लेखक परिचय

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

जन्म लखनऊ में, पर बचपन - किशोरावस्था जबलपुर में जहाँ पिताजी टी बी सेनिटोरियम में चीफ मेडिकल आफिसर थे ; उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में स्नातक / स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन करने के पश्चात् भारतीय स्टेट बैंक , केन्द्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ; सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी बैंक में सलाहकार ; राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में प्रोफ़ेसर - सलाहकार ; एस बी आई ओ ए प्रबंध संस्थान , चेन्नई में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर ; अनेक विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से सम्बद्ध ; हिंदी - अंग्रेजी - संस्कृत में 500 से अधिक लेख - समीक्षाएं, 10 शोध - लेख एवं 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक - अनुवादक ; कई पुस्तकों पर अखिल भारतीय पुरस्कार ; राष्ट्रपति से सम्मानित ; विद्या वाचस्पति , साहित्य शिरोमणि जैसी मानद उपाधियाँ / पुरस्कार/ सम्मान ; राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर का प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ का मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, एन सी ई आर टी की शोध परियोजना निदेशक एवं सर्वोत्तम शोध पुरस्कार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अनुसन्धान अनुदान , अंतर -राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय एकता सम्मान.

Posted On by &filed under विविधा.


RajbhashaHindiडा. रवीन्द्र अग्निहोत्री
संविधान सभा को जिन विषयों पर बहुत अधिक विचार – विमर्श करना पड़ा, उनमें से एक विषय स्वतंत्र भारत की राजभाषा से संबंधित था । परस्पर विरोधी विचार वाले सदस्यों के कारण यह विषय बहु – आयामी बन गया था । संविधान सभा में राजभाषा के लिए हिंदी ( जिसे कुछ लोग हिन्दुस्तानी कह रहे थे ) के अतिरिक्त संस्कृत , बांग्ला और अंग्रेजी के भी प्रस्ताव रखे गए । अंततः हिंदी के पक्ष में निर्णय हो जाने के बाद भी कुछ प्रश्नों पर मतभेद बना रहा ; जैसे, राजभाषा का नाम हिंदी हो या हिन्दुस्तानी, उसकी लिपि केवल देवनागरी हो या फारसी भी , उसके अंक इन्हीं भाषाओं के हों या अंतर-राष्ट्रीय आदि ; पर इन सबसे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि उस हिंदी / हिन्दुस्तानी का प्रयोग तुरंत शुरू कर दिया जाए या कुछ समय बाद , यदि बाद में तो कितने समय बाद । विचार विमर्श होने पर प्रथम दो बिन्दुओं ( अर्थात राजभाषा का नाम हिंदी और लिपि देवनागरी ) पर तो सहमति हो गई पर शेष दो बिन्दुओं पर सहमति नहीं बन पाई । ऐसी स्थिति में सदस्यों को एक समझौते के लिए तैयार किया गया क्योंकि संविधान सभा ने शुरू की ही बैठकों में यह निश्चय कर लिया था कि सभी निर्णय सर्वसम्मति या लगभग पूर्ण – सहमति से ही किए जाएंगे, बहुमत के आधार पर नहीं ( विस्तार के लिए देखें : 1 . संविधान सभा के ही एक सदस्य शिवा वी. राव द्वारा लिखित , फ्रेमिंग इंडियाज कांस्टीट्यूशन ; नई दिल्ली : इंडियन इंस्टीट्युट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन ; 1968 ; पृ. 794 ; तथा 2 . ग्रेनविल आस्टिन , द इंडियन कांस्टीट्यूशन : कार्नर स्टोन ऑफ़ ए नेशन ; बॉम्बे : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ; 1972 ; विशेष रूप से इंडियाज ओरिजिनल कंट्रीब्यूशन : डिसीशन मेकिंग बाई कान्सेनसस ; पृष्ठ 311 – 317 ; एवं अध्याय 12 लैंगुएज एंड द कांस्टीट्यूशन, द हाफ हार्टेड कम्प्रोमाइज, पृष्ठ 265 – 307 ) ।

