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डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव 

वे जिला प्रमुख है। उनके कार्यालय के ऊपर कोई मंजिल नही है पर उन्हें ऊपर से आदेश आते रहते हैं। इस बार कुछ इस तरह का आदेश आया। गरीबी हटाओ मंत्रालय, भारत सरकार आदेश ः- आपको ज्ञात है कि 33 प्रतिशत भारत गरीब है। इससे प्रगति की रफ्तार असंतुलित हो गई है। अतः आपको आदेश दिए जाते हैं कि आपके क्षेत्र की गरीबी ढूंढ़-ढूंढ़कर हटाएं। प्रतिलिपि – लगभग 50 हजार अधिकारियों को ।

वे अपना सिर पकड़कर बैठ गए। उन्होंने गरीबी देखी ही नहीं थी अतः हटाते कै से?उनकी भूख पेट के बजाय जूबान पर और दोनों आंखों में रहती थी। वे देश की भूख के शुक्रगुजार थे जिसकी वजह से उन्होंने कालीन, क्राकरी, हीरो के गहने और बंगले इत्यादि खरीदे। मुल्क की भूख के दान के फलस्वरूप गरीबी हटाने के लिए इस जिले को 17 अरब रुपयों की भीख प्राप्त हुई थी। उसके उपयोग से सरकार के दरबारियों ने एक कार्यशाला का आयोजन किया। ये गरीबी हटाने के तरफ पहला कदम था। इस कार्यशाला में हर विभाग को कम से कम 10 प्रतिशत गरीबी हटाने का लक्ष्य आवंटित कर दिया गया जिससे कि 15 विभाग मिलकर कम से कम 150 प्रतिशत गरीबी हटा सकें।

लगभग एक लाख रूपये खर्च करने के बाद सदन इस नतीजें पर पहुंचा कि जिले की गरीबी हटाने के लिए एक शानदार पार्क भी बनवाया जाये। आखिरकार खाना खाने के बाद गरीब लोगों को घूमने के लिए एक पार्क भी होना चाहिए। एक अरब रूपयों से बनने वाले पार्क से गरीबी का 1/15 वां हिस्सा कम हो जाएगा।

”गरीबी हटाओ” बजट से प्रशासनिक अधिकारी का एक भव्य कार्यालय बनवाया गया जिसमें महंगे कालीन बिछाए गए एवं प्रशीतक यंत्र लगवाए गए।

सामान्य प्रशासन विभाग के पास एक सांस्कृतिक समूह था जिनके कूल्हे मटकाने से लोग महान पुरूषों के आदर्श लेते थे, नसबंदी करा लेते थे और जितने कार्यक्रम है वह सब करवा लेते थे। उनके नृत्य और गायन से गरीबी अब उठकर चली गई। गरीबी हटाने के लिए कठपुतली का कार्यक्रम रखा गया जिससे गरीबी शहर छोड़कर भागने लगी।

”गरीबी हटाओ” के लिए एक अखिल जिला कवि सम्मेलन सह मुशायरा, सह कव्वाली और सह गाने का कार्यक्रम आयोजित किया गया। उन कवियों एवं कलाकारों ने गरीबी हटाने के लिए वीर रस, शृंगार रस और हास्य रस की रचनाएं प्रस्तुत की। गरीबी अपना मजाक न सह सकी और दूर हो गई।

”गरीबी हटाओ” कार्यक्रम में प्रशिक्षण लेने के लिए अधिकारियों का एक दल विदेश भ्रमण को निकल गया। वापस लौटने पर एक प्रभावशाली रिपोर्ट शासन को भेजी गई। इनमें एक अधिकारी को गरीबी हटाने में महत्वपूर्ण कार्य करने पर राष्ट्रपति जी द्वारा पुरस्कृत भी किया गया। अधिकारी जी ने रिसर्च की थी कि भारत में गरीबी का कारण विदेश है।

एक ‘गरीबी हटा बलमा’ नामक फिल्म बनाई गई जिसको प्रदर्शन से पूर्व ही पुरस्कृत कर दिया गया। उसके नायक को गरीबों का सशक्त अभिनय के लिए पद्मश्री भी दी गई। दरअसल, उसके चेहरे पर वेदना के भाव लाने के लिए उसे तंग जूते पहना दिए गए थे।

यूं तो हमारी फिल्में दिन में तीन बार हर टॉकीज में गरीबी हटाती है। अमीर लड़की को गांव का लफंगा प्यार करता है फिर लड़की भी प्यार करने लगती हौ। अमीरी उसके बाप का रूप धरे दोनों के बीच में आ जाती है अंत में नायक उससे बड़ा तस्कर बनकर दर्शकों की जब से व्हाया टॉकीज पैसे खींच लेता है। दर्शक और गरीब हो जाते हैं।

गरीबी हटाने के आंकड़ें दिन में तीन बार प्रसारित होने लगे कुछ ऐसे गरीबों का साक्षात्कार प्रसारित किया गया जिनकी गरीबी कार्यक्रम लागू होने के तत्काल पश्चात चली गई थी। एक परिवार के छोटे बच्चे ने उसे पहचान लिया और बोला मम्मी ये अंकल तो उस साबुन के विज्ञापन में भी आते हैं जो आधा कपड़ा सफेद और आधा कपड़ा मंटमैला धोता है।

बड़े भाई ने कहा और दूसरा वाला ‘सास बहू’ सीरियल में राजू बनता है। मां ने कहा ये तिसरा वाला दस फेरों वाले कभी खत्म न होने वाले सीरियल में कभी देवर और कभी जेठ बन जाता है।

दादी बोली और जो साक्षात्कार ले रहा है वह धार्मिक चैनल में उपदेश देते रहता है। कुछ असंतुष्ट यानि बुध्दिजीवियों का कहना है कि जितना पैसा गरीबी हटाओं कार्यक्रम में बर्बाद किया गया उतना यदि गरीबों में सीधे ही बांट दिया जाता तो हर गरीब बंगला, कार और पांच लाख रूपये के बैलेंस वाला अमीर बन जाता। इसके विपरीत माया की तरह बजट खर्च होता जा रहा है और गरीबी ग्रहण की तरह स्थिर होती जा रही है।

विदेशी लोग नेकी कर दरिया में डालते नहीं है पर नेकी कर नापते हैं। दान देकर वे यह भी देखते हैं कि उसका उचित उपयोग हुआ की नहीं इसे अंग्रेजी में ‘मानीटरिंग’ कहते हैं। ऐसा ही एक समूह गरीबी हटाओ कार्यक्रम का मूल्यांकन करने सीधा गांवों में चला गया। उन्होंने पाया कि एक ग्रामीण वेसा ही अनपढ़ अज्ञानी और पहले से अधिक गरीब हो गया है। बाद में मुख्यालय पर आकर उन्होंने खर्चों की मदें देखी। उन्हें आश्चर्य हुआ कि गरीबी दूर करने के नाम पर अधिकारियों ने विदेश यात्राएं की हैं, कालीनें खरीदा हैं, गायन एवं नृत्य किए है, कवि सम्मेलन किए गए है, कठपुतलियों के खेल किए गए हैं, पार्क बनवाए गए हैं और दौड़ने के ट्रैक बनवाए गए हैं।

* लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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