लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नरेश भारतीय

अमरीका ने ११ सितम्बर २००१ को न्यूयार्क में हुए फिदायीन हवाई हमलों के बाद जिसे अपना सबसे बड़ा शत्रु माना उस विश्व आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन को अंतत: इस दुनिया से विदा दे दी. आतंकवाद के विरुद्ध अमरीका की अपनी रणनीति में कथित प्रमुख सहायक देश पाकिस्तान के ही एक नगर एबटाबाद में उसके बरसों से बने हुए और सुरक्षित निवासस्थान पर रात के वक्त हमला करके उसे बिना किसी प्रतिरोध के धराशाई कर दिया गया. अमरीका के जिन हजारों निरपराध लोगों ने एक दशक पहले न्ययार्क स्थित ट्विन टावर्स पर ओसामा निर्देशित आतंकवादी हमलों में अपने प्राणों की बलि दी थी उनके परिवारों को सुकून मिला कि उनके देश के राष्ट्राध्यक्ष ओबामा ने, ओसामा का अंत सुनिश्चित कर, उनकी पीड़ा को राहत दी. अमरीका के लोगों को एक लंबी प्रतीक्षा के बाद ही सही, पुनः आश्वस्त किया कि वह आतंकवाद के समक्ष घुटने नहीं टेकेगा. इस निष्कर्ष को भी विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया कि कुछ सिरफिरे लोगों के कारण मानवता के विरुद्ध किए जाने वाले ऐसे कुकृत्यों को सहन नहीं किया जा सकता जो इस्लाम के नाम पर किए जाते हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में, वे लोग जो ओसामा बिन लादेन के अमानवीय कारनामों को धर्मसम्मत मानते आये हैं और रक्तपात में विश्वास करते हैं उन्हें अपनी आत्मा से यह सवाल पूछने की आवश्यकता है कि यदि उनके किसी अपने या अपनों को बेवजह मौत के मुंह में धकेल दिया जाए तो उन्हें कैसे लगता है? यदि अच्छा नहीं लगता तो फिर उन्हें क्या हक है कि वे इस युग में भी किसी अन्य धर्म के लोगों की तबाही के फतवे जारी करने की हिमाकत करें?

ऐसे पनपे वैश्विक आतंकवाद पर पश्चिम की अब तक पूर्णत: स्वार्थपरक एकतरफा रणनीति पर भी प्रश्न उठाए जा सकते हैं. समस्या पर नए सिरे से और कहीं अधिक सतर्कता के साथ ध्यान दिए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है. ‘पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र है’, यह जानते हुए भी अमरीका मात्र अपने हित में ही उस सतत विवादग्रस्त देश की छल प्रवृत्ति की उपेक्षा करता रहा है. उसके साथ बंधा ही रहा है. अफगनिस्तान और पाकिस्तान गत अनेक वर्षों से अमरीका की क्षेत्रीय रणनीति के केंद्रबिंदु रहे हैं. कोई समय था जब अफगानिस्तान में पूर्व सोवियत संघ के प्रभाव को मिटाने के इरादे से अमरीका ने इस्लामी मुजाहिदीन को प्रोत्साहन दिया था. पाकिस्तान की सैनिक खुफिया सेवा आई. एस. आई के माध्यम से टनों हथियार रूसियों के विरुद्ध संघर्ष के लिए अमरीका ने अफगानिस्तान में पहुंचाए थे. उसका परिणाम जो हुआ वह किसी से छुपा नहीं है. इस्लामी कट्टरपंथ का बेकाबू होता प्रभाव प्रसार और अमरीका के द्वारा बरसों तक उसकी उपेक्षा किसी से छुपे हुए सत्य नहीं हैं. इसी कट्टरपंथी आतंकवादी भस्मासुर ने अभयदान पाकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की ज़मीन पर भरणपोषण के साथ जब अमरीका के सर पर ही अपना खूनी पंजा बेरहमी के साथ रख दिया तो उसके सृजक को होश आया कि इस्लामी मुजाहिदीन को उसके द्वारा दिया गया अभयदान उसी के लिए घातक बन गया है. अफगानिस्तान के बामियान क्षेत्र में स्थित बुद्ध की प्राचीन मूर्तियों को ध्वस्त करके तालेबान ने विश्व को कट्टरपंथी इस्लाम के प्रसार के अभियान का संकेत दे दिया था.

