कालेज में एडमिशन के लिए पैसा ही सबसे बडी योग्यता है
29 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि देशभर के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिले एक कॉमन एन्ट्रेंस टेस्ट के जरिये किए जाएंगे. पहले दौर का टेस्ट 1 मई को हो चुका है जबकि दूसरे दौर का टेस्ट 24 जुलाई को होगा. एक मई को हुई एनईईटी-1 परीक्षा में करीब 6.5 लाख छात्र बैठे थे.सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (एआइपीएमटी) को एनईईटी माने जाने के लिए केंद्र, सीबीएसई और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) द्वारा अपने समक्ष रखे गए कार्यक्रम को मंजूरी दी थी. जिन छात्रों ने एआइपीएमटी के लिए आवेदन नहीं किया था उन्हें 24 जुलाई के एनईईटी में बैठने का अवसर दिया जाएगा और सम्मिलित नतीजा 17 अगस्त को घोषित किया जाएगा.
तीन साल पहले 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एनईईटी को गैर कानूनी घोषित किया था. इस आदेश को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य विरोध कर रहे हैं. कई निजी कॉलेजों ने भी एनईईटी का यह कहते हुए विरोध किया था कि इससे दाखिलों में उनकी स्वायत्तता का हनन होगा. घटिया स्तर के बावजूद, प्राइवेट मेडिकल कालेज हर सीट पर एडमिशन के लिए 25 लाख से लेकर 75 लाख रूपए तक वसूलते हैं. तमाम प्राइवेट मेडिकल कालेज में एडमिशन के लिए पैसा ही सबसे बडी योग्यता है. नीट से इसी धंधे को खतरा है।

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