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-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जब देश लूटता राजा

कोई करे

कहाँ शिकायत ,

संसद में बैठे दागी

एकजुट हो

करें हिमायत ;

बेहयाई नहीं टूटती ,

रोज़ उठें तूफ़ान सड़क पर ।

दूरदर्शनी बने हुए

इस दौर के

भोण्डे तुक्कड़,

सरस्वती के सब बेटे

हैं घूमते

बनकर फक्कड़ ;

अपमान का गरल पी रहा

ग़ालिब का दीवान सड़क पर ।

खेत छिने , खलिहान लुटे

बिका घर भी

कंगाल हुए ,

रोटी , कपड़ा , मन का चैन

लूटें बाज़ ,

बदहाल हुए ;

फ़सलों पर बन रहे भवन

किसान लहूलुहान सड़क पर ।

मैली चादर रिश्तों की

धुलती नहीं

सूखा पानी,

दम घुटकर विश्वास मरा

कसम-सूली

चढ़ी जवानी;

उम्र बीतने पर दिया है

प्यार का इम्तिहान सड़क पर ।

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1 Comment on "नवगीत/तूफ़ान सड़क पर"

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लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
Guest

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी नवगीत/तूफ़ान सड़क पर
आपका कविता अच्छा लगा बधाई हो ”””’

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