२००१ की भयावह घटना के बाद ही ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने खुल कर अपना घोर दुश्मन घोषित किया और ब्रिटेन के साथ मिल कर उसका पीछा करते हुए अफगानिस्तान तक पहुँच गए. ठीक उसी वर्ष १३ दिसम्बर २००१ को भारत के संसद भवन पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी हमला हुआ था. भले ही सतर्क सुरक्षा कर्मियों ने बहादुरी के साथ उसे असफल कर दिया था, लेकिन वह घटना भी उसी एक सत्य की पुष्टि थी जो उभर कर विश्व को आने वाले खतरों से सचेत कर रहा था. भारत में इस घटना के बाद बहुत हो हल्ला हुआ था. भारी बयानबाजी हुई थी. घटना में पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत मिले होने के बावजूद वह उससे इनकार करता रहा. ‘आर पार की लड़ाई’ होने की संभावनाएं जताई गयीं. लेकिन अंतत: भारत को अमरीका के दबाव के कारण इस अपमान का कड़वा घूँट पीकर चुप बैठ जाना पड़ा इस कारण से क्योंकि अमरीका को कतई यह स्वीकार्य नहीं था कि अपने राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने के लिए जो लड़ाई वह अफगानिस्तान में लड़ रहा था उसमें भारत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध संभावित किसी भी सैनिक कारवाई से कोई व्यवधान हो. लेकिन भारत का दुर्भाग्य यह है कि वह अफजल गुरु जैसे अपराधियों तक को सज़ा नहीं दे पाता जिन्हें मृत्युदंड देने का फैसला अदालत सुना चुकी है. जितनी बार आतंकवादी हमले हुए हैं वैसी ही स्थिति देखने को मिलती रही है. भारत का पाकिस्तान पर आरोप, पाकिस्तान का होशियारी से इनकार, अमरीका द्वारा भारत के संयम की प्रशंसा और उसके बाद बात का आई गयी हो जाना. क्या भारत के लिए अपने राष्ट्रीय अपमान का बदला स्वयं लेना कोई महत्व नहीं रखता?

१० वर्षों के बाद ही सही, लेकिन अमरीका ने अपने राष्ट्रीय अपमान का बदला अपने ध्रुव शत्रु ओसामा बिन लादेन को मार कर ले ही लिया. लेकिन इसके विपरीत यदि यह सच है कि भारत बार बार होने वाले अपने राष्ट्रीय अपमान को सहन करने के लिए पश्चिमी ताकतों द्वारा विवश किया जाता रहा है तो यह पश्चिम की अनैतिकता और भारत की अपनी चारित्रिक कमजोरी है. क्या अब वह वक्त नहीं है कि ओसामा के जाने के बाद आने वाले महीनों और वर्षों में आतंकवाद के और प्रसार के संभावित खतरों का सही आकलन भारत समेत सभी आतंकवाद प्रभावित देशों द्वारा किया जाए? क्या अब यह समय उपयुक्त नहीं है कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देश अपनी रणनीति का व्यापक परिप्रेक्ष्य में पुनरमूल्यांकन करें? हर प्रसंग में और हर जगह विश्व के थानेदार होने की स्वैछिक भूमिका निभाने का उपक्रम करने वाले अमरीका और नैटोसंधि के देशों के लिए अब यह सोचने की महती आवश्यकता है कि उनकी अपनी सुरक्षा और हित ही सर्वोपरि नहीं हो सकते. पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र है यह जान कर भी मात्र अपनी क्षेत्रीय महत्वाकाक्षाओं की पूर्ति के लिए भारतीय उपमहाद्वीप को इस्लामी आतंकवाद के प्रसार की आग में झोंक देने का अधिकार अमरीका को नहीं दिया जा सकता. पाकिस्तान ने अमरीका को ही कितनी बार असत्य भाषण और दोहरी चाल खेल कर कितना धोखा दिया है यह अब उसके लिए सुस्पष्ट हो गया होना चाहिए और यदि उसके बाद भी उसके द्वारा पाकिस्तान का भरण पोषण जारी रहता है तो अमरीका के दोहरेपन को भी भारत द्वारा चुनौती दी जानी चाहिए.

