लेखक परिचय

सेराज खान 'जासम'

सेराज खान 'जासम'

जन्मस्थान- देवरिया, उत्तर प्रदेश, भारत

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gilrsजून का महीना था, सुबह के दस बजे होंगे| हवाओं मे इतनी गर्माहट थी मानो भट्टे से गर्म करके भेजी जा रही हो| खिड़की के सामने की दीवार पे एक पुरानी तस्वीर लगी थी तस्वीर दो कील वाली थी जिसकी एक कील गिर गयी है और तस्वीर एक कील पे दोलन गति कर रही थी| खिड़की से आने वाली धूलयुक्त वायु से तस्वीर बहुत गंदी हो गयी थी ये मुश्किल से ही पता चल रहा था कि तस्वीर मे एक माँ अपने बच्चे को गोद मे सुला रही है|

कमरे मे एक तरफ आठ साल की छोटी बच्ची लेटी है,  इतनी भीषण गर्मी मे भी वह रजाई मे लिपटी है, उसकी माँ हबीबा उसके सिरहाने बैठी उसकी सिर की पानी पट्टी बदल रही है| वह बहुत परेशान है,वह बार-बार दलानी  मे जाकर बाहर  झाक  रही है वह मोबीन की बाट देख रही है जो बंगाली को लेने गया है किन्तु अभी तक नहीं आया| तभी मोबीन बंगाली को लेकर आया| वह एक झोलाछाप डॉक्टर है और हल्की-फुल्की हाथ की सफाई सीख कर गांव के लोगो का इलाज करता है| बंगाली को देखकर हबीबा बोली डॉक्टर साहब बहिनी की तबियत बिगड़ती ही जा रही है, कल रात से आनाज का एक कवर नहीं खाया,बुखार के मारे पूरा देह उबाल रहा है
बंगाली ने उसके सिर से रजाई हटाई और उसका सिर टोया वह तवे सा गर्म था,फिर उसने एक सुई आबिदा के कमर मे लगाई और चार खुराक दवा हबीबा को देते हुए बोला ये चार खुराक दवा लो चार-चार घंटे के अंतराल पे खिलाते रहना और हा कल तक बच्ची को सदर लेकर चले जाओ वरना कुछ ना होगा| ये सुन हबीबा फफक पड़ी और बोली डॉक्टर साहब ऐसा ना कहे मोबीन के अब्बा के गुजरने के बाद अब तो बस अपने  बच्चो का ही मुंह देख के जी रही हूं| डॉक्टर पुनः बोला तो क्या झूट बोलू, अब मुझे सत्तावन रुपये दे दो मुझे जाना होगा दूकान खुला छोड़ कर  आया हू| हबीबा ने आसूँ पोछा और कोने मे रखी पुरानी बक्से से दस-दस के पांच नोट ले कर बंगाली को दी| बंगाली उसे लेने से मना कर दिया और और बोला-“मै दुकान पे आने पर एक  पैसे कम ना लेता और तुम मुझे अपने घर बुला कर रुपये कम देती हो पिछले बार भी तुमने चार रुपये कम दिये थे और इस बार भी सात रुपये कम दे रही हो|”

“साहब बच्ची दूकान जाने के काबिल न थी|”

“तो रुपये मे कटौती क्यो करती हो|”

“साहब बस इतना ही है अगली बार से कम ना दूंगी|”

बहुत चिरौरी करने पर बंगाली रुपये लेकर बड़बड़ाते हुए चला गया|

बंगाली के जाने के बाद हबीबा बैठ कर रोने लगी,कितनी अभागिन है ये अभी कुछ ही दिनो पहले पति का स्वर्गवास हुआ और अब बेटी का यह हाल से वह अंदर से घायल हो  गयी है, उसका आंचल आंसुओ से तर है| मोबीन बाहर नीम की छाव मे बैठा था| इस बेचारे ने तो अभी यौवन की सूरत तक न  देखी थी की बाप का हाथ ने उंगली छोड़ दी| आज जिस उमर में बच्चे खेलते है उस समय ये हालात  से लड़ रहा है| तभी तो उसके चेहरे की चमक हिल गई है|

शाम हो आई मोबीन  नीम की छाव मे बैठा था कि दूर से उसकी दादी आती दिखी लाठी टेकते, सिर पे सूखे खीरे कि टोकरी लिये आ रही है| मालूम होता है आज भी खीरे नहीं बिके है, पसीने से उसकी साड़ी का आंचल भीग गई है, चेहरे को नीचा किये हुए अपने पग पथ पर बढ़ाते हुए चली आ रही है| दिन भर बेचारी चौराहे पर बैठी रही आते जाते पथिक को देखती रही कि कोई उसके खीरे लेले  किन्तु सिवाय निराशा के उसने किसी को नहीं पाया| जवान पुत्र को खोने का गम तो अभी गया नहीं था किन्तु घर कि जिम्मेदारी से दब कर वह खीरे बेचती थी| घर आकर उसने अभी टोकरी  भी न उतरी थी कि पूछ पड़ी –“कैसी तबियत है आबिदा कि का बंगाली आया?” मोबीन सिसकते हुए ही बोला –“आया था लेकिन अभी भी तबियत नासाद ही है|” बुढिया घर मे गई, उसे देख हबीबा खड़ी हो गई बुढिया उससे पूछी “क्या कुछ खाया?”| हबीबा बोली “आधी रोटी खाई है लेकिन जब से खाई है तब से तीन बार उल्टी कर चुकी है|”आगे उसने ये भी बताया कि बंगाली ने आबिदा को सदर ले जाने को कहा है| बुढिया ने हबीबा का सिर टोया वह जल रहा था बुढिया बच्ची का ये हाल देख जमीन के बल बैठ गई और आबिदा का सिर सहलाते हुए बोली -”कल मैं अपने गुड़िया को सदर जरूर ले जाउंगी, कुच्छ नहीं होगा इसे, क्यो आबिदा?”

आबिदा कुछ नहीं बोली बस अपने आंसुओ से भीगे पलको को कभी माँ के तरफ करती तो कभी दादी कि तरफ| उसके इस हाल पे माँ अपना मुह दाब कर फफक पड़ी| बुढिया अपने आंचल से आंसू पोछती है और और बाहर चली आती है और बाहर से अपने पुत्रवधू को आवाज देती है| हबीबा बाहर आई बुढिया ने उससे पूछा कितने रुपये होंगे पेटी मे? हबीबा हड़बड़ा गई वह बोली रुपये तो नहीं है| वह आगे कुछ और बोलती कि बुढिया बोल पड़ी, क्या करती है तू रुपयो का  मैं खीरे बेच के रुपये लाती हूं और फिर जब भी तुमसे पूछती हूं तू हमेसा यही कहती है कि रुपये नहीं है| पहले तूने मेरे बेटे को खाया,अब क्या मुझे भी खाएगी,हबीबा अब फिर कुछ ना बोली और रोते हुए घर मे चली गई|

बुढिया लाठी टेकते सड़क पर निकल पड़ी वह खुद भी रो रही थी| वह जानती थी कि बंगाली के आने पर उसके फीस मे ही घर के बचे रुपये समाप्त हो गये होंगे लेकिन उसने भी इस भीषण गर्मी मे जलते धूप मे बैठ कर खीरे बेचे थे और अब जब रूपए की जरूरत है तो रूपए न होने की बात सुन कर वह अपने गुस्से पर काबू न कर सकी।, भीगे हुए आंखो से उसे ये भी नहीं दिखा कि उसका पैर सड़क के गड्डे मे जा रहा है वह गिरी और फिर खुद ही लाटी के सहारे उटी और खुद को साफ करते हुए आगे बढ़ गयी| वह वर्मा जी के वहा जा रही थी जहा से वह अक्सर कर्ज लेती  है,वह जानती थी कि रुपये बस वही से मिल सकते है वर्मा जी कि आभूषण कि दूकान है और वह गाव  के रईसो मे सुमार है|

बुढिया वर्मा जी के घर गई लेकिन उसे वर्मा जी के  नौकर ने बताया की वर्मा जी घर पे नहीं है वे दुकान पे गये है रात के आठ बजे  के बाद ही लौटेंगे बुढिया वही गौशाला के चौखट पे जाकर बैठ गई,और वर्मा जी के आने का इंतजार करने लगी| करीब साढ़े आठ बजे होंगे वर्मा जी अपने मोटरकार से आये और बुढिया को देखते ही बोले “का बुढिया पुराना कर्ज चुकाने आई हो क्या?”बुढिया हड़बड़ा गई वह रोते हुए बोली “मालिक मुझे फिर से कुछ रुपये की जरूरत है, मेरी पोती बहुत बीमार है ,सदर ले जाना है,घर मे एक रुपया तक नहीं की शहर जाये,दया कीजिये मालिक दया कीजिये|

