लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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कांगे्रस

संजय सक्सेना

लखनऊ उत्तर प्रदेश में कांगे्रस सशक्त हो रही है। इस बात का कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं पेश किया जा सकता है। लोकतंत्र में जब किसी पार्टी की सफलता-असफलता को भीड़तंत्र की कसौटी पर कसा जाता हो तो कांगे्रस का ग्रा्फ बढ़ रहा है यह हकीकत सामने आती है। लोकसभा चुनाव से पूर्व बीजेपी नेता और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का पैमाना भी तो उनकी जनसभाओं और रोड शो में जुटने वाली भीड़ से ही तो लगाया जाता था। 29 जुलाई को लखनऊ में कांगे्रस युवराज राहुल गांधी पाॅलिटिकल रैंप पर चहल कदमी करते हुए कांगे्रसियों में नई जान फंूक गये। रिझझिम फुहारों के बाद हुई तेज बरसात भी कांगे्रसियों का हौसला पस्त नहीं कर पाई। घंटों मंच से लेकर मैदान तक कांगे्रस के नेता और कार्यकर्ता चट्टान की तरह सियासी मोर्चे पर डटे रहे। इन लोंगो में जोश भरने का काम राहुल गांधी ने किया। स्क्रिप्ट पहले से तैयार थी। राहुल ‘नायक’ की तरह आये और अपना किरदार निभाकर चले गये। पीछे छोड़ गये तो सियासी चर्चाओं का अम्बार। यूपी में इससे पूर्व शायद ही राहुल का कोई कार्यक्रम इतना हिट रहा होगा। लखनऊ कर्यक्रम की सफलता कांगे्रस नेताओं के सिर चढ़कर बोल रही थी। कांगे्रस की मुख्यमंत्री पर की दावेदार शीला दीक्षित, प्रदेश अध्यक्ष राजब्बर से लेकर प्रभारी गुलाम नबी आजाद तक सब गद्गद थे तो कांगे्रस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर(पीके) के चेहरे पर शुकून देने वाले भाव थे आखिर उनका पहला शो हिट रहा था। इस कामयाबी से पीके को उर्जा मिली जिसका नतीजा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में देखने को मिला। वाराणसी में लखनऊ से भी बड़ी कामयाबी कांगे्रस और पीके के हाथ लगी। लखनऊ में राहुल गांधी चेहरा थे तो वाराणसी में पीके ने कांगे्रस अध्यक्षा सोनिया गांधी पर ‘दांव’ लगाया था। वाराणसी में लखनऊ की तरह जनसभा नहीं रखी गई थी,यहां सोनिया गांधी का करीब छहः किलोमीटर लम्बा रोड शो था। रोड शो में खूब भीड़ जुटी। लोग सोनिया के रोड शो की तुलना मोदी के रोड शो से होने लगी। सोशल मीडिया पर भी सोनिया का रोड शो कांगे्रस की सोशल मीडिया टीम की वजह से पूरे दिन ‘सोनिया इन काशी’ के नाम से टाॅप पर टेªंड करता रहा।सोनिया भीड़ को देखकर गद्गद थी,वह हाथ हिला-हिलाकर भीड़ का अभिवादन कर रही थीं, लेकिन अचानक सोनिया की तबीयत बिगड़ने लगी।एयरपोर्ट पर चार घंटे के इलाज के बाद उन्हें दिल्ली भेज दिया गया,लेकिन तब तक कांगे्रस का काम हो चुका था। पीके की रणनीति यहां भी सफल रही थी। सोनिया की गैर-मौजूदगी में शीला दीक्षित और राजब्बर ने रोड शो की कमान अपने हाथों मे ले ली।