लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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 multi talentedबहुमुखी प्रतिभा या विशेषज्ञता  [ specialization or versatility ]

किसी भी कला मे, कला ही क्यो, साहित्य खेलकूद या किसी भी अन्य क्षेत्र मे कोई शौक अपनी रुचि से अपनाने के बाद यह प्रश्न उठता है कि उस कला की कौन सी विधा  [ genre ] और कौनसी शैली [style]को अपनाये। किसी एक को अपनाकर उसमे ही विशेष योज्ञता प्राप्त करने के लियें प्रयत्नशील रहें या ख़ुद को अन्य विधाओं और शैलियों मे भी परखने की कोशिश करें। इस बात का उत्तर दो चार शब्दों मे सीधा सीधा नहीं दिया जा सकता।  यह व्यक्ति की योज्ञता क्षमता और उद्देश्य पर निर्भर करता  है।

संगीत को ही लें तो भारतीय, कर्नाटक या पाश्चात्य शैली का कोई गायक किसी भी विधा को चुन सकता है जैसे भजन, ग़ज़ल शास्त्रीय  सुगम संगीत या रौक आदि। संभवतः कोई गायक अपनी पहली पसन्द की विधा और शैली अपनायेगा यदि उसे लगता है वह कोई दूसरी विधा मे भी अच्छा गा सकता है तो उसकी कोशिश करेगा, इस तरह उसकी बहुमुखी प्रतिभा का विकास होगा। कई चीज़ों मे एक साथ हाथ डालने से यदि उसकी कला की गुणवत्ता घटती है तो उसे एक ही विधा मे रहकर उसमे ही महारथ प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिये।  संगीत की तरह नृत्य, चित्रकला, अभिनय और साहित्य मे भी यही बात लागू होती है। विविधता  का विस्तार करने की वजह से गुणवत्ता पर असर पड़े तो उसे सीमित रखना ही उचित है।   विविधता हो ही नहीं तो एकरसता आ सकती है।

कला की तरह ही भाषा और साहित्य मे भी अनेक विधायें और शैलियाँ होती हैं।सभी लेखक और कवि अपनी अपनी अभिरुचि के अनुसार लिखते हैं। कुछ लोग एक से अधिक भाषाओं पर समान अधिकार रखतें हैं और उनमे लिख सकते हैं।भाषाई विविधता वाले लेखक या कवि कम ही होते हैं, होते भी हैं तो मख्य रूप से एक ही भाषा मे लिखते हैं कभी कभी बदलाव के लियें दूसरी भाषा मे भी लिख लेते हैं।

एक ही भाषा मे लिखने वाले साहित्यकारों मे कोई कहानी, कोई उपन्यास, कोई आलेख और निबन्ध और कोई व्यंग लिखते है।इन सबको लिखने के लियें वो अनेक शैलियों का प्रयोग कर सकते हैं।कवि भी कुछ केवल छन्दमुक्त लिखते हैं और कई छन्दबद्ध। कई कवि अपने लेखन की परधि मे केवल एक रस रखते हैं, उनकी रचनाओं मे अधिकतर नौ मे से एक ही रस नज़र आता है। श्रंगार रस के कवि तो कभी कभी अपने को मिलन या वियोग पक्ष मे ही सीमित कर लेते हैं। कुछ केवल भक्ति रस मे रचनायें लिखते हैं और ईश चरणों मे समर्पित करते हैं। कुछ कवि  और लेखक एक ही या मिलते जुलते विषयों की सीमा मे बंधे रहते हैं।

अपनी योज्ञता और क्षमता के अनुसार हर साहित्यकार को अपने लेखन मे थोड़ी विविधता तो लानी चाहिये नहीं तो स्वयं साहित्यकार और पाठक भी एक रसता महसूस करने लगेंगे।एक विधा या शैली से यानि अपने सुरक्षित क्षेत्र  (comfort zone) से  निकलकर दूसरी विधाओ में कोशिश करना बहुत अच्छा है परन्तु अपनी  रचनाओं का स्वय आकलन करके अपनी सीमाओं को समझना भी ज़रूरी है।

