लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-   Madhya_Pradesh
मध्य प्रदेश में मण्डला और शिवपुरी जिलों में परमाणु विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। शिवपुरी में अभी भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू नहीं हुई है, लेकिन मण्डला जिले में लगने वाली चुटका परमाणु परियोजना की कार्रवाई जबरदस्त जन-विरोध के बावजूद प्रदेश सरकार आगे बढ़ाने में लगी है। हालांकि चंद लोग नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत चार गुना मुआवजा मिलने के लालच में परियोजना का समर्थन भी कर रहे हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर ऐसे सवर्ण और पिछड़ी जातियों के लोग हैं, जो शत-प्रतिशत कृषि भूमि पर निर्भर रहने की बजाय सरकारी सेवा व अन्य काम-धंधों से जुड़े हैं, जबकि बहुसंख्यक गौड़ जनजाति के आदिवासी इस परियोजना के पूरी तरह खिलाफ हैं। यदि परमाणु संयंत्र स्थापित होता है तो मण्डला जिले के 54 गांवों की करीब सवा लाख आबादी को विस्थापित होना पड़ेगा। जबकि कुल 165 गांवों के लोग प्रभावित होंगे। इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं, जो बरगी बांध निर्माण के समय बर्बर तरीके से उजाड़े जा चुके हैं। नर्मदा नदी के किनारे लगाए जाने वाले इस संयंत्र से नर्वदा का जल प्रदूषित होने का खतरा भी बड़ जाएगा ?
केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में मंडला जिले के चुटका में परमाणु बिजली घर लगाने की मंजूरी प्रदान की थी। 20 हजार करोड़ की इस परियोजना के तहत सात-सात सौ मैगावाट की दो इकाइयां लगनी हैं। इसके लिए चुटका, टाटीघाट, कुंडा और मानेगांव की लगभग 497 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। इसमें 288 हेक्टेयर जमीन निजी खातेदारों की और 209 हेक्टेयर जमीन राज्य सरकार के वन विभाग और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की है। राज्य सरकार ने जन सुनवाई के जरिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके पहले दो मर्तबा जबरदस्त विरोध के चलते सुनवाई टाली जा चुकी है। लेकिन 17 फरवरी 2014 को जिस अलोकतांत्रिक ढंग से सरकार के नुमांइदों ने सुनवाई को अंजाम दिया, उससे लगता है, सरकार आंदोलनकारियों का दमन करके जन-सुनवाई की खानापूर्ति कर लेना चाहती है, जिससे यदि आंदोलनकारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया तो वाजिब जवाब दिया जा सके। दरअसल, प्रशासन ने पुलिस के मार्फत लगभग 10 घंटे तक एनएच-12 का रास्ता रोके रखकर ज्यादातर विरोधियों को सुनवाई स्थल तक पहुंचने ही नहीं दिया।
इसके पहले जब 31 जुलाई 2013 को जन सुनवाई के दिन आला-अधिकारियों ने चालाकी बरतते हुए जगह बदल दी थी, जिससे लाचार व गरीब आदिवासी सुनवाई स्थल तक पहुंचने ही न पाएं। हालांकि 165 ग्रामों के चुनिंदा लोगों ने सामाजिक कार्यकर्ता गुलजार सिंह मरकाम की अगुवाई में जबरदस्त विरोध किया। नतीजतन सरकार को कार्रवाई स्थगित करनी पड़ी थी। यदि प्रशासन इसी तरह चालाकी बरतकर स्थानीय जनता को धोखे में रखकर कार्रवाई को आगे बढ़ाता है तो इस क्षेत्र के कई ग्रामों के हालात विस्फोटक हो जाएंगे। पश्चिम बंगाल की तरह सिंगूर और नंदीग्राम में भी ये गांव बदल सकते है।
