लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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saintएक प्रश्न  !आख़िर दुनिया मे लोगो को धर्म गुरु या आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता ही क्यों  महसूस होती है ? पहली बात जो दिमाग़ मे आती है वह है परंमपरा, जिस तरह घर मे किसी देवी देवता को पूजने की परंपरा होती है, वैसे ही कुछ परिवारों मे किसी को गुरु मानकर उन्हे भगवान का दर्जा देने की परंपरा होती है,ऐसे मामलों मे न  तर्क की गुंजाइश होती है ,न  सवाल करने की, परंमपरा निभानी है, तो निभानी है।  घीरे घीरे परंपरा अटूट,  विश्वास फिर अंधविश्वास मे बदल  जाती है।निश्चय ही बार बार दोहराई गई बातों का असर किसी व्यक्ति की मानसिकता पर पड़ता है।

आध्यात्मिक या धार्मिक गु रुओं की किसी भी धर्म मे कमी नहीं है।प्राचीन गुरुओं की गाथाओं मे कितना सत्य है, कितना समय के साथ जुड़ गया, कितना घट गया, कहा नहीं जा सकता।आम जीवन मे जैसे अच्छे बुरे लोग होते है, वैसे ही ये गुरु या गुरु मातायें भी अच्छे बुरे  हो सकते हैं,परन्तु उनके अनुयायियों के लियें गुरु महान ही नहीं, भगवान का साक्षात रूप होते हैं। अनुयायी अंधभक्त होते हैं उनका गुरु ग़लत हो ही नहीं सकता, इसलियें अपने ग़लत किस्म के गुरु पर लगे संगीन सें सगीन आरोप को भी षडयंत्र बता देते हैं।

कोई गुरु भले ही बहुत ज्ञानी हो, धर्मात्मा हो, होता तो इंसान ही है और कोई भी इंसान इतना बड़ा नहीं हो सकता जिसे ईश्वर के समकक्ष दर्जा दिया जा सके या उसकी हर बात को मानने के लियें, बिना कोई सवाल किये कोई वचनबद्ध हो। किसी भी गुरु के अनुयायी ये मामूली सी बात नहीं समझते और अपने विवेक और बुद्धि पर भरोसा न कर के गुरु के पीछे पीछे चलते हैं।

जिन परिवारों मे परंमपरा से किसी गुरु की मान्यता नहीं होती वहाँ अचानक एक व्यक्ति किसी गुरु से गुरुदीक्षा ले लेता है और धीरे धीरे परिवार के कई सदस्य प्रभावित होकर उन गुरु  के भक्त हो जाते है। ऐसा भी नहीं है कि भक्त अनपढ हों, अधिकतर काफ़ी पढ़े लिखे बुद्धिमान लोग ऐसा करते देखे जा सकते हैं।कुछ लोगों का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि उन्हे आसानी से प्रभावित किया जा सकता है,आमतौर पर ये संवेगात्मक (emotional) दृष्टि से कमज़ोर होते हैं। विवेकपूर्ण  बातें करने वाले लोग भी जब किसी कठिन परिस्थिति मे या दुविधा मे होते हैं तो  लोगों की सुनी सुनाई बातों पर भरोसा करके किसी गुरु की शरण मे पंहुच जाते हैं। कमज़ोर मानसिक स्थिति मे गुरु की बातों या वहाँ के वातावरण से कुछ मन शांत (relaxed) होता है तो इसे गुरु का प्रताप समझ लिया जाता है।गुरुओं के दूसरे शिष्य  भी  विश्वास की अग्नि को हवा देते हैं।

जब किसी की आस्था पक्की होने लगती है तो वह व्यक्ति अपने आस पास के लोगों से अपना अनुभव कुछ इस अंदाज़ मे बाँटते हैं कि वो भी गुरु की शरण मे जाने के लियें व्याकुल हो उठते है। ये गुरू अक्सर तुरन्त गुरुदीक्षा नहीं देते, इच्छुक लोग इनके दर्शन करते हैं प्रवचन सुनते हैं तब गुरु इनको अपनी शरण मे लेते हैं। ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य यही जतलाना होता है कि वो भक्तों के पीछे नहीं भक्त उनके पीछे भाग रहे हैं। भारत क्या पूरे विश्व मे काफ़ी लोग तनाव और दुविधाओं से जूझ रहे हैं, जो संवेगों की दृष्टि से कमज़ोर हैं , आध्यात्म की तलाश मे इन गुरुओं के पास आते है।मन की शांति के नाम पर ये लोग  केवल गुरुभक्ति सीखते हैं। धीरे धीरे इनका विवेक, निर्णय लेने की क्षमता ख़त्म होती है, ये मन की शांति एक छलावा है, एक नशा है और कुछ भी नहीं।

गुरु और उनके शिष्य मिलकर अलग अपनी एक सामाजिक इकाई बना लेते हैं।ये सामाजिक इकाइयाँ यदि समाज के लियें कुछ अच्छे कार्य भी करती हैं, तो उनका दायरा सीमित होता है।सत्ता की पूरी बागडोर गुरु के हाथ मे ही होती है।समाज पहले से ही जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बंटा हुआ है,ये इकाइयाँ भी स्वयं को औरों से ऊपर समझकर समाज को बाँटने का ही काम करती हैं।सामाजिक उत्थान के लियें कर्म और निष्ठा चाहिये, कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं।अभी तक की चर्चा मे मैने संभवतः सबसे ईमानदार गुरुओं की ज़िक्र किया है जो कोई बुरा काम नहीं कर रहे, भक्तों से धन भी नहीं बटोर रहे, केवल अपने साम्राज्य के प्रभुत्व का सुख भोग रहे हैं। इनसे  समाज को कोई लाभ नहीं मिलता, अनुयायी अपना वख्त और दिमाग़ इनके पास रखकर बस अनुसरण करते हैं।जब इन ईमानदार गुरुओं से ही समाज मे किसी का कुछ भला नहीं होने वाला, तो सोचिये उन गुरुओ से समाज को कितना ख़तरा हो सकता है जो असीम संपत्ति कमा रहे है,खून और बलात्कार जैसे अपराध धर्म की आड़ मे कर रहे हैं।

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1 Comment on "एक प्रश्न!"

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Vikas
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गुरु sishiy मिल कर कोई सामाजिक इकाई बना भी लें .. इसका उदेश्य सामाज को सही दिशा और मानवीय मूल्यो की रक्षा होना चाहीये. सत्संग करना मानवीय मूल्यो को उन्नत करना है…. गुरु का संग… उन्नत विचारो को प्रेरित करता है.. और मन को आद्यात्म से जोड़ता है.. आध्यात्म ही आत्मा का स्पर्श है.. जो सत्कार्यों के लिए मार्ग बनाता है.. मुर्ख लोग.. इस सब में भी घटिया राजनीति करते है. क्यूंकि वो सिर्फ शारीरिक स्पर्श को ही सत्य मानते है..

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