लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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विनोद बंसल

पूरे विश्व के अंदर सोने की चिड़िया एवं विश्वगुरू कहा जाने वाला मेरा देश आज चारों तरफ आतंकवाद, हिंसा, वैमनस्य, जाति, पंथ, भाषावाद एवं भ्रष्टाचार ने जकड़ा हुआ है। देश के अधिकांश राजनेता अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के चलते वोट बैंक की भूख में इस देश के सभी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं। विडम्बना यह है कि राष्ट्र की युवा शक्ति को भी जो संस्कार, आत्मनिर्भरता व राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिये उससे हम बहुत दूर हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली भी वोट केंद्रित राजनीति के दलदल में फंस गयी है। जब-जब व जहां-जहां राष्ट्र प्रेम की बात होती है, उसमें हमारे राजनेताओं को साम्प्रदायिकता की बू आने लगती है। हर जगह तुष्टीकरण का बोलबाल है। जहाँ पर मतदाता समूह में हैं, उस समूह पर किसी व्यक्ति, संस्था, जाति, मत-पंथ या सम्प्रदाय का बोलबाल है। हमारे राजनेता ऐसे समूहों को रिझाने के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। चाहे व राष्ट्रद्रोही कदम ही क्यों न हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय पर ही रोपा गया साम्प्रदायिकता का बीज देश की चारों ओर की सीमाओं को खोखला कर रहा है। 1947 में मो. अली जिन्ना को खुश करने के लिये हमारे तत्कालीन कर्णधारों ने देश के टुकडे़ करवा दिये। इसी तुष्टीकरण की नीति के चलते जम्मू कश्मीर जेहादी आतंकवाद का शिकार है।

पूर्वी व पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में माओवाद अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है। इसी प्रकार यदि दक्षिण पूर्व की बात करें तो बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल इत्यादि में नक्सलवाद व माओवाद अपनी पैठ बना चुका है।

प्रत्येक देशवासी आज देश के राजनेताओं की करनी से परेशान हैं। जेहादी आतंकवाद, माओवाद एवं नक्सलवाद जैसी समस्यायें कहीं न कहीं प्रत्येक राज्य में अपनी जड़े जमा चुकी हैं। राजनैतिक संरक्षण के चलते अपराधियों को या तो पकड़ा ही नहीं जाता, यदि पकड़ भी लिया जाये तो देश के कानूनी पेचीदिगियों में उलझा कर उसे सजा नहीं मिल पाती है। यदि किसी को न्यायालय द्वारा फांसी की सजा भी दे दी जाये तो भी हमारे दुष्ट राजनेता राष्ट्रघाती आतंकवादियों को संरक्षण दे देते हैं। आखिर कौन बचायेगा हमें आतंकवाद से?

उपर्युक्त सभी समस्याओं के समाधान के लिये देश के शीर्ष संस्थानों एवं राजनैतिक व्यवस्था में आमूलचूक परिवर्तन करने होंगे। देश के कर्णधारों को जगाने के लिये जहाँ हमें कुछ व्यवस्था में परिवर्तन करने पड़ेंगे तो वहीं दूसरी ओर अपनी जनता को जागरूक कर उसकी राजनैतिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी होगी।

निम्नांकित बिंदु इस दिशा में कारगर हो सकते हैं:-

1. वोट डालने की अधिकार के साथ कर्त्तव्य का बोध।

2. वोट न डालने पर दण्ड का प्रावधान।

3. यदि चुनाव में खड़े सभी प्रत्याशी अयोग्य हों तो किसी को भी न चुनने का अधिकार।

4. चुनाव में खड़े होने के लिये न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हो।

5. राजनीतिज्ञों के रिटायरमेंट की भी कोई अवधि हो।

6. जाति, मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा, राज्य के आधर पर वोट मांगने वालों के खिलाफ कार्यवाही।

7. सांसदों व विधायकों के द्वारा किये कार्यां का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) कर उसे सार्वजनिक करना अनिवार्य हो।