समझौते के अनुसार अंतर-राष्ट्रीय अंकों का प्रयोग स्वीकार करते हुए यह निश्चय किया गया कि राजभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग पंद्रह वर्ष बाद शुरू किया जाएगा । साथ ही यह व्यवस्था भी की गई कि इस अवधि में पांच – पांच वर्ष के बाद ” राजभाषा आयोग ” का गठन किया जाएगा जिसमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के विद्वान होंगे और ये लोग राजकाज में अंग्रेजी का प्रयोग हटाने तथा हिंदी का प्रयोग शुरू करने के लिए सुझाव देंगे ।

समझौते के फलितार्थ :
समझौता कराने वालों का उद्देश्य तो पवित्र था, वे सर्व-सम्मति बनाना चाहते थे और इसके लिए कुछ समय तक प्रतीक्षा करने को भी तैयार थे; पर समझौते के फलितार्थ पवित्र नहीं रहे । नेहरू जी जैसे लोगों का तो यह मानना था कि अगर अभी अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जाए और पंद्रह वर्ष बाद हिंदी को राजभाषा बनाया जाए तो एक पीढ़ी बाद अंग्रेजी इस देश से स्वतः गायब हो जाएगी ( राबर्ट मैकक्रम तथा अन्य, द स्टोरी ऑफ़ इंग्लिश ; लन्दन : फेबर एंड फेबर बी बी सी पब्लिकेशन्स ; 1986 , पृष्ठ 39 ) , पर हुआ इसका उलटा । हिंदी गायब होती गई , अंग्रेजी पैर जमाती गई और केवल हिन्दी नहीं, सर्व-भारतीय-भाषा-ग्रासी बनती गई । इस वातावरण में नई-नई समस्याओं ने जन्म लिया जिनका समाज-भाषावैज्ञानिक , मनो-भाषावैज्ञानिक एवं अन्य दृष्टियों से आकलन करना उपयोगी होगा ।

1.0 लोकतंत्र के लिए लोकभाषा अनिवार्य नहीं :
स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान जन-साधारण को यह विश्वास दिलाया गया था कि आज़ादी मिलने पर लोकतंत्र की स्थापना की जाएगी और प्रशासन में लोकभाषा का प्रयोग किया जाएगा ताकि स्वराज्य का लाभ सबको मिल सके । इसलिए संविधान सभा ने जब हिंदी को स्वतंत्र भारत की राजभाषा बनाने की घोषणा की तो लगा कि उसने
1.1 उस भाषा का सम्मान किया है जो केवल उत्तर भारत की नहीं, बल्कि पूरे देश की भाषा है क्योंकि उसका विकास “ उत्तर भारत और दक्षिण भारत के दीर्घकालीन राजनीतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों ” के आधार पर पूरे देश की आम जनता के बीच बोली जाने वाली भाषा के रूप में हुआ था ( डा. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या , भारतीय आर्यभाषा और हिंदी ; नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन ,पांचवां संस्करण , 1989 ; पृष्ठ 182 ) ।

1.2 यह उस भाषा का सम्मान था जिसका निर्माण और विकास देश के विभिन्न भाषा – भाषियों ने, और विभिन्न धर्मावलम्बियों ने किया था । इसलिए जो इस देश की ” सामासिक संस्कृति ” की सर्वोत्तम प्रतीक थी ।
1.3 यह उस भाषा का सम्मान था जिसके देशव्यापी प्रसार को देखकर यूरोपीय विद्वान आश्चर्यचकित हुए थे । विदेशी शासकों ने अपनी भाषाओं के प्रति आग्रह रखते हुए भी जिसे राजभाषा के रूप में अपनाया , फिर चाहे वे 12 वीं से 16 वीं शताब्दी के मुसलमान शासक हों, 16 वीं से 18 वीं शताब्दी के मुग़ल शासक हों, या 18 वीं से 20 वीं शताब्दी के अँगरेज़ शासक हों ।

