लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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दिखार्इ दे रहा है। फिलहाल वह भले ही अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के जनलोकपाल की भावना के अनुरुप न हो, लेकिन ऐसा लगने लगा है कि सरकार लोकपाल लाना चाहती है। शायद इसलिए अन्ना की सहयोगी किरण बेदी ने कहा भी है कि सरकार लोकपाल को आगे बढ़ता देखना चाहती है।

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लोकपाल विधेयक गति पकड़ता लेकर दो कदम आगे बढी है। बजट सत्र से पूर्व केंद्रीय मंत्रीमण्डल ने लोकपाल के संशोधित मसौदे को मंजूरी देकर इस बात की तसदीक कर दी है। हालांकि अन्ना और अरविंद ने इस नए प्रारुप पर भी अपनी असहमति जतार्इ है, किंतु इस असहमति को अब लोकपाल को कानूनी जामा पहनाने के परिप्रेक्ष्य में बाधा नहीं माना जाना चाहिए। दरअसल लोकतंत्र में कानून बनाने की संसदीय कार्रवार्इ अधिकतम संभव के सिद्धांत पर आधारित होती है और किसी भी कानून के अमल में आने के बाद उसमें संशोधन की प्रकि्रया भी जारी रह सकती है। इस लिहाज से विपक्ष को अब यह जरुरी हो जाता है कि जो भी संभावित लोकपाल आकार लेने जा रहा है, उस पर अंकुश लगाने का प्रयास न करे। यदि कालांतर में राजग या अन्य किसी गठबंधन की सरकार केंद्र में सिंहसनारुढ़ होती है तो वह इसमें और कड़े कानूनी उपाय करने के लिए स्वतंत्र है। फिलहाल संसद की चयन समिति का यह प्रारुप लोकपाल के संदर्भ में विभिन्न राजनीतिक दलों के विचार-मंथन से निकली अधिकतम साझा सहमति है। लिहाजा इस संभावना को नकारना गलत होगा।

केंद्रीय मंत्रीमण्डल की स्वीकृति के बावजूद लोकपाल के इस प्रारुप को पहले राज्यसभा में पेश करना होगा। यदि यह विधेयक राज्यसभा से पारित हो जाता है तो इसे लोकसभा से मंजूर कराना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति इसे कानूनी रुप देने की अंतिम मोहर लगाएंगे।सरकार नए प्रारुप के सिलसिले में दावा कर रही है कि उसने संसदीय चयन समिति द्वारा सुझाए 16 में से 14 शशोधन स्वीकार लिए हैं। संसदीय समिति एक तरह से संसद का ही लघु स्वरुप होती है, क्योंकि इसमें सभी राजनीतिक दलों के सदस्य भागीदार होते हैं। इसलिए 16 में से 14 बिंदुओं पर सहमति बन जाना इस बात का संकेत है कि लोकपाल पर अधिकतम एवं संभावित राजनीतिक सहमति बन चुकी है। अन्ना हजारे की असहमति को भी अन्यथा नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह उन्हीं के नैतिक दबाव का प्रतिफल है कि लोकपाल कानूनी रुप में आकार लेता दिखार्इ दे रहा है।

जिन दो बिंदुओं पर एकराय नहीं बन पार्इ है, उनमें एक तो राजनीतिक दलों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना है, दूसरे सीबीआर्इ को सरकार के अधीन रखना है। प्रधानमंत्री कुछ शर्तों के साथ लोकपाल के दायरे में होंगे। हालांकि दूसरे देशों को बतौर मिसाल लें तो प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में रखा जा सकता था। आखिरकार प्रधानमंत्री भी एक ‘लोक सेवक’ ही होते हैं। जापान में हर दूसरे साल एक प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चलता है। अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन पर भी मुकदमा चला था। भारत में भी बोफोर्स तोपों की खरीदी-बाबत राजीव गांधी और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को खरीदकर अल्पमत सरकार को बहुमत में लाने के संदर्भ में पीवी नरसिंह राव पर अदालती कार्रवार्इ हुर्इ थी। लोकतंत्र में किसी व्यकित को महज इस आधार पर अभियोजन से छूट मिलना तार्किक बात नहीं है कि वह किसी राष्ट्रीय या संवैधानिक गरिमा से जुड़े पद पर पदासीन है। दरअसल संविधान राष्ट्रपति और राज्यपालों को तो अभियोजन से छूट देता है, लेकिन किसी ऐसे व्यकित पर यह सिद्धान्त लागू नहीं होता जो नियमित सरकारी कार्यों को अंजाम देने की दृष्टि से आदेश जारी करते रहते हों।