स्थानीय लोगों को जल, जंगल और जमीन संबंधी अधिकारों से जागरुक कराने के लिए इस क्षेत्र में आदिवासी संगठनों के साथ कुछ वामपंथी संगठन भी सक्रिय हैं। ये लोग नुक्कड़ नाटकों, आजादी के तरानों व चित्रों की प्रदर्षनी लगाकर जन-जागरण की मुहिम में जुटे हैं। लोगों को अगाह किया जा रहा है कि चुटका परमाणु संयंत्र से निकला विकिरण पूरी नर्मदा नदी को तबाह कर देगा। नर्मदा के किनारे बसे षहर, कस्बों व गांवों को भी बड़े पैमाने पर नुकसान झेलना होगा। क्योंकि मछली पालन से लेकर, पीने के पानी तक के लिए लोग इसी नदी पर आश्रित हैं। संयंत्र से निकलने वाला रेडियोधर्मी पानी नर्मदा के जल में घुलकर उसे भी जहरीला बना देगा। इससे जल-जीव और जैव विविधता को तो हानि उठानी ही पड़ेगी, बड़ी संख्या में मानव समुदाय और पालतू मवेशियों में भी विकिरणजन्य बीमारियां फैल जाएंगी। कैंसर और अपंगता की गिरफ्त में भी बड़ी तादाद में लोग आएंगे।
हालांकि सरकार संयंत्र के पक्ष में दावा कर रही है कि परमाणु उर्जा सुरक्षित और सस्ती है। जबकि इन दावों को वैज्ञानिक ही झूठा साबित कर चुके हैं। यह बिजली उर्जा के अन्य स्त्रोतों से कहीं ज्यादा महंगी और खतरनाक भी है ? संयंत्र से निकलने वाले कचरे को ठिकाने लगाने का भी प्रस्तावित परियोजना में कोई प्रावधान नहीं है। यह कचरा आने वाली पीढ़ियों को हजारों साल तक खतरा बना रहेगा। हालांकि राज्य सरकार परमाणु कचरे को कारगर ढंग से नष्ट करने के उपाय तलाशने का दावा कर रही है। लेकिन सभी जानते हैं कि भोपाल स्थित यूनियन कर्बाइड से 1984 में हुई गैस रिसाब से करीब 1100 लोग मारे गए थे। तब से यह संयंत्र बंद भी पड़ा है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद कचरा आज तक नहीं जा सका है। जब बंद पड़े कारखाने का कचरा ठिकाने लगाने में राज्य सरकार असमर्थ है तो चालू संयंत्र से रोजाना निकलने वाले कचरे को सरकार कैसे ठिकाने लगा पाएगी ? हकीकत तो यह है कि केंद्र सरकार की तर्ज पर राज्य सरकार भी अमेरिकी व यूरोपीय कंपनियों के मुनाफे के लिए अपने ही देशों में खारिज कर दिए गए संयंत्रों को देश की लाचार व वंचित जनता पर थोपने को आमादा हैं।
हालांकि राज्य सरकार को यह समझने की जरुरत है कि वह ग्रामसभा की इजाजत के बिना संयंत्र लगाने की कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ा सकती है ? पंचायती राज अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम ;पेसाद्ध और आदिवासी एवं अन्य वनवासी भूमि अधिकार अधिनियम ;वनाधिकार कानूनद्ध को आधार बनाकर ही सर्वोच्च न्यायालय ने ओड़ीसा की नियमगिरी पहाडि़यों से बॉक्साइट के अत्खनन पर रोक लगाई थी। जबकि ओड़ीसा सरकार ने नियमों की अनदेखी करते हुए लंदन की बहुराश्टीय कंपनी वेदांता समूह को बॉक्साइट उत्खनन की मंजूरी दे दी थी। इस परमाणु संयंत्र के परिपेक्ष्य में मध्य प्रदेश सरकार को इस फैसले के मद्देनजर ही भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई को आगे बढ़ाने की जरूरत है, अन्यथा उसे मुंह की खानी पड़ सकती है ?

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