इस समय जब कुछ क्षेत्रों में यह बहस उभारने की कोशिश की जा रही है कि ओसामा को मारा नहीं जाना चाहिए था बल्कि न्याय के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए था. ओबामा का अमरीकी प्रशासन उस द्वारा की गयी सैनिक कारवाई के व्यापक जन समर्थन और आतंकवादी तत्वों द्वारा प्रतिक्रियास्वरूप किए जाने वाले हमलों की धमकियों के ठीक बीच खड़ा स्थितिविकास को भांप रहा है. पश्चिमी देशों में ऐसे खतरों का सामना करने की पुरजोर तैयारियां की जा रही हैं. भारी सतर्कता बरती जा रही है. और दूसरी तरफ बदला लेने की घोषणाएं करते हुए ओसामावादी अपनी भुजाओं का बल प्रदर्शित करने को उतावले हैं. इस बीच अमरीकी नेतृत्व उत्सुकता से यह जानने की प्रतीक्षा में है कि ओसामा के बाद कट्टरपंथी इस्लामी संगठन अलकायदा की कमान कौन संभालता है. ओसामा को इस्लाम का नायक शहीद सिद्ध करने की कोशिश में इस्लामी जगत में अमरीका विरोधी प्रदर्शन यत्र तत्र हुए हैं.

फिलस्तीन समेत मध्यपूर्व के अनेक देशों में लोगों ने ओसामा के अमरीकियों के हाथों मारे जाने पर अपने आक्रोश को मुखर अभिव्यक्ति दी है. पाकिस्तान में जहां उसका अंत हुआ अमरीकियों की इस कारवाई की निंदा की गई. उन्हें इस्लाम का श्रेष्ठतम शहीद तक बताया गया और यह दावा किया गया उसकी मौत के फलस्वरूप कट्टरपंथ को और बढ़ावा मिलेगा. मुल्तान में अमरीकी ध्वज को जलाया गया और अमरीका से मुजाहिद्दीन द्वारा प्रतिशोध लेने की कसमें दोहराई गयीं. एबटाबाद में जहां उनका निवासस्थान बना था उसे ओसामा स्मारक बनाने के संकल्प की बात कही गयी. अमरीका पर यह आरोप लगाया गया कि उसने अरब सागर में ओसामा को दफना कर सही नहीं किया. उस स्थान को शहीद सागर का नाम देने की बात कही. इसी तरह अफगानिस्तान में भी ओसामा और उनके उसूलों के प्रति व्यापक समर्थन जतलाया गया और तालिबान के अमरीकियों के विरुद्ध संघर्ष को तेज करने की सम्भावना जतलाई गयी. क्या निष्कर्ष लिया जाएगा इससे? मन को समझाने के लिए क्या यह कि मात्र इने गिने ओसामावादियों की प्रतिक्रिया कोई माने नहीं रखती? या फिर यह कि खतरा ओसामा के जाने के बाद खत्म नहीं हुआ है बल्कि बढ़ा है.

क्या हजारों निहत्थे-निरपराधों की मौत इन अंधविश्वासी इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए कोई महत्व नहीं रखती जो बिना सोचे समझे फतवों की संस्कृति को अपनाए हुए हैं. क्या जिहाद के नाम पर उनकी हत्याएं करने का हक भी स्वत: उन कट्टरपन्थी तत्वों को मिल जाता है जिनका किसी प्रकार की भी धर्मान्धता या कथित अमरीकापरस्ती से कोई लेना देना नहीं होता. अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए अपने देश के अपमान और अपने हजारों नागरिकों की दुर्दांत हत्याओं का बदला देश के कथित शत्रु ओसामा को मार कर लिया. लेकिन क्या इस तरह से बदले पर बदले की इस युग में प्रस्थापित की जा रही नवपरम्परा मानवता के सर्वनाश का पथ प्रशस्त करने वाली तो सिद्ध नहीं होगी? यदि सतर्कता न बरती गयी और इस्लाम के कट्टरपंथी तत्वों को सही रणनीति से थामा नहीं गया तो उनके द्वारा संस्कृतियों का संघर्ष करने का अनथक प्रयास आने वाले वर्षों में कई नए गुल खिला सकता है.