1.4 यह उस भाषा का सम्मान था जिसे सीखना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वतन्त्रता का सबसे पहला काम बताया था, जिसके बल पर उन्होंने मुट्ठी भर अंग्रेजी – दां लोगों के आन्दोलन को ” देश की आम जनता का स्वतन्त्रता संघर्ष ” बना दिया और देश के करोड़ों दलितों, पीड़ितों, निरक्षरों आदि को भी ‘ स्वराज्य ‘ का महत्व समझा दिया । इसीलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना उन्होंने अनिवार्य बताया था ।

1.5 उस लोकभाषा का सम्मान किया है जिसे लोकतंत्र के लिए अनिवार्य माना गया था ।
पर स्वतंत्र भारत में उसका प्रयोग स्थगित रखने और अंग्रेजी का प्रयोग विहित करने से इस सारे इतिहास पर मानों पानी फिर गया । जो स्वराज्य सबके लिए होने वाला था, वह केवल अंग्रेजी बोलने वालों के लिए ‘ रिज़र्व ‘ हो गया । इस निर्णय के परिणामस्वरूप वह दृष्टि ही जाती रही जो स्वतंत्र भारत में अंग्रेजी के प्रयोग में बुराई देखती थी। इस निर्णय से ” अखिल भारतीय भाषा हिंदी ” उत्तर भारत के कुछ राज्यों की “क्षेत्रीय भाषा ” बनकर रह गई । अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था शुरू होने से पहले जहाँ दक्षिण के तत्कालीन कोयम्बतूर जैसे तमिलभाषी राज्य तक में 40 प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षा हिंदी माध्यम से दी जाती थी ( डा. धर्मपाल, द ब्यूटीफुल ट्री : इंडिजिनस इंडियन एजुकेशन ; नई दिल्ली : बिब्लिया इम्पेक्स प्रा. लि. , 1983 ; पृष्ठ 117 ) , वहां वह माध्यम के रूप में उन स्थानों से भी विस्थापित हो गई जिन स्थानों की उसे क्षेत्रीय भाषा बताया गया ।

2.0 देश की एकता और प्रगति के लिए अंग्रेजी अपरिहार्य :
राजभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग वर्जित करने और अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने से हमारे देश के व्यवहार में अंग्रेजी आगे बढ़ती गई और हिंदी पिछड़ती गई । इतना ही नहीं, अंग्रेजी देश की एकता की प्रतीक बन गई और हिंदी विघटन की । हिंदी की बात करने का अर्थ हो गया – देश को भाषा के नाम पर बांटना । जिस अंग्रेजी को लार्ड मैकाले ने केवल आधुनिक ज्ञान – विज्ञान के लिए आवश्यक माना था , वह अब लगभग दो सौ वर्ष बाद भारत में हर उस काम के लिए आवश्यक हो गई है जो भाषा के माध्यम से संपन्न किया जाता है। जिस अंग्रेजी को 1948 में राधाकृष्णन कमीशन ने और 1966 में कोठारी कमीशन ने भी केवल उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक माना था , वह अंग्रेजी आज उच्च , माध्यमिक या प्राइमरी ही नहीं , नर्सरी शिक्षा तक का पर्याय बन चुकी है । आज शिक्षित होने की केवल एक निशानी है और वह है अंग्रेजी का प्रयोग । इसीलिए विशिष्ट अवसरों पर भेजे जाने वाले शुभ-कामना सन्देश , विवाह या नामकरण आदि के निमंत्रण पत्र , दरवाजे पर लगे नामपट जैसे हर काम के लिए अंग्रेजी मानों अपरिहार्य बन गई है । दादी – नानी अब बच्चों को अपनी बोली में कहानी या लोरी नहीं सुनातीं, अब तो ‘ मम्मी ‘ और ‘ ग्रैंड माँ ‘ अंग्रेजी की ‘ पोएम ‘ और ‘ स्टोरी ‘ रटवाती हैं । लोग यह मानने लगे हैं कि जो चीज़ पूरे देश के लिए प्रयोज्य हो, वह रोमन लिपि और अंग्रेजी में ही होनी चाहिए । इसीलिए डाक के लिफाफों पर पता अंग्रेजी में लिखते हैं, गोष्ठी का संचालन अंग्रेजी में करते हैं, संसद हो या विधान सभा , अंग्रेजी में बोलना ‘ प्रगति ‘ की निशानी मानी जाती है ।अगर आप उन्हें यह याद दिलाएं कि अंग्रेजी शासनकाल में सन 1864 में जब पूरे देश की लगभग छह सौ रियासतों के राजाओं की ‘ पहली बैठक ‘ आयोजित की गई तो उसका संचालन तो हिंदी में किया ही गया , तत्कालीन गवर्नर जनरल एवं वायसराय सर जान लारेंस ने भी अपना भाषण हिंदी ही में दिया ( मैक्मिलंस जनरल स्टडीज़ फॉर यू पी एस सी सिविल सर्विसेज मेन एग्जामिनेशन ; दिल्ली : मैकमिलन इंडिया लि., 1986 ; पृष्ठ ए – 147 ) तो इसे वे ” पिछड़े युग ” की निशानी बताकर खारिज कर देते हैं ।

