लेखक परिचय

सत्येन्द्र गुप्ता

सत्येन्द्र गुप्ता

M-09837024900 विगत ३० वर्षों से बिजनौर में रह रहे हैं और वहीं से खांडसारी चला रहे हैं

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shamतेरे जाने के बाद ही शाम हो गई

शब् पूरी अंधेरों के नाम हो गई !

मैक़दे की तरफ बढ़ चले क़दम

ज़िंदगी ही फिर जैसे ज़ाम हो गई !

आँखों से आंसु बन बह गया दर्द

उम्मीद मेरी मुझ पे इल्ज़ाम हो गई !

वक्त का फिर कभी पता नहीं चला

रफ़्ता रफ़्ता उम्र ही तमाम हो गई !

जिंदगी में ख़ुशी जितनी भी थी

वक्त के हाथों सब नीलाम हो गई !

चल कहकहों में दफ़्न कर दें अब

वह खामुशी जो सरे आम हो गई !

 

“ना ” को जिंदगी से निकाल दें

दुनिया को इक नई मिसाल दें !

जिंदगी एक पिच की तरह है

गेंद को अपनी बड़ा उछाल दें !

बिन पगलाए कुछ न मिलेगा

हिम्मत जज़्बे में अपने उबाल दें !

हर काम के लिए ज़िद ज़रूरी है

बेचारगी को दिल से निकाल दें !

हंसेगा कोई मज़ाक बनाएगा

उनकी नजरों को नए सवाल दें !

एवरेस्ट भी फ़तेह कर लोगे तुम

ख़ुद का ज़ुनून बाहर निकाल दें !

प्लेयर तुम चियरलीडर भी तुम

अपने फ़न को बस नये क़माल दें !

 

जब तक बड़ों का सरमाया है

हर तरफ़ रहमतों का साया है !

जब तक दुआएं उनकी साथ हैं

दिल तब तक नहीं घबराया है !

क़िस्मत से ज़्यादा नहीं मिलता

वक़्त ने हमको यह सिखलाया है !

उम्र गुज़र गई यही सोचते हुए

कौन अपना है, कौन पराया है !

यक़ीन यह है वह बेवफ़ा नहीं है

दिल में ख्याल क्यूँ फिर आया है !

सर्दी गर्मी बर्दाश्त नहीं होती अब

बन गई जाने कैसी यह काया है !

थकान का तो नामो निशान नहीं

जब से पयाम उन का आया है !

तेरे हाथ से बनी चाय का स्वाद

मुझे तुझ तलक़ खींच लाया है !

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