भले ही बराक ओबामा ने यह कह कर अपनी तरफ से सूझ बूझ का परिचय दिया है कि उनकी लड़ाई इस्लाम के विरुद्ध नहीं है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ओसामावादी इतनी आसानी से अपने जिहाद प्रेरणापुरुष को विस्मृत नहीं होने देंगे. ओसामा भले मर गया है लेकिन उसके द्वारा पोषित आतंकवाद अभी जीवित है. यत्र तत्र चिन्गारियां फूटेंगी और शोले भड़केंगे. रहस्योदघाटन किया गया है कि ओसामा अंतिम क्षण तक पाकिस्तान स्थित एबटाबाद से अलकायदा का पूर्ण संचालन कर रहा था. और कड़वी सच्चाई यह भी है कि ओसामा के अनुयाई या समर्थक अमरीका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों और भारत में भी जगह जगह छाए हुए हैं. वर्ष २००३ में मैंने स्थितियों का आकलन करते हुए अपनी पुस्तक ‘आतंकवाद’ में स्पष्ट यह लिखा था कि “आतंकवाद का जो स्वरुप वर्तमान में विश्व के समक्ष प्रकट हुआ है वह छिटपुट हिंसात्मक घटनाओं से भिन्न है. इस पर भी हर छोटी बड़ी रक्तपात पूर्ण घटना एक व्यापक आतंकजाल का अंग है जिसने अनेक देशों को फांस लिया है. स्थान स्थान पर फैले हुए आतंकवादी संगठन भले ही एक विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के अधीन सक्रिय हैं लेकिन अधिकांश का संचालन-सूत्र अब केंद्रीयकृत हो चुका है. यह केंद्र बिंदु है एक ऐसी मजहबी सोच जिसके वशीभूत स्वचालित मशीनों की तरह आतंकी अनेक देशों में नगरों, कसबों के गली, मुहल्लों, दफ्तरों, सार्वजनिक परिवहन सुविधा केन्द्रों, हवाई अड्डों और यहाँ तक कि भारी सुरक्षा वाले सैनिक-असैनिक, सरकारी गैर सरकारी संगठनों के कार्यालयों, कालेजों स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए सुनिश्चित कार्य योजनाओं के अनुगत आदेश निर्देश पाने की प्रतीक्षा में रहते हैं.”

बाद के वर्षों में जो कुछ हुआ है वह सर्वविदित है. ओसामा बिन लादेन का उतराधिकारी का पद, जैसा कि अटकलें हैं, यदि अमरीका में जन्में या पढ़े लिखे किसी कट्टरपंथी इस्लाम परस्त अमरीकी अरब को मिलता है तो उपरोक्त विश्लेषण के दृष्टिगत इसमें आश्चर्य की कोई गुंजायश नहीं होगी. इस तरह पनपे आतंकवाद के विरुद्ध विश्व को एक लंबी लड़ाई लड़ना पड़ सकती है क्योंकि ओसामा का अंत आतंकवाद का अंत निश्चय ही प्रतीत नहीं होता. इस बीच यह नितान्त आवश्यक है कि आतंकवाद प्रभावित देश शत्रु मित्र की सही पहचान करते हुए एक साँझा रणनीति निर्धारित करने की दिशा में अपने कदम आगे बढ़ाएं. यदि बार बार यह स्पष्ट होता चला गया है कि कौन सा देश वस्तुत: आतंकवाद का पोषक केंद्र है जहां स्थित प्रशिक्षण केन्द्रों से जिहादी फिदायीन तैयार करके विश्व भर में भेजे जाते रहे हैं तो उसके विरुद्ध सीधी कारवाई जब तक नहीं की जायेगी, जब तक उसे करोड़ों अरबों डालरों की रकमें, जो अमरीका और ब्रिटेन द्वारा बरसों से दी जाती रहीं बंद नहीं की जातीं, आतंकवाद नहीं थमेगा. पाकिस्तान पश्चिम के दोहन की कला में प्रवीण है और परमाणु बम के प्रयोग की धमकी देकर दोहन को जारी रखने का प्रयत्न करेगा लेकिन इसका हल अमरीका और उस नैटो को करना होगा जो उसके पृष्ठपोषक रहे हैं.

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1 Comment on "ओसामा नहीं, पर आतंकवाद जीवित है"

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ravindra singh from goldmine noida sec 62
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ravindra singh from goldmine noida sec 62

ओसामा कभी मर ही नहीं सकता.क्योकि ओसामा का आतंक अभी भी जिन्दा है.ओसामा के मरने के मरने के बाद भी तमाम जगह पैर बम बिस्फोट हो रहा है क्युकी ओसामा आज भी जिन्दा है.
रविन्द्र सिंह ( गोरखपुर बाले )

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