“यानी फिर से तुझे  कुछ रुपये की जरूरत है|”
“हाँ मालिक मुझे कुछ रुपये फिर से उधार दे दें वरना मेरी पोती मर जायेगी|”

“पर तूने अभी पुराना कर्ज तो चुकाया ही नहीं है, जब तेरा बेटा विदेश जा रहा था तूने पच्चीस हजार रुपये दस प्रतिशत प्रति माह पे चक्रवृत्ति ब्याज पर लिया था|”

“मालिक आय का कोई साधन नहीं है खीरा-काकड़ बेच के अपने घर को चला रही हूँ”

“यही तो मै भी कह रहा हू की तू कर्ज नहीं चुका सकती, कैसे तुझे उधार दे दूं|”

बुढिया गिड़गिड़ाते हुये-“साहब”

वर्मा जी-“ठीक है मै  तुझे रुपये तो दूंगा लेकिन एक शर्त  है”

बुढिया चकित होकर -“शर्त! कैसी शर्त”

वर्माजी अपने आंख का चशमा पोछते हुये-“तू अपने खेत का नहर से सटा हिस्सा मुझे दे दे”

बुढिया गिड़गिड़ाते हुये-“मालिक उस खेत मे मेरे पुरखो की यादे बसी है,सात पुहूत से मेरा परिवार उस खेत को बो रहा है,उसकी बात न करे मालिक|”

वर्माजी-“तो फिर तुझे मै रुपये भी नहीं दे सकता|”

बुढिया-” मालिक बच्ची मर जायेगी दया कीजिये मालिक दया कीजिये|”

बुढिया रोती रही लेकिन वर्मा ने उसकी एक नहीं सुनी,और अंत मे बुढिया का खेत रेहान पे ले लिया तब जाकर उसे दो सौ रुपये दिये| बुढिया उदास मन से रुपये लेकर घर आ गयी घर पहुचते ही उसका माथा ठनक गया जब उसने देखा की आबिदा खून की उल्टी कर रही है, उसके हाथ से लाठी छूट गई और जमीन के बल नीची बैठ गई| उसने मोबीन से पूछा कब से हो रही है यह उल्टी? मोबीन सिसकते हुये बोला “आधे घंटे से सांस नहीं ली है|” बुढिया फिर बोली जाके बंगाली को बुला ला|” मोबीन अब रोते हुये बोला “गया था कह रहे है नहीं  आऊंगा, कहा पहले ग्यारह रुपये जो बाकी है उसे दो फिर चलूंगा मेरे पास तो एक फूटी कोड़ी नहीं है उसे ग्यारह रुपये कहा से देता| आबिदा की तबियत बहुत ही नाजुक हो चुकी थी, हबीबा कोने मे बैठी फफक-फफक कर रो रही थी| बुढिया ने मोबीन को सौ रुपये दिये और कहा जा पैसे कटवा लेना और उसे बुला ला| मोबीन गया बंगाली ने पैसे काटे लेकिन आबिदा को देखने नहीं आया और कहा की उसने अभी खाना नहीं खाया है,कल सवेरे ही आयेगा | मायूस होकर मोबीन नवासी रुपये के साथ घर आ गया,बुढिया ने जब देखा की बंगाली नहीं आयेगा तो उसने बंगाली की दी हुई दवा आबिदा को खिला दी |दवा पेट मे रुक तो गयी पर हालत बेचैनी भरी थी,रुक-रुक कर कई बार खून की उल्टी हो रही थी|घर मे सब भूखे-प्यासे उस खाट के आस-पास जमा थे| आबिदा की आंख अब मुश्किल से ही खुल रही थी,जाने कितने कष्ट थे उस बच्ची को| बुढिया आबिदा के सिर पे हाथ फेरते हुये बोली कल सवेरे पांच बजे ही अस्पताल चल देंगे| लेकिन आबिदा अब भी कुछ ना बोली|