8. संसद व विधान-सभाओं/विधान-परिषदों से अनुपस्थित रहने वाले नेताओं पर कार्रवाई।

यदि राष्ट्र को खुशहाल देखना है तो देश के प्रत्येक मतदाता को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस प्रकार शरीर के लिये भोजन व प्राणों के लिये वायु की आवश्यकता है उसी प्रकार राष्ट्र को आपके वोट की आवश्यकता है। कोई भी मतदाता अपने मताधिकार से वंचित नहीं रहने पाये, इसके लिये हमें समुचित प्रबंध करने होंगे। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के आने से वोट डालना कुछ आसान एवं प्रमाणिक तो हुआ है किंतु इसे अभी और सरल करने की आवश्यकता है। आज कम्प्यूटर का युग है, हमें ऐसी प्रणालियां विकसित करनी होंगी जिससे देश का तथाकथित उच्च वर्ग, जिसमें उद्योगपति, प्रशासनिक अधिकारी, बुद्विजीवी व बड़े व्यवसायी इत्यादि आते हैं, अपनी सुविधानुसार मताधिकार का प्रयोग कर सके। यह वर्ग सही मायने में देश को चलाता है, किंतु देखा गया है कि ये अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। जहाँ पर एक ओर मतदाताओं को उनके मत की कीमत बतानी होगी, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे प्रावधान भी करने पड़ंेगे जिनसे प्रत्येक मतदाता इस राष्ट्र यज्ञ में अपनी एक आहूति सुनिश्चित कर सके। पूरे जीवनभर देश से हम कुछ न कुछ लेते ही रहते हैं। आखिर एक वोट भी अपने राष्ट्र के लिये समर्पित नहीं किया तो हमारी नागरिकता किस काम की, ऐसा भाव प्रत्येक नागरिक में जगाना होगा। मतदाता पर यह दबाव न हो कि चुनाव में खड़े हुए किसी न किसी एक प्रत्याशी को चुनना ही है, लेकिन यह दबाव जरूर हो कि उसे वोट डालना ही है। वैलेट पेपर में या वोटिंग मशीन में प्रत्याशियों की सूची के अंत में एक बिंदू यह भी हो ‘‘उपरोक्त में से कोई नहीं,’’ जिससे कि मतदाता यह बता सके कि सभी के सभी प्रत्याशी मेरे हिसाब से चुनने के योग्य नहीं है।

विश्व के कुछ देशों में यह प्रावधान है कि यदि मतदान का एक निश्चित प्रतिशत ‘‘उपरोक्त में से कोई नहीं,’’ को चुनता है तो उस चुनाव में खड़े हुए सभी प्रत्याशियों को अगले कुछ वर्षों के लिये चुनावों से अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। ऐसा होने से देश के कानून निर्माताओं (सांसद/विधायक) की सूची में से गुण्डे, आतंकवादी व राष्ट्रविरोधी मानसिकता वाले लोगों को अलग रखा जा सकता है। साथ ही मतदाताओं की इस मजबूरी का फायदा राजनेता नहीं उठा पायेंगे कि उन्हें किसी न किसी को तो चुनना ही है।

कहीं भी यदि नौकरी की तलाश करनी है या अपना कोई व्यवसाय चलाना है तो पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है। एक अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति ही एक अच्छी नौकरी पा सकता है, चाहे सरकारी हो, अर्ध-सरकारी हो या प्राईवेट। साथ ही उसके काम करने की एक अधिकतम आयु भी निश्चित होती है। इसके अलावा बीच-बीच में उसके कार्यां का वार्षिक मूल्यांकन भी होता है। जिसके आधार पर उसके आगे के प्रमोशन निश्चित किये जाते है। आखिर ये सब मापदण्ड हमारे राजनेताओं के क्यों नहीं हो सकते? चुनाव में खड़े होने से पूर्व उनकी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, आयु, शारीरिक सामर्थ्य की न सिर्फ जांच हो बल्कि रिटायरमेंट की भी आयु सीमा निश्चित हो।

अंग्रेजों ने जाते-जाते देश को साम्प्रदायिक, जातिवाद व भाषावाद में बांट दिया। ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति आज भी हमारे राजनेता अपना वोट अस्त्र समझते हैं, जिसके चलते देश आज जरजर अवस्था में है। कहीं जाति पर, कहीं भाषा पर तो कहीं किसी विशेष सम्प्रदाय को लेकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं। जो शब्द कहीं न कहीं, किसी न किसी राजनेता के दिमागी सोच का परिणाम होता है क्योंकि उन्हें तो किसी खास समुदाय के सहानुभूति वाले वोट चाहिये। ऐसी स्थिति में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी राजनेता किसी भी हालत में हमें इन आधारों पर न बांट सके। चुनावों के दौरान प्रकाशित ऐसे आकड़ों को या समाचारों को भी हमें रोकना होगा जिनमें किसी जाति, भाषा, राज्य, मत, पंथ या सम्प्रदाय का जिक्र हो।

