लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि मानवीयता और नैतिकता के सभी तकाजों को ताक पर रखकर म.प्र. में दवा परीक्षण के लिए मरीजों के जिस्म को कच्चा माल मानते हुए प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। हाल ही में म.प्र. के मंख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधान सभा में यह तो स्वीकार कर लिया कि राज्य के कुछ सरकारी एवं गैरसरकारी अस्पतालों में नियम-कायदों को ताक पर रखकर चोरी छुपे चिकित्सीय दवा परीक्षण किए गए हैं। लेकिन मुख्यमंत्री ने पर्याप्त कानून न होने के कारण चिकित्सकों के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही किए जाने से इंकार दिया। जबकि यदि डॉक्टरों के विरूद्ध कार्यवाही करने के जरूरी कानून नहीं है तो मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को यह जरूरी हो जाता है कि वह विधानसभा में ऐसे कानून बनाए जो इस नाजायज कारोबार से जुड़े लोगों को दंडित कर सकें।

ये दवा परीक्षण नाजायज तौर से भोपाल के भोपाल मेमोरियल अस्पताल और इन्दौर के सरकारी अस्पताल में किये जा रहे हैं। भोपाल गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले संगठन भोपाल ग्रुप फॉर इंफार्मेशन एण्ड एक्शन ने दावा किया है कि अब तक गैस पीड़ितो पर किये गये दवा परी़क्षण में करीब 10 लोग जान गवां चुके हैं। ये परीक्षण बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के लिए 2006 से जारी हैं। इसी तरह इंदौर में 869 लाचार व गरीब बाल-गोपालों की देह पर निर्माणाधीन दवाओं का चिकित्सकीय परीक्षण कर उनकी सेहत के साथ खिलवाड़ किया गया। मध्य प्रदेश के इन्दौर में ये परीक्षण एक सरकारी अस्पताल में चोरी-छिपे किए गए। इस नाजायज कारोबार को अंजाम अस्पताल के करीब आधा दर्जन चिकित्सा विशेषज्ञों ने दो करोड़ बतौर रिश्वत लेकर किये। हैरानी यहां यह भी है कि ये परीक्षण सर्वाइकल और गुप्तांग कैंसर जैसे रोगों के लिए किए गए, जिनके रोगी भारत में ढूंढने पर भी बमुश्किल मिलते हैं। इस क्लीनिकल ड्रग एवं वेक्सीन ट्रायल का खुलासा पहले तो एक स्वयंसेवी संस्था ने किया बाद में इसे विधायक पारस सखलेचा और उमंग सिंघार द्वारा पूछे गए एक सवाल के जबाव में प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेन्द्र हार्डिया ने विधानसभा पटल पर मंजूर किया कि 869 बच्चों पर दवा का परीक्षण बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने इंदौर के महाराजा यशवंतराव चिकित्सालय में किये।

ये परीक्षण इन्दौर समेत प्रदेश के कुछ अन्य सरकारी अस्पतालों में बगैर अनुमति के किए गए। जिन 869 बच्चों पर ये परीक्षण किए गए उनमें से 866 पर टीका और तीन बच्चों पर दवा का परीक्षण किया गया। ये सभी परीक्षण विश्व स्वास्थ्य संगठन की बजाय बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने कराए। ये आंकड़े केवल दो साल के हैं। जबकि प्रदेश में छह साल से आदिवासियों समेत गरीब बच्चों पर दवाओं व टीकों के परीक्षण जारी हैं। परीक्षण के दौरान कुछ बच्चों की मौतें भी हुई हैं। लेकिन इन बच्चों का किसी स्वतंत्र पेनल से शव विच्छेदन नहीं कराया गया। इसलिए यह साफ नहीं हो सका कि मौतें परीक्षण के लिए इस्तेमाल दवाओं के दुष्प्रभाव से ही हुईं ? दरअसल ऐसी स्थिति में खुद चिकित्सक नहीं समझ पाते कि प्रयोग में लाई जा रही दवा से मरीज को बचाने के लिए कौनसी दवा दी जाए। इसलिए इन प्रयोगों के दौरान रोगी की स्मरणशक्ति गुम हो जाना, आंखों की रोशनी कम हो जाना और शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता घट जाना आम बात है।

