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पाबंदी के साये में ज़िंदगी जीना बंदगी है या फिर गंदगी है।


संदीप कुमार सिंह

भारत पाकिस्तान का अद्वितीय संगम

इलाहाबाद, संगम की सरज़मीन जहां दरिया का संगम हेाता है, जहां हिन्दी और उर्दू जुब़ान एक साथ खेलती है। उसी सरज़मीन पर बीते दिनों संगम हुआ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के अवाम का। पाकिस्तानी अवाम जैसे ही इलाहाबाद में दाखिल हुए उनका वो ज़ोरदार स्वागत हुआ, जिसने पाकिस्तानियों के दिलों में कभी ना मिट पाने वाली खूबसूरत तस्वीर बना दी। मिलन की खुशियों की उस घड़ी ने कई अंजानों की आंखों को छलका दिया।

तीन दिन चले इस संगम की छटा लम्हा दर लम्हा सुहावनी होती चली गई। सैंट जोसफ स्कूल के उस मैदान में फर्क करना बहुत ही मुश्किल हो रहा था कि कौन भारतीय है और कौन पाकिस्तानी। वहां मौजूद सभी अविभाजित हिन्दुस्तानी लग रहे थे। रह रहकर वहां सरहद की बातें और बटवारे की त्रासदी का भी ज़िक्र होता रहा। वहां आखरी रात और भी सुहावनी हो गई, जब दो मुल्कों के अवाम ने दो बरसों का संगम और उस दरमियानी रात का जश्न एक साथ मनाया। बारूद और उसके धमाके यहां भी थे, लेकिन वो किसी की जान नहीं ले रहे थे, बल्क़ि उससे होने वाली आतिशबाज़ी लोगों की आँखों और दिल को सुकून पहुंचा रही थी। तभी मैने एक पाकिस्तानी पत्रकार से कहा कि कैसी लग रही है ये आतिशबाज़ी, तो उसने कहा कि बहुत खूब, सुभान अल्लाह…….. बारूद के धमाके ऐसे ही होने चाहिए जो अवाम को सुकून दे, ना कि वैसे जैसे पाकिस्तान में होते हैं जो कि मातम के सिवाए कुछ और नहीं दे पाते।

इलाहाबाद में जश्न में झूमने का भी पूरा इंतज़ाम था। पाकिस्तानी शायरों की ग़ज़लों को भारतीय गायकों की आवाज़ से नवाज़ना और हिन्दुस्तानी भजन पर पाकिस्तानियों का झूमकर नाचना। रफ्ता रफ्ता शाम गुज़र रही थी… रफ्ता रफ्ता समा सुहाना हो रहा था। डीजे पर हिंदुस्तानी गानों और धुनों पर पाकिस्तानी पैरों का थिरकना… गानों के बोल के साथ वो लबो को हिलना देखते ही बन रहा था। ये वाजे़ह करा रहा था कि भले ही सरहदों ने हमें बाट दिया हो, लेकिन संगीत सरहदें नहीं देखती। ओ मेरी जोहरो ज़बी… की धुन बजते ही बड़ी देर से खुद को बांधे बैठे हुए पाकिस्तान से आए दम्पती उठ खडे़ हुए और चचा ने चची के सामने ओ मेरी ज़ोहरा जबी तू अभी तक है हसीं को नाचते हुए गाया तो चची भी शर्माते हुए उसी अंदाज़ में गाने के साथ जवाब और साथ देने लगी। एक तरफ पाकिस्तान के अधेड़ उम्र के दम्पती को उनकी जवानी के दिन याद आ रहे थे, तो दूसरी जानिब पाकिस्तानी हसीन बाला और हिन्दुस्तानी छोरे के थिरकते पॉव की जुगलबंदी का नज़ारा था। बारह बजते बजते समा अपने पूरे शबाब पर पहुंच चुका था। जब थक कर चूर हुए एक पाकिस्तानी नौजवान साथी से मैने पूछा कि कैसा लग रहा है 2011 और 2012 की दरमियानी रात, भारत के अवाम के साथ मनाना, तो उसने कहा कि भाई जान अपनी पूरी उम्र में मैंने नए साल का ऐसा सेलिब्रेशन नहीं मनाया और शायद मना भी ना पाउं। मेरे क्यों कहने के पहले ही वो बोल पड़ा कि पाकिस्तान में तो ऐसा जश्न मनाया भी नहीं जा सकता है क्योंकि वहां इन सब चीज़ों पर पाबंदी है। आगे सवाल नहीं कर सका क्योंकि उसकी आंखें जवाब दे रही थी कि काश पाकिस्तान भी हिन्दुस्तान जैसा आज़ाद होता। जहां हंसने, गाने, गुनगुनाने और खुशियां मनाने पर पाबंदी ना होती। पाबंदी पर सोचकर कुछ आषार यूं निकले,,,,, मातम पर पाबंदी नहीं, खुशियों पर पाबंदी क्यों…..।

अगली बार किसी पाकिस्तानी से मिला तो उससे ज़रूर कहूंगा कि ये सवाल वो अपने मज़हब के ठेकेदार मौलवी से पूछे, कि पाबंदी के साये में ज़िंदगी जीना बंदगी है या फिर गंदगी है।

January 7th, 2012 | 92 views | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post
Category: प्रवक्ता न्यूज़ |
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  • इक़बाल हिंदुस्तानी
    iqbal hindustani

    संदीप जी बहुत खूब लिखा अपने. हम हिन्दुस्तानी होने पर फख्र कर सकते हैं और पाकिस्तानियों के लिए दुआ क वो भी हम से एक दिन ज़रूर सीखने को मजबूर हो जाएँ.

    January 25 2012
    CommentsLikeUnlike
    • varsha singh

      cha gaye bhai maza aa gaya padkar bahut badiya…………allah aapki kalam ko isi tarah kubsural lafzo se nawazta rahe……..

      January 15 2012
      CommentsLikeUnlike
      • आर. सिंह
        R.Singh

        संदीप कुमार जी, इस सार गर्भित लेख द्वारा मेरे जैसे लोगों को इस शुभ अवसर से अवगत कराने के लिए बधाई.कितना अच्छा लगता है यह सब देखकर. काश! सिरफिरे लोगों के दिमाग में भी ये बातें घुस पाती.इंसानियत का तकाजा तो यही है,पर हम इंसान बन पाते तब न.
        यहाँ डल्लास में एक दूकान है है ,जिसका नाम है ,इंडो पाकिस्तान स्टोर .पता चला कि इस दूकान के वर्तमान मालिक बँगला देशीय हैं.ऐसे भी यहाँ हिन्दुस्तान पाकिस्तान की बात नहीं होती.यहाँ के लिए सभी देशी हैं.

        January 08 2012
        CommentsLikeUnlike

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