हालांकि इस मसौदे की यह खासियत है कि इसके प्रारुप में प्रधानमंत्री को कानून से उपर नहीं माना गया है। लोकपाल का भय प्रधानमंत्री पर भी रहेगा। प्रधानमंत्री को कुछ मामलों में इसलिए किसी कानून की सीमाओं से परे रखने की जरुरत है क्योंकि राष्ट्र की संप्रभुवता व अखण्डता से जुड़े हरेक नीति सम्मत निर्णय को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। ऐसे मुददे इतने गोपनीय होते हैं कि उन पर संसद को भी सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। ये मुददे सूचना के अधिकार के दायरे से भी बाहर हैं। इन मुददों में खासतौर से रक्षा, विदेश और परमाणु उर्जा से जुड़े मुददे आते हैं। हालांकि डा मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने पर अपनी सहमति जतार्इ थी, लेकिन कांग्रेस राजी नहीं हुर्इ। विपक्षी दल भी पूरी तरह प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने पर अपनी असहमति जता चुके है। ऐसे में चयन समिति ने प्रधानमंत्री पर लगाम लगाकर उनके मंत्री मण्डल के सहयोगियों और प्रशासनिक अधिकारियों को यह संदेश जरुर दिया है कि वे यदि कदाचार अपनाते हैं तो लोकपाल उन्हें बख्शेगा नहीं ?

सीबीआर्इ को पूरी तरह लोकपाल से मुक्त रखा गया है। हकीकत तो यह है कि कोर्इ भी दल सीबीआर्इ को लोकपाल के मातहत रखना नहीं चाहता ? क्योंकि सत्ता की कमान हाथ आने पर और गठबंधन की सत्ता होने पर यदि संतुलन डगमगाता है तो सभी दल सीबीआर्इ का इस्तेमाल दुरुपयोग की हद तक करना चाहते हैं। इसलिए न्यायालय, नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक और निर्वाचन आयोग की तरह सीबीआर्इ को पूर्ण स्वायत्त बनाने के पक्ष में कोर्इ भी राजनीतिक दल नहीं है। यहां सीबीआर्इ को पूर्ण स्वायत्त बना देने से एक आशंका यह भी उत्पन्न होती है कि यह संस्था कहीं निरकुंश न हो जाए ? क्योंकि अंतत: सीबीआर्इ की कमान भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी ही प्रतिनियुकित पर आकर संभालते हैं। और पुलिस सेवा को मानवीय चरित्र में ढालने की दृष्टि से इसमें सुधारों की बहुत ज्यादा जरुरत है। इस बाबत सीबीआर्इ के ही नहीं देश के सभी लोकसेवकों को आत्ममंथन करने की जरुरत है कि वे भी मंत्री व सांसदों की तरह सत्य, निश्ठा और बिना किसी भेदभाव व दबाव के काम करने की शपथ लेकर अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं। इसलिए इस वचन का पालन करना उनका प्रमुख दायित्व है। यदि वे किसी दबाव में काम करते हैं तो यह ‘कर्मचारी आचरण संहिता की भी अवज्ञा है। लिहाजा सीबीआर्इ के अधिकारी अपना आत्मवलोकन करते हुए किसी दल विशेष की हित चिंता की बजाय देश हित को महत्व दें तो अच्छा है ? लोकपाल को सीबीआर्इ अधिकारियों के तबादले करने और सीबीआर्इ निदेशक की नियुकित से भी दूर रखा गया है। इससे लोकपाल निर्विवाद व निश्पक्ष रहेगा। हालांकि लोकपाल को यह अधिकार जरुर दिया जाना चाहिए कि सीबीआर्इ अधिकारी यदि किसी गंभीर मामले की जांच में सलंग्न है तो उसे बिना लोकपाल की अनुमति के न हटाया जाए। क्योंकि ऐसा अक्सर होता है कि जब कोर्इ अधिकारी र्इमानदारी से जांच करते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंच रहा होता है तो राजनीतिक दबाव के चलते उसे हटा दिया जाता है। समिति ने सीबीआर्इ के काम में इसे आंतरिक हस्तक्षेप मानते हुए लोकपाल को इस अधिकार से वंचित करके शायद ठीक नहीं किया ? इस मुददे पर संसद में बहस के समय पुनर्विचार किया जा सकता है।