रात के करीब तीन बजे थे, आबिदा को बड़ी सांसे आने लगी ,उसका दम घुटने लगा| हबीबा आनन-फानन मे उठी और उसे पानी पिलाने लगी| पानी अंदर न जा सका| दादी उसका सिर सहला रही थी और चिल्ला रही थी, हबीबा रो रही थी ,मोबीन बहन का हाथ थाम फफक रहा था| कलह की आवाज सुन कर पड़ोसी भी जुट गये थे| इसी बीच आजान हो गई और आबिदा को हर कष्ट से मुक्ति मिल गई उसे खुदा का निमंत्रण मिल गया था| मृत्यु ने दश्तक दी और वह प्रस्थान कर गई| अब किसी झोले छाप डॉक्टर की गोलिया उसे उल्टी ना करायेगी| दीवार पे लगी पुरानी तस्वीर  जो की एक कील पे अटकी थी हवा के एक झोके का साथ जमीन पे आ गिरी| उसका फ्रेम टूट गया तस्वीर अब स्पष्ट दिख रही थी किन्तु उसकी हिफाजत के लिया लगा फ्रेम अब उससे अलग हो गया था
हबीबा मूर्छित होकर जमीन पे गिरी पड़ी थी, बुढिया खाट के पार पे अपना सिर पटक रही थी, मोबीन चिल्ल्ला-चिल्ला कर रो रहा था,पर आबिदा ने सबको अलविदा कह दिया था| पूरब मे सूरज की लालिमायें छाई हुई थी किन्तु सूरज का आगमन न हुआ था मानो सूरज ने आबिदा के स्वागत मे लालिमाओ के पुष्प बिखेरे हो  हबीबा को किसी ने पानी छिड़क कर उठाया लेकिन पुत्री का मृत शरीर देख वह फिर बेहोस हो गई| परिवार का विलाप देख वहा उपस्तिथ लोगो के नयन भी आंसुओ मे डूब गये थे|

अब सूरज का उदय हो गया था| मोबीन  अब भी रो रहा था वह उन दिनो को याद कर रहा था जब वह अपने बहन के साथ खेलते-खेलते नीम के पेड़ पर चड़ जाता था लेकिन जब आबिदा नहीं चड़ पाती थी तो जोर-जोर से रोती थी लेकिन अब वह इतनी उपर जा चुकी थी की मोबीन कितना भी रोये वह आने वाली न थी| किसी ने आबिदा के उपर पड़ी रजाई हटा कर पतली चादर डाल दी| वहा उपस्तिथ लोग कई तरह के बीमारीया गिना रहे थे कोई कहता लू लगी थी बंगाली ने गलत दवा दे दी इसलिये बीमारी बढ़ गई ,कोई कहता कैंसर था,तो कोई उसकी पीली आंखे देख कर कहता पीलिया से पीड़ित थी|  मुल्ला कईम ने सुलेमान को कब्र खोदने के लिए भेज दिया इतने मे बुढिया उठी और रेहान पे रखे खेत का बचा एक सौ नवासी रुपया मुल्ला को दिया और कहा की मेहरबानी करके इन पैसे से कफन ला दे| इतना कहते ही वह जमीन पा आ गिरी|

 

बूझ गया चिराग

जब चौखट तक आया सूर्य का प्रकाश,

बज रहे थे मंदिर मे घंटे

मुल्ला दे रहा था आजन,

छोड़ के माँ का आँचल

गुड़िया चली गई वनवास,

कष्टो पे वो विजय हो गयी

मृत्यु के कितने निकट हो गयी

कोने मे पड़े थे मिट्टी के खिलौने

ताख मे था उसका किताब

होकर इन सबसे अज्ञात

गुड़िया ने कर लिया प्रवास

अपने आगन की चहक ले गयी

घर आगन की महक ले  गयी

आंखो मे आंसू दे करके

घर आंगन को सुना करके

सब कष्टो से मुक्त हो करके

गुड़िया चली गयी वनवास|

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1 Comment on "“एक सौ नवासी का कफन”"

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Prabhas Upadhyay
Guest

बहुत ही मर्मस्पर्शी , कोई शक नहीं के ये बेहतर कहानी हैं ।

ऐसे ही कुछ और कहानियो के इंतज़ार में ,

धन्यबाद

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