दवाओं का ऐसा ही प्रयोग भोपाल गैस दुर्घटना के पीड़ितों पर भी भोपाल मेमोरियल अस्पताल में किया गया है। भोपाल ग्रुप फॉर इंफार्मेशन एण्ड एक्शन समाज सेवी संगठन में सतीनाथ षडं्गी और रचना ढींगरा ने दावा किया है कि केंद्रीय दवा नियंत्रण संगठन नई दिल्ली से प्राप्त जानकारी के अनुसार गैस पीड़ितो पर सात दवाओं की जांचों में से मात्र एक पर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया द्वारा निगरानी रखी गई। तीन गैस पीड़ितों की मृत्यु उनके ऊपर टेलिवैक्सीन दवा की जांच की वजह से हुई, जबकि पांच फॉनडापरिनक्स और दो टाइगेसाइकलीन दवा के परीक्षण के वजह से मारे गए। इन परीक्षणों के लिए दवा कंपनियों से कुछ अस्पताल के ही चिकित्सकों ने एक करोड़ से अधिक की धन राशि वसूली।

इंदौर के अस्पताल में वर्ष 2010 में ही 44 बालक-बालिकाओं पर सर्वाइकल कैंसर और गुप्तांग कैंसर के लिए वी-503 टीका का परीक्षण किया गया। गुप्त रूप से किए जा रहे इन परीक्षणों का खुलासा एक स्वयंसेवी संस्था के साथ मिलकर इसी अस्पताल के चिकित्सक डॉ. आनंद राय ने किया तो एक जांच समिति गठित कर मामले को दबाने की कोशिश की गई। इस समिति ने लाचारी जताते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा कि दुनिया में ऐसा कोई कानून नहीं है कि जिसके जरिए दवाओं के ऐसे परीक्षणों पर रोक लगाई जा सके। इस आधार पर न तो समिति के सुझावों को अमल में लाया जा सका और न ही परीक्षण के लिए दोषी आधा दर्जन चिकित्सकों के विरूद्ध कोई कार्रवाही की जा सकी। यहां इस सवाल को गौण कर दिया गया कि चिकित्सकों ने दवा कंपनियों से मोटी रकम तो निजी लाभ के लिए ली, लेकिन संसाधन सरकारी अस्पताल के उपयोग में लिए ? क्या अस्पताल के साथ यह धोखाधड़ी नहीं हैं ? प्रयोग में लाए गए बच्चों की जब मौंते हुईं तो अस्पताल की बदनामी तो हुई ही, आम आदमी का विश्वास भी उठा ? इसकी भरपाई कौन करेगा ? क्या इस आधार पर मुख्यमंत्री दोषियों के विरूद्ध कार्यवाही नहीं कर सकते ?

जिन जानलेवा बीमारियों पर इंदौर में दवाओं का परीक्षण किया गया, वे बीमारियां मध्यप्रदेश में तो क्या भारत में ही कम होती हैं। चरित्रहीनता के चलते ये बीमारियां योरोपीय देशों के गोरों में ज्यादा होती हैं। वहां का जलवायु भी इन बीमारियों की मानव शरीर में उत्पत्ति का एक कारण माना जाता है। इसलिए ये प्रयोग अनैतिकता की ऐसी विडंबना हैं कि हम विदेशियों के लिए अपने लोगों की जान लेने में कोई रहम नहीं बरतने की गुंजाईश छोड़ते हैं। यदि ये परीक्षण टीबी, चिकुनगुनिया, कुपोषण, फेल्सीफेरम और मलेरिया जैसे रोगों पर उपचार की कारगर दवा इजाद करने के लिए किए जाते तो किसी हद तक गुप्त रूप से किए जाने के बावजूद इनके औचित्य को जायज ठहराया जा सकता था। क्योंकि इन्हीं बीमारियों की गिरफ्त में सबसे ज्यादा भारतीय आते हैं और समय पर इलाज नहीं होने के कारण मरते भी बड़ी संख्या में हैं।

वैसे ऐसा नहीं है कि इस बाबत कोई नियम-कायदे वजूद में ही न हों। यदि इजाजत लेकर दवा परीक्षण किए जाते हैं तो नामित विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति की संस्तुति और स्वास्थ्य विभाग की अनुमति जरूरी होती है। अस्पताल के मुखिया और जिन रोगियों पर निर्माणाधीन दवा का प्रयोग किया जा रहा है, पूरी पारदर्शिता बरतते हुए उन्हें भी विश्वास में लिया जाता है। एक सहमति-पत्र पर रोगी के अविभावक के हस्ताक्षर कराकर अनुमति लेना भी ड्रग ट्रायल की अनिवार्य शर्त है। ये परीक्षण सिलसिलेवार तीन अथवा चार चरणों में चलते हैं और प्रयोगशील अवस्था होने के कारण मरीज के शरीर पर इसके दुष्प्रभाव का संदेह बना ही रहता है। कई मर्तबा दवा जानलेवा भी साबित होती है। इसी कारण दवाओं का पहले प्रयोग गिनीपिग, खरगोश और चूहों पर किया जाता है। लेकिन इस मामले में तो सीधे-सीधे इंसानों को ही गिनीपिग और चूहों की तरह इस्तेमाल किया गया। लिहाजा प्रयोग की प्रक्रिया के दौरान मरीजों को नर्सों की देखरेख में रहना चाहिए था, जबकि भोपाल-इंदौर में ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि नर्सों तक बात पहंुचने पर जल्दी गोपनीयता भंग होने की आशंका प्रयोग में लगे चिकित्सा दल को थी।