प्रस्तावित प्रारुप में आरोपी अधिकारी – कर्मचारी को अपना पक्ष रखने के दो अवसर दिए गए हैं। यह प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत भी है कि जिस व्यकित के विरुद्ध जांच की जा रही है, उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने का यह मतलब कतर्इ नहीं है कि आरोपी को सुना ही न जाए। लेकिन यदि भ्रष्टाचार उपलब्ध कराए दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृश्टया सही पाया जाता है अथवा आरोपी रंगे हाथों रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, तो इतना तो तत्काल प्रभाव से कदम उठाने की जरुरत है कि आरोपी को मौजूदा पद से मुक्त कर उसे किसी अन्य कार्यालय में आसंजित कर दिया जाए। जिससे आरोपी एक तो सबूतों को नष्ट न कर पाए, दूसरे गवाहों को प्रभावित न कर पाए। दस्तावेजों को तत्काल सूचीबद्ध कर उन्हें सुरक्षित रखने की भी जरुरत है।

लोकपाल के ताजा मसौदे से इस प्रस्ताव को हटाने की जरुरत है कि लोकपाल शिकायत मिलने पर ही जांच करे। यदि लोकपाल को खबरपालिका के जरिए भी जानकारी मिलती है तो उसे संज्ञान में लेने की जरुरत है। न्यायपालिका और कार्यपालिका जब किसी मामले को खबरों में आने के बाद स्वमेव निगरानी में ले सकते हैं तो लोकपाल क्यों नहीं ? राजस्व अदालतें तो जमीन-जायदाद से जुड़े मामले भी स्वमेव निगरानी में ले लेते हैं, तब लोकपाल को वंचित क्यों रखा जा रहा है ? लोकपाल को खबर के आधार पर मामला संज्ञान में लेने की स्वतंत्रता मिलती है तो इससे भ्रष्टाचार भय व्याप्त होगा। संशोधित लोकपाल विधेयक में लोकायुक्त को केंद्रीय कानून से अलग रखने का प्रावधान किया गया है। मसलन लोकायुक्त की नियुक्ति राज्य सरकारें करने के लिए स्वतंत्र होंगी। राज्यों के संघीय ढांचें की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह उपाय जरुरी है। लेकिन यहां यह शर्त लगाने की जरुरत है कि जिस तरह से केंद्रीय लोकपाल का चयन प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष करेंगे, उसी तर्ज पर प्रांत के लोकायुक्त की नियुकित राज्य सरकारें करेंगी। इस प्रकि्रया से एक तो लोकपाल निर्विवाद रहेगा, दूसरे उसे इकतरफा फैसला लेने के लिए राज्य सरकारें बाध्य नहीं कर पाएंगी। इसमें एक शर्त यह भी जोड़ी जाए कि न्यायाधीश अथवा प्रशासनिक अधिकारी को सेवानिवृतित के कम से कम तीन साल बाद इस पद पर नियुकित की पात्रता हासिल हो ? जिससे उन पर किसी राजनैतिक दल के हित साधने के बदले में इस नियुकित को पुरस्कार मानने की आशंका उत्पन्न न हो। सरकारी सहायता प्राप्त स्वयं सेवी संगठनों और राजनीतिक दलों को लोकपाल के दायरे में लाने की जरुरत थी, जिससे इनके अमर्यादित कृत्यों पर अंकुश लगता। बहरहाल यदि अब लोकपाल का आना संभव हो रहा है, तो उसे अटकाने की जरुरत नहीं है। संभावित शशोधन तो बाद में भी होते रहेंगे।

 

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