लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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राजकुमार ”हिन्दुस्तानी“

हे राष्ट्र पिता ! अब देश में तेरे , फैली है लाचारी क्यों ?

निर्धन को हैं ठग रहे सभी ,समता की सूखी क्यारी क्यों ?

 

निर्धन न आज तलक समझे, कि हमने पायी आजादी ।

चिंता हर वक्त इन्हें रहती, बस रोटी मिल जाये आधी ।।

सरकारें करके घोटाले , है बढ़ा रही बेकारी क्यों ?

हे राष्ट्र पिता ! अब देश में तेरे, फैली है लाचारी क्यों ?

 

पैसे वाले कानून लिये , हॉथों में अपने घूम रहे ।

सरकारी अफ़़सर सुबह शाम, उनकी चौखट को चूम रहे।।

कानून तो अन्धा होता है, अन्धा अफ़सर सरकारी क्यों ?

हे राष्ट्र पिता ! अब देश में तेरे , फैली है लाचारी क्यों ?

 

भ्रष्टाचारी बढ़ते निशदिन , निर्दोषों को है सजा मिले ।

पब्लिक का पैसा लूट-लूट, करतें हैं अपनें खडे़ किले ।।

परदेस मंे पनपे काला धन , हम पर ये कर्जे़दारी क्यों ?

हे राष्ट्र पिता ! अब देश में तेरे, फैली है लाचारी क्यों ?

 

हे राष्ट्र ! पिता तुम हो मेरे , इस नाते हम हैं पूत तेरे ।

हे पिता तुम्हारी सम्पत्ति में , अधिकार क्यों नहीं हैं मेरे ।।

जब वोटर को न वोटरशिप , पेंशन मिलती सरकारी क्यों ?

हे राष्ट्र पिता ! अब देश में तेरे, फैली है लाचारी क्यों ?

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1 Comment on "हे राष्ट्र पिता !"

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shashi
Guest

kya likha hai?wow bilkul aaj ka sach –per rashterpitaji ne khud hi boya ped babool ka to aaammm khaan se khaye agar prdhaanmantari SARDAR BANAYE HOTE TO

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