लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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– डॉ. दीपक आचार्य

जब से आत्म मूल्यांकन, चिंतन और विश्लेषण की प्रवृत्तियाँ समाप्त हो चली हैं, हमारे यहाँ हर क्षेत्र में स्वयं को महानतम बुद्धिमान और योग्यतम समझने का शौक दूर-दूर तक अपने पाँव पसार चुका है।

कहीं भी आदमी की योग्यता की कोई कसौटी नहीं रही। व्यक्तित्व की ऊँचाइयों को दर्शाने वाले मानदण्ड नहीं रहे। वे लोग भी नहीं रहे जो गुणग्राही हुआ करते थे। आजकल सभी जगह उनकी चवन्नियाँ चल रही हैं जिनका गुणों और मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है।

जो लोग निर्देशन की भूमिका में होने चाहिएं वे हाशिये पर हैं और वे सारे लोग मुख्य धारा का आस्वादन करने में जुटे हुए हैं जिन्हें दरकिनार होना चाहिए। स्टंटबाजों ने अपनी धरा पर ऐसे कब्जा जमा लिया है जैसे गाजर घास या बेशर्मी ने। हर कीमत पर कैसे भी स्टंट अपना कर ये अपनी पूंगी बजाना चाहते हैं। सुनाना भी चाहते हैं दिन-रात, चाहे कोई सुनना न भी चाहे, इन्हें क्या फर्क पड़ता है। इनकी पूंगियों पर बड़े-बड़े साँपों के आ धमकने का भय जबरिया श्रवण को मजबूर कर ही देता है। अब तो अजगरों के खाने-पीने का जतन भी साँप करने लगे हैं।

हर तरफ ऐसे-ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो अपनी चलाना चाहते हैं। भले इनकी गगरियाँ अध जल भरी ही क्यों न हों, जमाने भर को लबालब कर देने की कल्पनाओं से भरे रहते हैं ये। बहुधा ऐसे लोग यही चाहते हैं कि वे जो सोचते हैं और करते हैं वही दूसरों को करना चाहिए।

इसका क्या अच्छा-बुरा फर्क पड़ेगा, यह सोचने का काम आने वाली पीढ़ियाँ करेंगी। इनमें वे लोग ज्यादा हैं जो नीति-निर्धारक हैं, भीड़ से घिरे और अपना जयगान सुनने के आदी कर्णधार हैं या फिर वे लोग हैं जो गलती से कहें या पूर्वजन्म के भाग्य से ऐसी-ऐसी जगहों पर कुण्डली मार कर धँसे हुए हैं जिनसे जमाने की हवाओं का रुख बदला जा सकता है। इनमें उन चेहरों की संख्या सर्वाधिक है जो अपनी हैसियत और नैसर्गिक प्रतिभाओं से कई गुना ज्यादा चादर बिछा के सोने के आदी हैं या साठ बरस तक सेवाओं वाले बाड़े में बैठने का आजीवन लाइसेंस थामे हुए उन्मुक्त विचरण और स्वच्छन्द कामों के आदी हैं।

पैमाने हीन लोग अपनी पूरी जिन्दगी पैमाने निर्धारित करने में लगा देते हैं। अपने लिए कोई दिशा तय कर पाएं या नहीं, दूसरों के लिए पैमाने बनाने में माहिर जरूर होते हैं। कोई सा पुराना या नया काम सामने आ जाए, ये गढ़ डालते हैं अपनी कल्पनाओं की फ्रेम और थोंप देते हैं औरों पर इसे क्रियान्वयन के लिए। ऐसे अक्लमंदों की अपने यहाँ कोई कमी नहीं हैं जिनका पूरा समय इसी में गुजरता है। अपनी कार्यशैली को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए ये चाहते हैं कि जमाने की नज़ीर बनें।

एक बार जब अपने ही मन की करनी और अपनी सोच को हावी रखने की आदत पड़ जाती है तब नए विचारों का आगमन बन्द हो जाता है और ऐसी कार्यशैली विकसित हो जाती है जिसमें न मौलिकता होती है, न कोई ऊर्जा और न कोई प्रभाव।

हर व्यक्ति के काम करने के अलग-अलग तरीके हुआ करते हैं। हरेक को चाहिए कि वह अपनी काम करने की शैली किसी और पर न थोपें, बल्कि दूसरों के विचारों और सुझावों का स्वागत तथा सम्मान भी करें। इससे काम-काज में सुधार के साथ ही नए प्रकार की ऊर्जा भरी गुणात्मकता की स्थापना होती है। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा होती है अपना अहंकार, इसे छोड़े बिना इंसानियत का धरातल तक नहीं पाया जा सकता।

यह जरूरी नहीं कि आप किसी बड़े ओहदें पर हों और आप जो सोचें वही सच या तथ्यपरक हो। आम तौर पर बड़े ओहदों पर रहने वाले लोग हवाओं से बातें करते हैं, हवाओं में रहते हैं और हवाओं पर चलते हैं। हम अक्सर देखते हैं कि ऐसे बड़े-बड़े लोग अपने साथ कई सारी बैसाखियाँ रखते हैं जो किसी न किसी प्रलोभन में उन्हें सहयोग करती रहती हैं। जमीनी हकीकत तो नीचे वाले ही अच्छी तरह जानते हैं।

धरातल की हलचलों पर आधारित बदलाव ही दीर्घकालीन और ठोस होता है। यह सच और प्रकृति दोनों के करीब होता है और इस वजह से इसकी सार्थकता पर कोई शक नहीं किया जा सकता।

कोई भी काम करें, अपने ओहदें, प्रतिष्ठा और पदों के प्लास्टिक कवर्स को दूर रखकर करें तो अपने आप वही बातें सामने आएंगी जो आप जमाने के लिए चाहते हैं अन्यथा आपकी मानसिकता कुण्ठित और जड़ ही बनी रहेगी।

समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र में आप काम करते हों, दूसरों की कार्यशैली को कोसने का भी आपको कोई अधिकार नहीं है क्योंकि देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार इसका स्वरूप बदलता रहता है। इसी प्रकार अपनी कार्यशैली को सर्वोच्च मानने की भूल भी न करें।

बाहरी लोगों की बातों पर गौर करने से पहले देखें कि उनकी मंशा क्या है। एक हजार बुरे आदमी आपके बारे में बुरी बात कहें तो कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि नमक की झील से मिश्री की कल्पना नहीं की जा सकती। बल्कि उस एक अच्छे आदमी की बात पर गंभीर चिंतन करें जिसने आपके बारे में कुछ नकारात्मक कहा हो।

जीवन में समय-समय पर अपने व्यक्तित्व का आत्म मूल्यांकन करें, इससे आपके बारे में होने वाली बाहरी और भीतरी हलचलों का अपने आप पता चल जाएगा। जहाँ कहीं हैं वहाँ अपने विचारों और लक्ष्यों को साझा करें और निरन्तर चिंतन व आलोचना का रास्ता हमेशा खुला रखें। इसी रास्ते से होकर आती हैं सुनहरी किरणें…..।

 

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