आज देश के प्रत्येक नागरिक को अपने आय-व्यय का लेखा-जोखा व व्यवसाय की वार्षिक रिपोर्ट बनाने की जरूरत होती है। जिससे वह सरकार को उचित कर दे सके तथा गत वर्ष में किये कार्यां का आत्म चिंतन कर आगामी वर्ष की योजना ठीक से बना सके। देश की जनता ने जिन प्रतिनिधियों को संसद व विधान-सभाओं में भेजा उनकी भी अपनी जनता के प्रति एक जबाब देही होनी चाहिए। जिससे यह तय हो सके कि आखिर करदाताओं के खून-पसीने की कमाई के पैसों का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। वैसे भी एक-एक राजनेता पर देश के करोड़ों रुपये प्रत्येक वर्ष खर्च होते हैं। ऐसे में न सिर्फ करदाता बल्कि मतदाता भी यह जानना चाहेगा कि मेरे द्वारा चुना गया प्रतिनिधि आखिर क्षेत्र में कुछ काम भी कर रहा है या नहीं। प्रत्येक जन-प्रतिनिधि को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कितने घंटे वह जनता के बीच तथा कितने संसद व विधान-सभाओं में बितायेगा। एक न्यूनतम मापदंड से कम रहने पर, आवंटित धन व योजना का समुचित प्रयोग क्षेत्र के विकास में न करने पर या किसी भी प्रकार के दुराचरण में लिप्त पाये जाने पर कुछ न कुछ दण्ड का प्रावधान भी हो।

जनप्रतिनिधियों के कार्य का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) अनिवार्य होना चाहिए। जिससे उस क्षेत्र की जनता उसके कार्यकलापों को जान सके। इसमें न सिर्फ आर्थिक वही-खातों की जांच हो बल्कि वर्ष भर उसके द्वारा किये गये कार्यां की समालोचना भी शामिल हो। इससे जनप्रतिनिधियों एवं जनता के बीच आपसी विश्वास बढ़ेगा तथा उसका कार्य और पारदर्शी बनेगा।

प्रत्येक विधायक या सांसद से यह अपेक्षा रहती है कि क्षेत्र की जनता का वह विधानसभा या संसद में न सिर्फ प्रतिनिधित्व करेगा बल्कि उनकी समस्याओं को सरकार के समक्ष जोरदार तरीके से रखेगा। आम तौर पर देखा जाता है कि ये जनप्रतिनिधि या तो विधानसभाओं या संसद से लापता रहते हैं या क्षेत्र की आवाज कभी उठाते ही नहीं हैं। ऐसी स्थिति में उनका चुना जाना व्यर्थ ही होता है। क्षेत्र की जनता को यह पता लगना चाहिए कि उसके जनप्रतिनिधि ने उनके विकास के लिये क्या-क्या योजनायें लागू करवाईं तथा किन समस्याओं को लोकतंत्र के उन मंदिरों में उठाया। जिस प्रकार नौकरी या स्कूल से एक निश्चित अवधि से अधिक अनुपस्थित रहने पर विद्यार्थी/कर्मचारी को निकाल दिया जाता है। उसी प्रकार संसद या विधान-सभाओं में भी कुछ प्रावधन हो।

इस प्रकार जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वछंद रूप से राष्ट्रीय जिम्मेदारी समझते हुए एक योग्य व्यक्ति को अनिवार्य रूप से मतदान कर संसद/विधानसभा में भेजेगा तथा जन-प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्र की जनता का समुचित प्रतिनिधित्व कर राष्ट्रोन्नति के कार्य में लगेगा तो क्यों नहीं भारत पुनः सोने की चिड़िया या विश्वगुरू कहलायेगा। जब प्रत्येक जन-प्रतिनिधि बिना किसी भय व वोट के लालच में अपनी जनता के लिये कार्य करेगा तभी होगा सच्चे अर्थों में गण का तंत्र।

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