विविधता लाने के प्रयास मे संभव है रचना की गुणवत्ता मे कुछ कमी आये, पर वह धीरे धीरे अभ्यास से सुधर जायेगी, पर नया प्रयोग सही नहीं बैठ पाये तो उसे छोडकर अपनी पहली रुचि पर वापिस जाकर उसमे ही अपनी योज्ञता को बढ़ाना सही होगा। सब लोग सब कुछ नहीं कर सकते, हर व्यक्ति अपनी योज्ञता और सीमाओं की परिधि मे ही अच्छा काम कर सकता है।

कला या साहित्य व्यावसायिकता से जुडा हो तो उसका गणित लगाना भी ज़रूरी होता है।स्वान्तः सुखाय लिखने वाले लेखक और कलाकारों को भी दर्शकों और पाठकों की जरूरत होती है।पाठकों और दरर्शकों का नज़रिया समझ कर समय के साथ अपनी शैली मे परिवर्तन लाने पड़ते हैं,परन्तु जो कलाकार पूरी तरह व्यावसायिकता का गणित लगाकर कुछ रचते हैं उनकी कला कहीं पीछे छूट जाती है।

मानिये कि  बहुत महनत के बाद यदि कोई व्यंगकार समाचार पत्र या पत्रिकाओं के लियें नियमित रूप से लिखने लगता है, तो उसके प्रशंसको का एक समूह तैयार हो जाता है  और वह एक ‘बैंड’ बन जाता है। उसके नाम से उसकी रचनाये पढ़ी जाती हैं बीच मे यदि उसकी रचनाओं का स्तर थोड़ा गिर भी जाये तो उसकी लोकप्रियता कम नहीं होती परन्तु बहुत दिनो तक एक ही विधा मे लिखते लिखते पुनरावृतियाँ होने लगती हैं। ऐसे मे यदि व्यंगकार अपनी छवि बदलना चाहे , किसी अन्य विधा मे लिखना चाहे, तो वो भी इतना आसान नहीं होता।  उसके प्रशंसक नई छवि को स्वीकार करें यह ज़रूरी नहीं है।  छवि बदलने मे  कभी गिरना पड़े तो कोई हर्ज नहीं है, गिरना गिरकर उठना और थोड़ी सी राह बदल कर चल देना ही जीवन है। व्यावसायिक गणित के साथ गुणवत्ता बनाये रखकर रचनाओं मे कुछ नया प्रयोग करते रहना ही अच्छी बात है।

जिन लोगों की कला या साहित्य सृजन व्यावसायिक स्तर पर न उतरा हो , उन्हे कुछ दर्शक या पाठक मिल रहे हों तो उन्हे तब तक  अपने सुरक्षित क्षेत्र(comfort zone) से नहीं निकलना चाहिये, जब तक वह उसके लियें मन से तैयार न हों, जब तक दूसरी विधा को अपनाने का जज़्बा न पैदा हो।

बहुत से  कलाकार आरंभ विविधता से करते हैं पर यदि किसी एक  क्षेत्र मे अधिक सफलता मिलने लगती है तो उसी को अपनाकर विशेष योज्ञता प्राप्त करते हैं। इसके वपरीत कभी कभी एक विधा मे सफल होकर दूसरी विधाओं का  ज्ञान प्राप्त करके, उनमे भी लोग आगे बढ़ जाते हैं।

टी. वी. पर आने वाले संगीत और नृत्य के प्रतियोगिता वाले कार्यक्रमों मे एक विधा या अनेक विधायें अक्सर बहस का मुद्दा होता है पर निष्कर्ष कभी नहीं निकलता क्योंकि दोनो के अपने अपने लाभ हैं। कलाकार हो या साहित्यकार उसे अपनी सीमाओं और क्षमताओं   के अनुसार अपनी दिशा निर्धारित करनी पड़ेगी,  इसके लियें कोई सार्वभौमिक नियम नहीं बनाया जा सकता।

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4 Comments on "एक या अनेक"

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PRAN SHARMA
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लेख कला से सम्बंधित भरपूर जानकारियाँ देता है .

बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

धन्यवाद

vijay nikore
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अच्छा लिखा है।

बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

धन्यवाद

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