अपने बाल-बच्चों को जान-बूझकर प्रयोग के खतरों से गुजारना कोई भी माता-पिता नहीं चाहते। इसलिए वे अपनी संतान पर आसानी से किसी भी प्रकार के परीक्षण के लिए रजामंद भी नहीं होते। नतीजतन दवा निर्माता कंपनियां दवा परीक्षण के सिलसिले में अकसर मोटी रकम देकर बिचौलियों का हाथ थामती हैं। ये बिचौलिए अस्पतालों और चिकित्सा महाविद्यालयों के चिकित्सकों को पटाकर गोपनीय तरकीबों से अस्पतालों में सामान्य तौर पर इलाज के लिए आए मरीजों को शिकार के रूप में इस्तेमाल कर परीक्षण शुरू कर देते हैं। इंदौर और भोपाल के अस्पतालों में ऐसी ही तरकीबें अपनाकर दवाओं की आजमाईश शुरू की गई। आरोप है कि इंदौर के मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने इस मकसद पूर्ति के लिए दवा कंपनियों से दो करोड़ रूपये लिए। इस नजरिये से इस मामले की सीबीआई ने भी जांच की थी जिसमें चिकित्सकों को दोषी पाया गया था। किंतु यह जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई।

यह कितनी हैरतअंगेज बात है कि जो चिकित्सक नैतिक संकल्प और संबल के साथ उपचार के पेशे मे आते हैं, वही बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के प्रलोभन में आकर बाल-गोपालों की सेहत से खिलवाड़ करने लग जाते हैं। भारत में और दूसरे देशों में भी भारतीय लोगों को गिनीपिग की तर्ज पर इस्तेमाल करना आसान सा हो गया है। यह आसानी इसलिए भी है क्यांेकि यहां हर प्रकृति के रोगी मिल जाते हैं। वैसे भी भारत के अस्पतालों में ऑपरेशन के बहाने मानव शरीर से मुर्दे गायब कर देना आमफहम हो गया है। मनुष्यों को पशुओं तक की दवाएं खिला देने में चिकित्सक कोई संकोच नहीं बरतते।

कुछ साल पहले इसी तरह का एक प्रयोग इंग्लैण्ड में रह रहीं 21 पंजाबी भाषी महिलाओं पर किए जाने का मामला सामने आया था। इन महिलओं पर वहां के जीव वैज्ञानिकों द्वारा रेडियोधर्मी लौह लवणों का प्रयोग लगातार 20 सालों तक जारी रखा गया। बाद में बीबीसी चैनल-4 पर दिखाई गई फिल्म ‘‘डेडली एक्सपेरीमेण्ट’’ में किए गए पर्दाफाश से साफ हुआ कि ये महिलाएं 20-25 साल पहले एनीमिया (रक्त अल्पता) की शिकायत लेकर इंग्लैण्ड के एक अस्पताल में उपचार के लिए गईं थीं। यहां के चिमित्सकों ने अंदाज लगाया कि परंपरागत भारतीय भोजन के कारण इन महिलाओं के खून में लौह-तत्व की कमी है। इस निष्कर्ष पर पहुंचते ही इन चिकित्सकों ने इन महिलाओं पर गिनीपिग की तर्ज पर प्रयोग शुरू कर दिए। महिलाओं के शरीर में लौह-तत्व ढूंढ़ने के लिए उपचार के बहाने रोटियों में रेडियोधर्मी यौगिक मिलाकर उन्हें रोटियां खिलाना शुरू कर दीं। नतीजतन रेडियोधर्मी इस जहर से महिलाएं मुख्य बीमारी से ज्यादा प्रयोग के चलते प्राण गवां देने की स्थिति में आ गईं। बीबीसी ने जब रहस्य से पर्दा उठाया तब यह भी पता चला कि महिलाओं का इलाज कर रहा अस्पताल दरअसल अस्पताल न होकर एक ‘परमाणु शोध संस्थान’ है। जिसमें वहां की मेडीकल रिसर्च काउंसिल ये जानलेवा प्रयोग कर रही थी। इस प्रयोग का शर्मनाक पहलू यह था कि ये परीक्षण एक भारतीय चिकित्सक की मदद से किए जा रहे थे। लिहाजा जरूरी है कि नई दवाओं, चिकित्सीय उपकरणों और उत्पादों के संबंध में एक कठोर कानून बनाया जाए

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