हम यह भूल जाते हैं कि हर भाषा का विकास एक विशिष्ट सांस्कृतिक परिवेश में होता है । अतः भाषा की यह नियति बन जाती है कि वह केवल भाषा न रहकर अपनी संस्कृति की वाहिका बने । अंग्रेजी भी ‘ अंग्रेजियत ‘ की संवाहिका है । इसीलिए अंग्रेजी अपनाने के बाद हम रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी , गाँधी जयंती, नेहरू जयंती जैसी ” जन्मदिन ” मनाने की अपनी परम्परा भूलकर परिवार में जन्मदिन नहीं, ” बर्थ-डे ” मनाते हैं और इसके लिए सारी भारतीय मिठाइयों को धता बताकर अंग्रेजी मिठाई ” केक ” लाते हैं । उसे भी उसी तरह काटते हैं जिस तरह अंग्रेजों के यहाँ काटा जाता है और फिर अनिवार्य हो जाता है अंग्रेजी में ” हैपी बर्थ डे टु यू ” गाना तथा एक का जूठा टुकड़ा दूसरे को खिलाना । हमारे यहाँ तो हर शुभ अवसर पर दीपक के रूप में ज्योति जलाई जाती है, पर जन्मदिन जैसे शुभ अवसर पर मोमबत्ती ( ज्योति ) जलानी चाहिए या बुझानी चाहिए – इस पर हम विचार तक नहीं करते क्योंकि हमने अंग्रेजी परम्परा की ज्यों की त्यों नक़ल करना ही प्रगति की निशानी मान लिया है । जिस अंग्रेजी को कभी “ ज्ञान – विज्ञान की खिड़की “ बताया गया था, उसी खिड़की से आए अंधड़ ने घर का सारा सामान अस्त – व्यस्त कर दिया है, पर लोग इसे ही गति और प्रगति का पर्याय बता रहे हैं. सामान्य जन अपनी दुर्गति को भूलकर इसे ही अपनी सद्गति मानने के लिए विवश हो गया है ।

3.0 भाषायी परिवर्तन में अव्यवस्था :
संविधान सभा ने जिस भाषायी परिवर्तन की इच्छा व्यक्त की, उसके लिए कोई योजना प्रस्तावित नहीं की, न बाद में सरकार ने कोई योजना बनाई । वास्तविकता यह है कि भाषायी परिवर्तन शिक्षा व्यवस्था का ही प्रतिफल होता है । अतीत में चाहे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि भारतीय भाषाएँ हों, या फारसी, अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाएँ, राजकाज में उनका प्रयोग तभी संभव हो पाया जब उन्हें शिक्षा व्यवस्था का अंग बनाया गया ; पर हिंदी के सम्बन्ध में न तो संविधान सभा ने इस ओर कोई ध्यान दिया, और न सरकार ने । भाषायी परिवर्तन और शिक्षा व्यवस्था के अन्तःसंबंधों पर ध्यान न देने का ही यह परिणाम था कि जब राजभाषा आयोग ( 1955 ) ने राजभाषा के प्रश्न को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की और अपने प्रतिवेदन के अध्याय 6 में शिक्षा व्यवस्था के लिए सुझाव दिए तो उन्हें स्वीकार ही नहीं किया गया । उन सुझावों के महत्व का आकलन पाठक आज भी कर सकते हैं । कुछ सुझाव देखिए :

3.1 देशभर के माध्यमिक विद्यालयों में हिंदी का अध्यापन अनिवार्य होना चाहिए ।
3.2 अंग्रेजी का अध्ययन ‘ समझे जाने वाली भाषा ‘ के रूप में एक साथ, एक समान, और एक रूप में होना चाहिए , साहित्यिक भाषा के रूप में नहीं ।
3.3 यदि कोई स्वेच्छया साहित्यिक अंग्रेजी पढ़ना चाहे तो एक विषय के रूप में उसकी व्यवस्था अलग से होनी चाहिए ।
3.4 उच्च शिक्षा का सामान्य माध्यम भारतीय भाषाएँ हों, अंग्रेजी नहीं ।
3.5 माध्यम का यह परिवर्तन पूरे देश में एक साथ, एक समान और एक रूप होना चाहिए।
3.6 सभी विश्वविद्यालयों में यह व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए कि जो विद्यार्थी हिंदी माध्यम से परीक्षा देना चाहें , उनकी परीक्षा हिंदी माध्यम से ही ली जाए ।
3.7 जिन वैज्ञानिक एवं प्राविधिक शिक्षण संस्थाओं में विभिन्न भाषा – क्षेत्रों के विद्यार्थी आते हैं, वहां शिक्षा का माध्यम हिंदी ही हो ।
3.8 माध्यम के इस प्रश्न को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से न जोड़ा जाए , बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की जाए, आदि ।

ऐसे उपयोगी सुझावों को स्वीकार न करने का परिणाम यह हुआ कि भाषायी परिवर्तन का प्रश्न अव्यवस्था, आलस्य और अनिश्चय की भेंट चढ़ गया । अव्यवस्थित ढंग से किए गए प्रयासों से सफलता वैसे ही दूर रहती है, फिर उसमें जब अनिश्चय भी जुड़ जाए तो करेला और नीम चढ़ा वाली बात हो जाती है । ऐसे कामों में समय, धन और श्रम का बस अपव्यय ही होता रहता है । राजभाषा हिंदी के साथ भी यही हुआ है। उदाहरण के लिए, सरकारी खर्च पर कार्यालयी समय में कर्मचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण देते – देते आधी शताब्दी से भी अधिक समय बीत गया ; पर आज हम प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारियों के आंकड़े ही दिखा सकते हैं, उनका हिंदी में किया काम नहीं । इसी प्रकार सरकार ने अरबों – खरबों रुपये खर्च करके ” पारिभाषिक शब्द ” बनवाए; पर वे शब्द ‘ पारिभाषिक शब्द संग्रह ‘ में ही मिलते हैं, सरकारी कर्मचारियों की जुबान पर नहीं, उनकी फाइलों में भी नहीं ।

4.0. हिंदी केवल बोलचाल के लिए
ऐतिहासिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से हिंदी का प्रयोग मौखिक और लिखित – दोनों ही रूपों में पूरे देश में अनेक शताब्दियों से होता आ रहा है ; पर केन्द्रीय सरकार के कामकाज में हिंदी का प्रयोग स्थगित कर देने और अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने से इस धारणा का विकसित होना स्वाभाविक ही था कि हिंदी में आप बातचीत भले ही कर लें, पर कोई चीज़ अगर लिखनी हो तो वह अंग्रेजी में ही होनी चाहिए । आज भी आप किसी भी कार्यालय में दो अफसरों को, या अफसर – मातहत को हिंदी में बात करते देख सकते हैं ; पर कागज़ पर जब उनका पेन चलेगा, तो वह अंग्रेजी में ही होगा । लेखन से हिंदी के हट जाने का एक परिणाम यह भी हुआ कि जिन लोगों ने किसी भी तरह कभी भी देवनागरी लिपि और हिंदी भाषा सीखी थी, वे उसे भूलने लगे। हिंदी सीखने – सिखाने के प्रयासों पर भी इसका असर पड़ा । जब देश को स्वतन्त्रता मिलना लगभग तय हो गया, तो प्रसिद्ध उद्योगपति टाटा ने मुंबई में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को हिंदी सिखाने की व्यवस्था यह सोचकर शुरू की कि अब सरकारी काम हिंदी ही में हुआ करेगा ; पर अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने का निर्णय होते ही उन्होंने वह व्यवस्था समाप्त कर दी ।

