लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under राजनीति.


सुरेश हिन्दुस्थानी
एक कहावत है कि दुश्मन से तो बचा जा सकता है, लेकिन जब अपने ही दुश्मन हो जाएं तो बचने की उम्मीद किसी भी तरीके से संभव नहीं होती। वर्तमान में समाजवादी पार्टी में कुछ इसी प्रकार के हालात दिखाई दे रहे हैं। जहां अपने ही दुश्मन बनकर आमने सामने आ चुके हैं। इससे पूरी समाजवादी पार्टी के सामने असमंजस का वातावरण दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी के राजनीतिक आसमान पर छाए काले बादलों से अभी तक चुनावी तैयारियों पर भी ग्रहण सा लगा हुआ है। हालांकि इससे एक बात तो साफ हो चुकी है कि मुलायम सिंह कभी कठोर तो कभी नरम दिखाई देते हैं। ऐसे में यह कहना भी तर्कसंगत माना जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव समय के अनुसार ही अपनी बयानबाजी कर रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि अखिलेश यादव मेरा बेटा है, इस कारण उसे मारा तो नहीं जा सकता। मुलायम सिंह के इस शब्द से कहीं न कहीं यह भी परिलक्षित हो रहा है कि वे अपने मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव का अंदरुनी तौर पर बचाव करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनका यह भी मानना है कि उनके साथ केवल गिनती के विधायक हैं, इससे यह भी संदेश वातावरण में तैरने लगा है कि समाजवादी पार्टी के भविष्य के वारिश अब अखिलेश यादव ही हैं। इस लड़ाई में सबसे खास बात यह भी देखने को मिलती है कि अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह के विरोध में कभी कोई बयान नहीं दिया। इसका सीधा तात्पर्य यह भी है कि समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कोई भी बन जाए मुखिया मुलायम सिंह यादव ही रहेंगे। वर्तमान में उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की स्थिति का अध्ययन किया जाए तो यही कहा जाएगा कि आज सपा जो कुछ भी है, वह केवल और केवल मुलायम सिंह की ही देन है। वर्तमान में प्रदेश की जनता इस बात को भलीभांति समझ चुकी थी कि जातिवाद को चरम पर पुहंचाने वाली समाजवादी पार्टी पर केवल एक ही परिवार का कब्जा होने के कारण ही रसातल की ओर कदम बढ़ा चुकी है। इसकी भरपाई कैसे की जाए और जनता का यादवी कुनबे के मुद्दे से कैसे ध्यान हटाया जाए, इस सबके परिणाम स्वरुप ही यह सब किया हुआ लगता है। उत्तरप्रदेश के बारे में सभी आकलनों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि आगामी विधानसभा के चुनावों में सपा की हालत पतली होने वाली है। इसके बारे में कई मुद्दे भी प्रदेश की जनता के सामने थे। सपा की लड़ाई के चलते जनता इन मुद्दों को विस्मृत कर देगी, ऐसा कहना तर्कसंगत नहीं होगा। क्योंकि देश और प्रदेश का युवा वर्ग आंकड़ों के आधार पर ही बात करता है, आज अंतरताने के युग में युवा हर पल अद्यतन रहता है, वह हर पल का परीक्षण भी करता है। प्रदेश में कहा जा रहा है कि सपा का यह नाटक मुलायम सिंह की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। क्योंकि मुलायम सिंह भविष्य में #सपा की बागडोर अखिलेश के हाथ में सौंपना चाहते थे। वे सीधे तरीके से देते तो पार्टी में विघटन की स्थिति बन जाती। इसी प्रकार सामाजिक प्रचार तंत्र पर भी सपा के विवाद को खूब उछाला जा रहा है, जिसमें कोई अखिलेश यादव के साथ है तो कोई मुलायम सिंह यादव के साथ। इतना ही नहीं कई लोग तो यह भी लिख रहे हैं कि जो पुत्र अपने पिता का नहीं हो सकता वह प्रदेश की जनता का क्या होगा।
प्रदेश की जनता के समक्ष समाजवादी पार्टी के बारे जिस प्रकार की बातें सामने आ रहीं हैं, उससे सपा का कार्यकर्ता तो भ्रमित है ही, साथ ही प्रदेश की जनता के सामने भी विभ्रम का वातावरण बना हुआ है। सपा की लड़ाई के कारण यह भी तय है कि भविष्य में जनता का विश्वास जीतने के लिए सपा को कड़ी मेहनत करनी होगी, जो समयाभाव के कारण हो सकने की स्थिति में नहीं है। कहा जा सकता है कि सपा की यह लड़ाई एकदम गलत समय पर हो रही है, जिसका खामियाजा सपा को भुगतना ही पड़ेगा।
#उत्तरप्रदेश की वर्तमान स्थिति का अध्ययन किया जाए तो कहीं न कहीं यह भी दिखाई देने लगा है कि प्रदेश का मतदाता बेहतर विकल्प की तलाश करता हुआ दिखाई दे रहा है। यही बात प्रदेश में किए गए राजनीतिक सर्वे भी कह रहे हैं कि सत्ताधारी समाजवादी पार्टी इस बार तीसरे स्थान पर रहेगी। इसलिए लगता है कि अखिलेश यादव के प्रति सहानुभूति पैदा करके पार्टी के प्रदर्शन में सुधार की कवायद की जाए। दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी सत्ता प्राप्त करने के लिए जोर आजमाइश कर रही है, लेकिन जिस प्रकार से बसपा प्रमुख मायावती पर आरोप लगते हैं, उससे कहीं न कहीं बसपा का विरोध होने का संकेत मिलता है। जो भी राजनेता बसपा छोड़कर जा रहे हैं, वे सभी मायावती को दौलत की बेटी कहते हुए दिखाई देते हैं। वर्तमान विधानसभा चुनाव में बसपा के सामने गजब चुनौती है, लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व शून्य होने के कारण वह पशोपेश की स्थिति में है। संभावना इस बात की है कि प्रदेश में बसपा का प्रदर्शन खराब रहता है तो उसकी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता को खतरा पैदा हो सकता है। वर्तमान में बसपा सरकार बनाने की कम अपनी मान्यता बचाने के लिए ही संघर्ष करती दिखाई दे रही है। अब प्रदेश में कांग्रेस के बारे में तो यह पहले से ही तय है कि वह अकेले विकल्प बनने की हालत में नहीं है। इस कारण कहा जाने लगा है कि प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी एक सार्थक विकल्प बनकर सामने आ सकती है। उसके लिए सकारात्मक बात यह है कि उसकी केन्द्र में सरकार है और उसके सबसे ज्यादा सांसद भी उत्तरप्रदेश से हैं। इतना ही नहीं केन्द्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रदेश के ही वाराणसी से सांसद हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि प्रदेश में भाजपा का प्रभाव दिखाई देगा। इसके अलावा वर्तमान में प्रदेश में भाजपा का प्रचार करने के लिए हर बार से ज्यादा सांसद हैं। यह सांसद भी जनता की पसंद के आधार पर ही चुने गए हैं। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि भाजपा के पास एक जनाधार है। पिछले लोकसभा चुनाव का अध्ययन किया जाए तो सबसे ज्यादा मत भाजपा को मिले।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz