लेखक परिचय

महेश दत्त शर्मा

महेश दत्त शर्मा

जन्म- 21 अप्रैल 1964 शिक्षा- परास्नातक (हिंदी) अनेक प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में महेश दत्त शर्मा की तीन हज़ार से अधिक विविध विषयी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपका लेखन कार्य सन १९८३ से आरंभ हुआ जब आप हाईस्कूल में अध्ययनरत थे। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से आपने 1989 में हिंदी में एम.ए. किया। उसके बाद कुछ वर्षों तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए संवाददाता, संपादक और प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया। आपने विभिन्न विषयों पर अधिकारपूर्वक कलम चलाई और इस समय आपकी लिखी व संपादित की चार सौ से अधिक पुस्तकें बाज़ार में हैं। हिंदी लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आपने अनेक पुरस्कार भी अर्जित किए, जिनमें प्रमुख हैं- नटराज कला संस्थान, झाँसी द्वारा लेखन के क्षेत्र में 'यूथ अवार्ड', अंतर्धारा समाचार व फीचर सेवा, दिल्ली द्वारा 'लेखक रत्न' पुरस्कार आदि। संप्रति- स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, संपादक और अनुवादक।

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हाल ही में चीन ने एक बच्चे की नीति के त्याग की घोषणा की है; इस नीति से भविष्य में उसे जनसांख्यिकी, भ्रष्टाचार, सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियों से निबटने में मदद मिलेगी; उसे ऐसी उम्मीद है। जब चीन ने एक बच्चे की नीति के क्रमिक परित्याग की घोषणा की तो यह खबर दुनिया भर में सुर्खी बन गई क्योंकि उसकी यह नीति दशकों से देशवासियों के लिए मुसीबत बनी हुई थी और लाखों परिवार भाई, बहन, मौसा, मौसी, चाचा, चाची इत्यादि जैसे रिश्तों से महरूम हो गए थे।
जहाँ ज्यादातर टीकाकार इसे एक कठोर और कालभ्रमित नीति का लंबे समय से अपेक्षित निधन बता रहे हैं, वहीं बीजिंग इसे दूसरे तरीके से दिखाने की कोशिश कर रहा है। बीजिंग का कहना है कि यह चेहरा बदलने की कवायद नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी सुधार है, जिसका मूल उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि में तेजी से होती गिरावट में सुधार करना है। साथ ही इस बदलाव के पीछे राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नवीनतम मकसद भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम चलाना भी है। बीजिंग के लिए यह नीति आर्थिक और स्थायित्व के मुद्दों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके सुधार उसके लिए बहुमुखी वरदान की तरह साबित होंगे, उसे ऐसा यकीन है।
जनसंख्या वृद्धि और राजनीतिक भ्रष्टाचार
1960 के दशक के मध्य में जहाँ चीन की प्रजनन दर प्रति महिला 6.16 से अधिक थी, वहीं वर्ष 2012 में यह गिरकर 1.66 रह गई जो प्रतिस्थापना दर 2.1 से काफी नीचे है। यह गिरावट एक बच्चे की नीति को सख्ती से लागू करने के कारण हुई। इस दौरान लगभग 33 करोड़ 60 लाख गर्भपात बलपूर्वक किए गए और 19 करोड़ 70 लाख नसबंदी आॅपरेशन हुए। इस नीति ने पूरे चीन में एक छद्म अर्थव्यवस्था कायम कर दी; जिसके साये में गर्भपात क्लिनिकों, जाली जन्म प्रमाणपत्र देनेवालों और नकली मेडिकल रिकाॅर्ड रखनेवाली संस्थाओं ने जमकर चाँदी काटी। साथ ही अवैध गर्भनिरोधकों और गर्भपात की गोलियों, चोरी-छिपे गर्भावस्था परीक्षण, मानव अंडाणुओं की कालाबाजारी के गिरोह तथा कुख्यात भ्रूण लिंग परीक्षण का देश भर में जाल फैल गया। इस कोढ़ में खाज का काम रिकाॅर्ड देखनेवाले अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन ने इन्हें प्रश्रय देकर और इनसे मोटी रिश्वत वसूल कर किया। इस प्रकार चीन की यह सबसे अलोकप्रिय नीति भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बन गई। अब जाकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस नीति और इससे देश में पनपते भ्रष्टाचार पर आँखें खुली हैं और अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के पीछे के अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बयान दिया कि वे किसी भी भ्रष्टाचारी को नहीं छोड़ेंगे।
दशकों से स्थानीय अधिकारियों ने जन्म-कोटा नीति को सख्ती से लागू किया है और कानून का उल्लंघन करनेवालों की संपती जब्त करने के साथ ही इसकी आड़ में ऊपर की खूब कमाई की है। नतीजन सरकार ने भ्रष्टाचार के स्रोत पर ही प्रहार करने का प्रयास किया है।
एक बच्चे की नीति और सुरक्षा-चिंता
एक बच्चे की नीति के नतीजतन, सरकार का अनुमान है कि लगभग डेढ़ करोड़ ‘छद्म नागरिक’ सरकारी अधिकारियों को रिश्वत खिलाकर बिना आधिकारिक दस्तावेजों के देश में रह रहे हैं। चीन की सख्त निवास नीति के तहत लाखों दस्तावेजविहीन लोगों का देश में रहना खतरे से खाली नहीं है और चीन इस जोखिम को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।
यही नहीं, हालाँकि ग्रामीणों को दूसरा बच्चा पैदा करने की अनुमति प्राप्त थी, अगर पहला बच्चा लड़की हो, लेकिन तब भी लंबे समय से ग्रामीण इलाकों में भी एक बच्चा नीति सख्ती से लागू रही। इसके चलते पैसेवाले लोग भ्रूण परीक्षण कराकर मनचाही संतान पैदा करने लगे तथा और अमीर होते गए। वहीं इस नीति के कारण पहले से तनाव झेल रहे ग्रामीण आक्रामक होने लगे और चीन ‘ग्रामीण’ और ‘शहरी’ में बँट गया। यह ‘बँटा हुआ रिश्ता’ घरेलू अस्थिरता की एक प्रमुख वजह रहा, जिसे जेहन में रखकर ही बीजिंग अपनी एक बच्चे की नीति को बदलने को मजबूर हुआ।
चीनी परिवारों में पारंपरिक रूप से लड़कों की प्रबल चाह रही है, फलतः देश भर में बड़े पैमाने पर लिंग आधारित गर्भपात होते आए हैं और देश में विगत चार दशकों से अधिक से जारी एक बच्चे की नीति के कारण लिंगीय संतुलन बुरी तरह से विकृत हो गया है। बीजिंग के लिए यह भी एक बड़ी चिंता की बात रही। लिंग आधारित गर्भपात के कारण सरकार टाइमबम के मुहाने पर आ खड़ी हुई है। लाखों युवकों को दुल्हनें नहीं मिल रहीं। करीब 4 करोड़ युवतियों की कमी दर्ज की गई है। लाखों यौन कुंठित एकाकी युवक अशांति की आग में झुलस रहे हैं। लोग ये जानते हैं कि उनकी इस दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं और अगर इसका राजनीतिकरण हो गया तो बीजिंग के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा होगा, सरकार इससे आगाह है।
नीति सुधार के पीछे के कारण
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की वैधता को मजबूत बनाने के मद्देनजर चीनी केंद्र सरकार ने एक बच्चे की नीति में सुधार करके अपने व्यापक हितों को साधने का प्रयास किया है; स्वयं को भ्रष्टाचार विरोधी दिखाने का, जन-असंतोष दूर करनेवाली तथा आर्थिक संदर्भ में व्यापक सुधार कार्यक्रम तैयार करनेवाली सरकार होने का। सरकार को भरोसा है कि इस सुधार नीति से वह अन्य मुद्दों के साथ-साथ संस्थागत भ्रष्टाचार पर भी काबू पा लेगी। इसके अलावा नीति में छूट देकर सरकार ने यह भी जताने का प्रयास किया है कि वह उत्तरोत्तर सामाजिक-आर्थिक चरणों के माध्यम से चीन को बदलते माहौल के अनुकूल ढालने को कृत संकल्प है। माओ के बाद अब सीसीपी ने जनता को यह जताने की कोशिश की है कि विकास की नीति बनाने का तब तक कोई मोल नहीं है जब तक कि वह व्यावहारिक न हो।
सरकार जता रही है कि एक बच्चे की नीति का पोषण कामगारों की बढ़ती तादाद और अशांत माहौल को नियंत्रित करने के लिए किया गया था। अब चूँकि चीन खपत आधारित आर्थिक दिशा में कदम रख चुका है, इसे अपने आगामी विकास माॅडल के ईंधन के लिए एक स्थिर वृद्धि दर की जरूरत है, ताकि उपभोक्ताओं की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित करने में आसानी हो। नतीजतन उसने एक बच्चे की नीति में सुधार करके एक ऐसा मरहम पेश किया है, जो उसके अनुसार उसकी प्रणालीगत सभी चुनौतियों का उपचार करने में सक्षम है।
-महेश दत्त शर्मा

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1 Comment on "एक बच्चे की नीति बदलने की चीनी मजबूरियाँ"

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Himwant
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चीनी दुखी है. उनकी भाषा से ताऊ, चचा, फुवा जैसे शब्द विलुप्त हो गए है. अब वे रोबोटिक्स पर जोड़ तोड़ से काम कर रहे है. हो सकता है की प्रतिकूलता उनकी अनुकूलता में बदल जाए.

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