5.0. ऐसी भी क्या जल्दी है ? :
अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने और हिंदी का प्रयोग स्थगित करने के फलस्वरूप सरकारी कर्मचारियों में, तथा अन्य लोगों में भी ऐसी धारणा विकसित हुई कि राजनीतिक स्वतन्त्रता अधिक महत्वपूर्ण थी जो मिल ही गई, भाषायी स्वतन्त्रता कोई ऐसी आवश्यकता नहीं जिसके लिए तुरंत प्रयास किया जाए । इसके अतिरिक्त, वे यह भी सोचने लगे कि भाषायी परिवर्तन के लिए देश ने वैसी कोई तैयारी नहीं की है जैसी राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए की थी । ऐसी धारणाओं के फलस्वरूप उन्होंने यह भी मान लिया कि भाषायी परिवर्तन में समय लगेगा, और कितना समय लगेगा – यह पहले से तय नहीं किया जा सकता । इन्हीं धारणाओं का परिणाम है कि आज आधी शताब्दी से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई लोग कहते हैं कि ऐसी भी क्या जल्दी है ! ये लोग मानव स्वभाव की इस विशेषता को भूल जाते हैं कि जिस काम के लिए समय – सीमा निर्धारित नहीं की जाती , वह कभी पूरा नहीं हो पाता । राजभाषा हिंदी के साथ भी यही हुआ है ।

निष्कर्ष :
यह राजभाषा संबंधी समझौते के फलितार्थों की कोई सूची नहीं, बानगी मात्र है । संविधान सभा में सर्व-सम्मत निर्णयों की परम्परा की रक्षा के लिए हिंदी को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है । संभवतः संविधान सभा ने यह भी अनुभव किया कि राजनीतिज्ञ इस समस्या को ठीक से हल नहीं कर पा रहे हैं । इसलिए उसने राजभाषा के रूप में हिंदी लागू करने के लिए निर्धारित 15 वर्ष की अवधि के दौरान दो बार भारतीय भाषाओं के विद्वानों को लेकर ” राजभाषा आयोग ” गठित करने के लिए कहा था ; पर इस मर्म को न समझ पाने के कारण हमने यह प्रश्न पूरी तरह राजनीतिज्ञों के हवाले कर दिया । उसी का परिणाम आज हमारे सामने है ।

प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में राजभाषा हिंदी के प्रति अपने दायित्व का बोध कराने वाले अनेक आयोजनों के बावजूद हम अंग्रेजी की छाँव में चलते – चलते गंतव्य से दूर, बहुत दूर, बहुत ही दूर निकल आए हैं । अतः आज उस अलख को जगाने की आवश्यकता और भी अधिक अनुभव हो रही है जो सांस्कृतिक जागरण काल और स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान देखी थी । उसमें जितना महत्व बड़े – बड़े नेताओं का था, उतना ही महत्व, बल्कि एक अर्थ में उससे भी अधिक महत्व उन कार्यकर्ताओं का था जो अपने मार्गदर्शी नेताओं की बात मानकर उनकी शिक्षाओं का पालन कर रहे थे । नींव के पत्थर तो ये अनाम लोग ही थे । हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाने के लिए आज वैसे ही समर्पित निष्ठावान कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है ।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz