लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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fireप्रमोद भार्गव
कोई दुर्घटना एक बार हो तो चूक कहलाती है, दो बार हो तो गलती, लेकिन बार-बार इसी प्रकृति की घटनाएं सामने आ रही हों, तो यह स्थिति देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए आत्मघाती लापरवाही है। देश के ही नहीं एशिया के सबसे बड़े आयुध भंडार पुलगांव में लगी आग, इस नजरिए से बेहद चिंताजनक है। चिंता की बात इसलिए भी है कि आग इतनी भीषण और व्यापाक थी कि इसे बुझाने की कोशिशें जानलेवा साबित हुई हैं। दो सैन्य अधिकारियों समेत करीब 20 लोग हताहत हुए हैं। इसमें रक्षा सैनिक व अग्निशमन दस्ते के जवान शामिल हैं। करीब दो दर्जन सुरक्षाकर्मी घायल हैं। आग इतनी विकराल थी कि भंडार के आसपास के अनेक गांव खाली कराने पड़े। आग कैसे लगी, यह जांच का विषय है, लेकिन आयुध भंडारों में आग लगने का जो सिलसिला निरंतर बना हुआ है, वह संदेह का सबब है। इसी भंडार में 2005 में भी भयंकर आग लग चुकी है। ये हालात संदेह में साजिश की शंका पैदा करने वाले हैं।
नागपुर से 110 किलोमीटर वर्धा के पास मौजूद पुलगांव आयुध डिपो भारत का सबसे बड़ा हथियार एवं औजार भंडार गृह है। यह 10 हजार एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां देश भर में जो हथियार व रक्षा उपकरण बनाने वाले कारखाने हैं, उनमें निर्मित साम्रगी बेहद सावधानी से रखी जाती है। परराष्ट्रों से आयातित हथियार भी यहां रखे जाते हैं। इसमें शक्तिशाली बम, ग्रेनेड, बंदूकें, गोला-बारूद और मिसाइलें तक रखी जाती हैं। इन आयुधों के अत्याधिक संवेदनशील व विस्फोटक होने के कारण यहां भूतल के साथ-साथ भूमिगत गोदाम भी हैं। इसकी इतनी सुरक्षा की जाती है कि आयुध-परिसर के चारों ओर बारुदी सुरंगे तक बिछी हैं। मानवीय सुरक्षा के कई चक्रों के अलावा सीसीटीवी कैमरे व अन्य तकनीक से जुड़ी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम है। इससे अंदाजा लगता है कि इस भंडार-गृह में देश की रक्षा और प्रतिरक्षा से जुड़े कितने महत्वपूर्ण आयुध रखे होंगे ? साफ है, इस आग से जो क्षति हुई है, उससे निश्चित ही हमारी प्रतिरक्षा की क्षमता बड़ी मात्रा में प्रभावित हुई है। जबकि अकेले सुरक्षा इंतजामों पर ही करीब 125 करोड़ रुपए सालाना खर्च किए जाते हैं। बावजूद दुर्घटनाएं अनवरत बनी हुई हैं।
ऐसा नहीं है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम केवल पुलगांव के डिपो में ही हों, देश के हरेक भंडार में करीब- करीब ऐसे ही इंतजाम हैं। बावजूद यदि हमारे आयुध भंडार एक-एक करके अग्निकांड जैसी त्रासद घटनाओं की गिरफ्त में आ रहे हैं तो यह आशंका वाजिब है कि सुरक्षा इंतजामों में बड़ी खामियां हैं। प्रशासनिक व्यावस्थाएं लचर हैं। उनमें कई छेद हैं। सन् 2000 में भरतपुर के आयुध भंडार में जब आग लगी थी, तब राजग सरकार के तात्कालीन रक्षा मंत्री जाॅर्ज फर्नाडीस ने देश की संसद को बताया था कि 30 हजार टन सैन्य आयुध क्षमता वाले डिपो में 475 करोड़ रुपए के हथियार और गोला-बारुद जलकर खाक हो गए थे। इस डिपो में बेर्फास तोपों के गोला-बारूद रखे थे। इस हिसाब से पिछले डेढ़-दो दशक के भीतर आयुध भंडारों में जो अग्निकांड हुए, उनमें तय है कि हजारों अरब रुपए की रक्षा साम्रगी सुरक्षा इंतजामों में खामियों के चलते स्वाहा हो चुकी हैं।
अप्रैल 2001 में पठानकोट के पास सेना के आयुध भंडार में आग लगी। इसी साल जून में राजस्थान के सूरतगढ़ से करीब 20 किमी दूर विर्धवाल में सेना के भंडार में आग लगी। जनवरी 2002 में बीकानेर के पास उदासर सैन्य क्षेत्र में सेना के अस्थाई आयुध भंडार में इतनी जबरदस्त आग लगी थी कि दो राॅकेट निकटवर्ती धर्मशाला में जा गिरने से दो लोगों की मौत हो गई थी। 2007 में कश्मीर के खुंडरू स्थित 21 फील्ड हथियार डिपो में आग लगी। यह आग इतनी भयावह थी कि 18 लोग काल-कबलित हो गए थे। सैकड़ों घायल हुए थे और 26 हजार की आबादी प्रभावित हुई थी। इसी डिपो में फिर 2005 में भी आग लगी थी। मार्च 2010 में कोलकाता के निकट पानागढ़ डिपो में भीषण अग्निकांड हुआ था। इसमें बड़ी मात्रा में आयुध साम्रगी तो नष्ट हुई ही थी, 17 लोग भी मारे जाए थे। दिसंबर 2015 में विशाखापट्टनम के नौ-सेना डिपो में धमाकों के साथ आग लगी। यह आग जिलेटिन में उपयोग होने वाले डिटोनेटर और रसायनों को अलग करते समय लगी थी। इसमें 5 सैन्यकर्मी घायल हुए थे। यह आग जरूर मानवीय भूल थी। 1988 में जबलपुर के डिपों में भी जबरदस्त आग लगी थी।
सिसिलेबार इतने अग्निकांडों के सामने हैं और जवाबदेही किसकी रही, यह सिद्ध क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? जबकि हरेक दुर्घटना के बाद जांच समिति बनती है। जांच भी होती है। जांच निष्कर्ष भी निलते हैं। किंतु परिणाम लगभग शुन्य रहते हैं। दुर्घटना के पीछे षड्यंत्र था, लापरवाही थी या फिर मानवीय भूल, इस वास्तविकता का खुलासा कम ही होता है। यदि अपवादस्वरूप जाॅर्ज फर्णाडीस द्वारा संसद में दिए बयान को छोड़ दें तो यह हकीकत भी सामने नहीं आती कि लगी आग में किस तादात में हथियार नष्ट हुए ? चूंकि आयुधसाम्रगी की ज्यादातर जानकारी सुरक्षा से जुड़ी सैन्य नौकरशाही को होती है, इसे गोपनीय बनाए रखने की वचनबद्धता भी होती है, इसलिए यह भी स्पष्ट रूप से खुलासा नहीं हो पाता कि अग्निकांड में होम हुई साम्रगी कितनी मात्रा में थी, उसकी प्रकृति क्या थी, कितनी मारक क्षमता की थी और किस तादात में भंडार में मौजूद थी ? हैरानी इस बात पर भी है कि जिन देशों से हम संचार व सुरक्षा तकनीकें आयात कर रहे हैं, उन देशों में आखिरकार सुरक्षा के कौन से उपाए अमल में लाए जाते हैं कि वहां के आयुध भंडार अग्निकांड से सुरक्षित रहते हैं। विकसित देशों के आयुध भंडारों और सैन्य अड्डों में कभी आग लगी हो, ऐसी खबरें वाइदवे ही आती हैं। जबकि चीन समेत यूरोपीय देशों में आयुध भंडार भारत से कहीं ज्यादा बड़े और मारक क्षमता वाले हैं। इन देशों में सैन्य सामग्री इसलिए भी बड़ी मात्रा में हर वक्त मौजूद रहती है, क्योंकि यही देश भारत समेत अन्य एशियाई देशों को युद्ध सामग्री निर्यात करते हैं। हालांकि पुलगांव का आयुध भंडार तकनीक की दृष्टि से इतना श्रेष्ठ है कि उसे हाल ही में पुराने पड़ चुके गोला-बारूद को सौर ऊर्जा से निस्तेज करने में सफलता प्राप्त की थी। इसके लिए इस भंडार को पुरस्कृत भी किया गया था। इस कारण यह अनुमान लगाना सहज है कि तकनीक के लिहाज से यह भंडार उन्नत रहा ही होगा।
अमतौर से भारतीय आयुध भंडारों में आग का कारण तेज गर्मी से बड़ा तापमान माना जाता है। ऐसे में सूखा घांस-फूंस या पेड़ों की पत्तियां मामूली चिंगारी के संपर्क में आते ही आग पकड़ लेती हैं। इसलिए जल्दी आग पकड़ने वाले हथियारों को उनकी आग्नेय क्षमता के हिसाब से वगीकृत करके भूतल और भूमिगत कक्षों में अलग-अलग रखा जाता है। कक्षों की पत्थर और ईंट से बनी मोटी दीवारें होती हैं। ये कक्ष विद्युत विहीन होते हैं। हरेक डिपो में आधुनिक तकनीक से निर्मित ‘फायर फाइटिंग मैकेनिज्म‘ भी होता है, बावजूद अग्निकांडों का सिलसिला बना रहना आश्चर्य है। इसलिए ये आशंकाएं जोर पकड़ रही है कि कहीं ये अग्निकांड दुश्मन की शत्रुतापूर्ण हरकतें तो नहीं हैं ? वैसे भी भौगोलिक दृष्टि हम चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों से घिरे हैं। जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी जमातें अर्से से बेखौफ सिर उठाए हुए हैं। पाकिस्तानी झंडे लहराना और पाक जिंदाबाद के नारे लगाना वहां रोजमर्रा की बात हो गई है। पाक-परस्त आतंकवादियों ने कुछ महीने पहले ही पठानकोट एयरबेस में घुसकर यह जता दिया था कि हमारे दुश्मन देश की सीमा के निकट मौजूद सैन्य ठिकानों के सुरक्षा इंतजाम कितने लचर है ? पश्चिम बंगाल की सीमा पर भी कमोबेश यही हालात हैं।
दुश्मन देश की कारगुजारियों को अगर हम नजरअंदाज कर भी दें, अलबत्ता भ्रष्टाचार और लालच ने हमारे अपने रक्षा तंत्र में ही गद्दार पैदा कर दिए हैं। रक्षा विभाग में पिछले कुछ सालों के भीतर ऐसे जासूस पकड़े जा चुके हैं, जिन्होंने हमारे रक्षा तंत्र में ही सेंघ लगाकर विभीषण जैसा राष्ट्रघाती कामों को अंजाम तक पहुंचाया है। ये भारतीय सेना में होने के बावजूद पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पकड़े गए हैं। भारत को आंतरिक स्तर पर कमजोर करने के ये हालात इसलिए भी उत्पन्न हो रहे हैं, क्योंकि इस समय एशियाई देशों में एकमात्र भारत ही है, जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विलक्षण छवि और साख के रूप में उभर रहा है। इस लिहाज से ऐसे अग्निकांडों में साजिश की बू का अहसास देश के जनमानस को झकझोर रहा है, तो यह बेवजह नहीं है। इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि एक तो जांच जल्दी पूरी हो, दूसरे उसके जो भी निष्कर्ष निकलें, वे सार्वजनिक किए जाएं ? जिससे यह साफ हो कि पुलगांव की राष्ट्रीय त्रासदी प्राकृतिक है, मानवजन्य भूल है या फिर किसी षड्यंत्र का नतीजा है ? यदि वाकई अस्तीन में सांप हैं, तो उनके फन निर्ममता से कुचलने की भी जरूरत है।

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