शीला दीक्षित ने तो घोषणा भी कर दी कि अगर कांगे्रस की सरकार बनी तो पूर्वाचल को विशेष पैकेज दिया जायेगा। एक सप्ताह में दो बड़े और कामयाब कार्यक्रम। इससे पहले दिल्ली से कानपुर तक कांगे्रस की बस यात्रा ‘27 साल,यूपी बेहाल’में भी खूब भीड़ देखने को मिली थी। वाराणसी में सोनिया की तबीयत खराब हो गई तो शीला दीक्षित को स्वास्थ्य कारणों से बस यात्रा बीच में ही छोड़कर वापस आना पड़ा था। इसी तरह से नई जिम्मेदारी संभालने के बाद जब शीला दीक्षित और राजब्बर का प्रथम लखनऊ आगमन हुआ था,तब भी कांगे्रसियों के जोश ने काफी उफान मारा खैर, प्रथम दृष्टया यूपी में 27 वर्षो के बाद कांगे्रस के दिन बहुरते दिख रहे हैं,लेकिन इसमें कितनी हकीकत है और कितना फंसाना है, यह अगले साल बैलेट मशीन खुलने के बाद ही पता चलेगा। कांगे्रस की यूपी में क्या स्थिति है,इसका बारीकी से विश्लेषण किया जाये तो साफ नजर आता है कि भले ही कांगे्रसी तमाम दावे कर रहे हों, लेकिन कांगे्रस के लिये यूपी में राह बहुत ज्यादा आसान नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यही है कि 2017 में चुनाव उत्तर प्रदेश विधान सभा के होने हैं,लेकिन कांगे्रसी अखिलेश सरकार से ज्यादा हमले केन्द्र की मोदी सरकार पर करने में लगे हैं। मानो यह विधान सभा नहीं लोकसभा का चुनाव हो। काशी में रोड शो करके भले ही कांगे्रस ने अपनी ताकत दिखा दी हो,मगर यहां से जो संदेश निकला है वह लखनऊ नहीं दिल्ली ही गया है। बात यहीं खत्म नहीं होती है। कांगे्रस ने सियासी बिगुल तो बजा दिया है लेकिन उसे अभी तक यह भी नहीं पता है कि किस पार्टी या नेता के ऊपर कितना हलका या तगड़ा हमला किया जाये। ऐसा लगता है कि भले ही कांगे्रसी ‘एकला चलो’ की बात कर रहे हों, लेकिन कहीं न कहीं अंदरखाने में उनकी नजर छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन पर भी लगी हुई है। सबसे बड़ी बात तो यही है कि फिलहाल कांगे्रसी अकेले ही ताल ठोंक रहे हैं, जब सपा-बसपा और भाजपा भी मैदान में कूदेंगे तब कांग्रेस की जमीनी स्थिति का सही-सही आकलन हो पायेगा। कांग्रेसी जिस रणनीति के तहत आगे बढ़ रहे हैं उससे तो यही लगता है कांगे्रस सबसे पहले अपने पुराने परम्परागत वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है। कांगे्रस की निगह दलित-ब्राहमण और मुस्लिम समीकरण पर है। यह बात सोनिया के रोड शो में साफ झलक रही थी। रोड शो के लिये जो रास्ता चुना गया था, उसमें मुस्लिम,ब्राहमण और दलित बाहुल्य आबादी वाले इलाके खासकर शामिल थे।

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1 Comment on "खुलते कांगे्रस की किस्मत के दरवाजे, रोड पर सोनिया, रैंप पर राहुल"

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mahendra gupta
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अभी तो रात बाकी है , अभी तो बात बाकी है ,
अभी सहर तो होने दो ,हमारी मुलाक़ात बाकी है
यही हाल है कांग्रेस का यू पी में , अभी कई करवटें बदलेंगी जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएगा , कहीं ऐसा न हो कि मायावती और कांग्रेस दोनों समझौते को मजबूर हो जाएँ ,अभी कई मुद्दे उठेंगे , वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कई षडयंत्र रचे जाएंगे , कई मुद्दे उछाले जाएंगे इसलिए बहुत इन्तजार करना होगा कि ऊँठ किस करवट बैठता है

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