लेखक परिचय

अवनीश सिंह भदौरिया

अवनीश सिंह भदौरिया

लेखक दैनिक न्यू ब्राइट स्टार में उप संपादक हैं।

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Doctors

एलोपैथिक डॉक्टरों की योग्यता पर अब सवालिया निशान उठने शुरू गय हैं और क्यों न हो जो एलोपैथिक आंकड़े उनकी योग्यता पर सामने आये हैं वो रोमटे खड़े करने वाले हैं। भारत में डॉक्टरों के मामले अकसर सामने आते रहते हैं लकिन जो आंकड़ों से अब हम रूबरू होने जा रहे हैं वो एक दम डराने वाले हैं। भारत में एलोपैथिक डॉक्टरों की योग्यता पर प्रशन खड़े होने लगे हैं पर क्यों? चलो आप को बतातें हैं- भारत में एलोपैथिक डॉक्टरों की मैडीकल योग्यता पर डब्ल्यूएचओ ने गहरी चिंता जताई है। डब्ल्यूएचओ की रिर्पोट के मुताबिक 57फीसदी एलोपैथिक डॉक्टर के पास नहीं है उनकी मैडिकल योग्यता नहीं है। डब्ल्यूएचओ की इस रिर्पोट ने पूरे देश को हिला के रख दिया है। इस रिर्पोट के बाद यह साफ हो गया है कि भारत में डॉक्टरों पर को लेकर सरकार की लापरवाई जारी है। वहीं, दूसरी तरफ हमारे देश में डॉक्टरों की कमी पहले से ही है और अब इस रिर्पाेट के सामने आने से सरकार व जनता को चिंतित होने को मजबूर कर रही है। अगर हम डॉक्टरों की बात करें तो पूरी दुनिया में भगवान का दर्जा दिया जाता है लकिन हमारे देश में डॉक्टरों की लापरवाई को हम अकसर देखते आए हैं। पर अब डब्ल्यूएचओ की रिर्पोट आने से उनकी योग्यता पर प्रशन चिंन्ह खड़े कर रहे हैं। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ज्यादातर डॉक्टर्स बगैर मेडिकल योग्यता के कार्य कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2001 में देश में एलोपैथिक डॉक्टर होने का दावा करने वाले करीब 31फीसदी लोग सिर्फ सेकंडरी स्कूल लेवल तक शिक्षित थे। जबकि 57फीसदी लोगों के पास कोई मेडिकल याग्यता ही नहीं थी। 2001 में भारत में नेशनल लेवल पर एक लाख आबादी पर सिर्फ 80 डॉक्टर थे। इनमें से 36 डॉक्टर (एलोपैथिक, होमियोपैथिक, आयुवेर्दिक, यूनानी) के पास कोई मेडिकल योग्यता नहीं थी। गांवों में सिर्फ 18.8फीसदी हेल्थकेयर वर्कर्स के पास ही मेडिकल योग्यता थी। डब्ल्यूएचओ ने भारत में स्वास्थ्य कार्यबल टाइटल से इस रिपोर्ट को पब्लिश किया है।

यह रिपोर्ट 2001 के जनगणना के दौरान सभी जिलों से जुटाए गए डाटा पर बेस्ड है। इस स्टडी में भारत के हेल्थकेयर सेक्टर की गणवक्ता पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं, दूसरी तरफ मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की सेक्रेटरी डॉ. रीना नैय्यर ने कहा- मुझे नहीं मालुम कि यह रिपोर्ट अभी तक आधिकारिक तौर पर एमसीआई के पास आई है या नहीं। लेकिन अगर कोई शख्स एलोपैथिक दवाईयां पर अभ्यास कर रहा है और उसके पास पंजीकृत मेडिकल योग्यता नहीं है तो उसे नीमहकीम ही कहा जाएगा। एमसीआई के एक आधिकारिक तौर पर कहा- ‘यह रिपोर्ट पुराने डाटा पर बेस्ड है। तब से हालात में काफी सुधार आया है।’ इंडियन मेडिकल मंडली की स्थाई समिति (नीमहकीमों के विरोध के लिए बनी कमेटी) के अध्यक्ष डॉ. एवी जयकृष्णन ने कहा- ‘केंद्र सरकार ने धोखाधड़ी करने वाले मेडिकल प्रैक्टिसनर्स पर रोक लगाने की कोई कोशिश नहीं की है।’ दूसरी और लचर कानून पर भी सवालीया निशान उठ रहे हैं। एसे में अब लचर कानून क्या करे? ‘ज्यादातर स्टेट्स की यही कहानी है कि वहां बड़ी संख्या में नीमहकीम अपना धंधा चला रहे हैं।’‘कानून इतना कमजोर है कि जब भी कोई ऐसी धोखाधड़ी करते हुए पकड़ा जाता है, उसे उसी दिन बेल मिल जाती है और वो अपनी प्रैक्टिस फिर शुरू कर देता है।’ डॉक्टरों के लिए सरकार को कड़े कानून को लाना होगा। नहीं तो आगे बुहत कुछ भुगतना पड़ सकता है। वहीं, दूसरी और हमारे देश में दांतों के डॉक्टरों की भी मारा मारी है। रिपोर्ट के मुताबिक गांवों में मौजूद 5 डॉक्टर में से सिर्फ एक ही दवाओं का अभ्यास के लिए योग्य हैं। भारत में 1 लाख आआदी पर 80 डॉक्टर और 61 नर्स हैं। जबकी चीन में इतनी आबादी पर 148 डॉक्टर और 103 नर्स हैं। देश को 7 लाख से ज्यादा डॉक्टर की जरूरत है, लेकिन मेडिकल विश्वविद्यालय हर साल सिर्फ 30 हजार डॉक्टर ही उत्पादित कर पाती हैं। 2001 में भारत में एक लाख लोगों पर सिर्फ 2.4 दांतों के डॉक्टर थे। 58 जिलों में कोई दांतों के डॉक्टर नहीं था। जबकि 175 जिले ऐसे थे जहां मेडिकल योग्यता वाला एक भी दांतों के डॉक्टर नहीं था। दिल्ली मेडिकल काउंसिल के डॉ. गिरीश त्यागी का कहना है, ‘नीमहकीम अक्सर पकड़े जाते हैं। पिछले साल ऐसे 200 लोग पकड़े गए थे।’

‘हम शिकायत दर्ज कराते हैं, अब यह पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे।’ इस मामले पर सरकार का क्या रुख होता है यह देखना अभी बाकी है।? क्या सरकार ऐसे मामलों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी?

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